दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान

भूपेश दीक्षित

वेद और पुराण में धर्म की अनेक व्याख्या है लेकिन कृपानिधान श्रीराम जी कहते है कि पर हित सरिस धर्म नहीं भाई । पर पीड़ा सम नहीं अधमाई ॥ अर्थात दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुःख पहुँचाने के समान कोई नीचता (पाप) नहीं है और यही समस्त पुराणों और वेदों का निश्चित सिद्धांत है । यदि इस पर गहनता से चिंतन करें तो वर्तमान युग में हम पाते है कि इन्द्रियभोगों की इच्छा में लिप्त मनुष्य पृथ्वी (भूमि), पशु, प्राणी, प्रकृति, पुरुष और पञ्च महाभूत पर निरंतर अन्याय कर रहा है जिसका वर्णन करना भी कठीन है । आज व्यक्ति को पञ्च महाभूत से निर्मित न तो अपने शरीर का ज्ञान है और न ही अन्य शरीरों का ज्ञान है और यही कारण है कि वह अपने कर्मक्षेत्र और कर्तव्यों से विमुख होते हुए शोकसंतप्त चित्त से अधार्मिक आचरण करते हुए शरीर को अधर्म के साधन में लगा रहा है । मिटटी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश सभी का निर्दयता से दोहन करते हुए इनको प्रदूषित करते हुए लगातार नीच कार्य कर रहा है । इसलिए अपवित्र अवयवों से उत्पन होने वाला शरीर अधार्मिक कार्यों में लिप्त है । उपनिषदों के वचन शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् के विपरीत शरीर को सभी धर्मों (कर्त्तव्यों) को पूरा करने के साधन के लिए उपयोग में लिया जा रहा है। हमने अहंकार से ग्रसित हो करके खेतों की मिटटी से लेकर नभ में निर्मित होने वाले बादलों तक को अशुद्ध कर डाला । चाहे माँ का दूध हो या गंगा का पानी सभी को विषैला कर डाला । अस्वस्थ शरीर, मन और चेतना से स्थान, अजान, रंग, शंख, भाषा, भूमि, तिलक, टोपी आदि में धर्म को ढूँढने लगे और उन्ही में धर्म को स्थापित करने में लगे हुए है । अब जब मार्ग ही अनुचित चुना है तो फिर कर्मफल उचित कैसे मिलेगा ? यही कारण है कि आज चहुँओर भय-भ्रम, शोक-संदेह, निराशा, लालच-कपट, रोग, राग-द्वेष, अधीरता, अभिमान दिखाई देते है । मनुष्य द्वारा अर्थ और काम को प्रधान बनाने के कारण बुद्धि और मन अस्थिर है, भीतर और बाहर अशांति है, जीवन में मोक्ष (सुखानंद) नहीं है । व्यक्ति आत्मचिंतन एवं आत्मसाक्षात्कार के बजाय आत्महन कर रहा है । स्वयं को और सृष्टि को नष्ट कर रहा है । कीर्ति के स्थान पर कष्ट का फैलाव कर रहा है । धर्म का ह्रास कर रहा है । यदि सूक्ष्मता से ध्यान लगाते हुए चिंतन करेंगे तो पायेंगे कि धर्म स्थापना का सीधा सम्बन्ध स्वस्थ शरीर और शरीर के निर्माण करने वाले अवयवों से है । श्रीमद्भागवतगीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है कि वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः । इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ।। अर्थात मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इन्द्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ और भूत-प्राणियों में चेतना अर्थात जीवनशक्ति हूँ । ईश्वर कहीं बाहर नहीं बल्कि मनुष्य के तन-मन-चेतना में ही स्थित है जिसे प्राप्त करने के नियम और विधि है । गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस में शिवजी पार्वती जी से कहते है कि जब-जब होई धरम कै हानी । बाढ़हीं असुर अधम अभिमानी ।। तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा । हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ।। अर्थात जब-जब धर्म का ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षक (विकार) बढ़ जाते है, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भांति-भाँती के (दिव्य) शरीर धारण कर सजन्नों की पीड़ा हरते है । द्वापर युग में यही वचन श्रीमद्भागवतगीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है कि यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि सभी ने एक स्वर में कहा है कि जब-जब धर्म का ह्रास होगा तब-तब मैं प्रकट होता हूँ न कि जब-जब अर्थ, काम तथा मोक्ष का ह्रास होगा तब-तब मैं अवतार लेता हूँ । इसलिए यदि हम वास्तव में सभी का कल्याण चाहते है तो हमें अपने जीवन में अर्थ तथा काम की प्रधानता कम करते हुए शुद्ध तन-मन-चेतना से भलाई के कार्यों में लगना होगा तभी सही मायनों में धर्म की स्थापना और रक्षा होगी और हम सभी की विजय होगी ।

(लेखक  जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं )

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