चुनावी लोकतंत्र और वंशवादी सियासत

बाल मुकुन्द ओझा

वंशवाद ने एकबार फिर देश की सियासत को गरमा दिया है। पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव के आते ही देश में परिवार और वंशवाद की राजनीति एक बार फिर जोर शोर से हिलोरे मारने लगी है। चुनावी राजनीति में परिवारवाद हमेशा से ही एक बड़ा मुद्दा रहा है। विशेषकर यूपी में अपने बेटों और अन्य परिवारजनों को चुनावी टिकट दिलाने के लिए राजनैतिक दलों और नेताओं में एक दूसरे को पछाड़ने के लिए होड़ मची है। पारिवारिक मोह के कारण ही कई कथित नामी गिरामी जातीय नेता अपनी पार्टी छोड़ दूसरी पार्टियों का दामन न केवल थाम रहे है बल्कि निवर्तमान पार्टी को नेस्तनाबूद करने की गर्जना भी कर रहे है। समाजवादी पार्टी ने ऐसे लोगों के लिए अपने दरवाज़े पूरी तरह खोल दिए है। पिछले विधान सभा चुनावों में इन्हीं नेताओं के लिए भाजपा ने अपने द्वार खोल दिए थे।
समाजवादी पार्टी के सुप्रीमों अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल से समझौता कर अपने कुनबे में आशातीत वृद्धि करली है। अब दो दर्ज़न से अधिक मुलायम कुनबे के लोगों का चुनाव लड़ने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। वहीँ सपा में शामिल होने वाले जातीय नेताओं ने अपने और परिवारजनों के टिकट पक्के कर लिए है। भाजपा भी दूसरी पार्टियों को नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करने के लिए जोड़ तोड़ में लगी है। भाजपा में भी नेता पुत्रों की लाइन लगी है। हालाँकि पार्टी का दावा है उन्हीं नेता पुत्रों को टिकट दे रहे है जिनका अपना सियासी वज़ूद है। कमोवेश दूसरी पार्टियों का भी अपने परिवारजनों से मोह बना हुआ है।
भारत की राजनीति में वंशवाद खत्म होने की बजाय वटवृक्ष की तरह फैलता जा रहा है। वर्तमान में लगभग हर पार्टी परिवारवाद के रोग से ग्रसित है। प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का हाल तो यह है,कि पार्टी का अध्यक्ष पद परिवारों की बपौती बना हुआ है। अधिकांश राजनीतिक दलों में एक ही परिवार के सदस्य कब्जा जमाये हुए है। जितनी तेजी से राजनीतिक दलों में वंशवाद पांव पसार रहा है, वह दिन दूर नहीं जब शायद कोई आम आदमी चुनाव लड़ सके। देश में बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों में एक-दो को छोडकर बाकी सभी एक विशेष परिवार तक सिमट कर रह गई हैं। कहा जाता है की इंसान अपने जन्म से नहीं कर्म से जाना जाता है, ये सब जानते है। आज नेता अपने खानदान से ज्यादा जाने जाते है अपने कर्मो और योग्यता के लिए कम जाने जाते है।
विश्व के लोकतंत्रिक इतिहास में भारत ऐसा देश है, जहां वंशवाद की जड़ें गहरी धंसी हुई है। अब तो देश का लोकतंत्र परिवारतंत्र में बदल गया है। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में वंशवादी राजनीति न के बराबर है जबकि कांग्रेस, सपा, डीएमके, आरजेडी, एनसीपी, लोकदल के नाम से विभिन्न दल, नेशनल कॉन्फ्रेंस, लोक जनशक्ति पार्टी , देवेगौड़ा की पार्टी, अकाली दल जैसे दलों का संगठन और सत्ता एक परिवार विशेष के लिए समर्पित है। कई राजनीतिक विश्लेषक परिवारवाद और वंशवाद की परिभाषा अलग अलग बताते है। इन लोगों की मान्यता के अनुसार यदि संघर्ष के रास्ते कोई भाई अपनी जगह सियासत में बनाकर आता है तो उसे परिवारवाद का दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। वहीँ दूसरे पक्ष के विश्लेषक मानते है कि परिवार के सहारे आगे बढ़ना अनुचित है।
आजादी के बाद से ही परिवारवाद गैर कांग्रेसी दलों का कांग्रेस के विरुद्ध अचूक हथियार रहा है। शुरू में डॉ लोहिया ने परिवारवाद पर कांग्रेस पर हमला किया था बाद में गैर कांग्रेस दलों ने इसे हथिया लिया। अब तो लगभग सभी पार्टियों में परिवार का ही बोलबाला है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश, बिहार में तेजस्वी यादव और चिराग पासवान, कर्नाटक में कुमार स्वामी, पंजाब में बादल, हरियाणा में चौटाला, कश्मीर में अब्दुल्ला, महाराष्ट्र में ठाकरे और सुप्रिय सुले के बाद राहुल गाँधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होने के बाद देश में वंश और परिवारवाद की सियासत गरमा गई है। मोतीलाल नेहरू से राहुल गाँधी तक कांग्रेस नेहरू- गाँधी परिवार के कब्जे में रही है। नेहरू -गाँधी परिवार जब जब कांग्रेस पर सवार हुआ है तब तब यह पार्टी आगे बढ़ी है। नरसिंह राव, सीताराम केसरी का कार्यकाल भी लोगों ने देखा है। कहा जाता है की इन दोनों नेताओं के समय पार्टी की लुटिया डूबी जो अब तक उभर नहीं पाई है। कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप कोई नया नहीं है। प्रियंका गाँधी वाड्रा के सक्रिय राजनीति में प्रवेश के बाद वंशवादी सियासत पर जोर शोर से चर्चा होने लगी है। मगर यह सच है की इस पार्टी को जीवनदान यह परिवार ही दे सकता है अन्यथा स्वतंत्रता के गर्भ से निकली पार्टी को बिखरने में देर नहीं लगेगी।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

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