मोदी सरकार मुखर्जी नीति पर चलेगी कश्मीर में

बाल मुकुन्द ओझा

23 जून जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान दिवस है। आज का दिन देश के लिए अतिमहत्वपूर्ण है क्योंकि मोदी के नेतृत्व में जो भाजपा सरकार है वह मुखर्जी के आदर्शों और विचारों पर चलने का दावा कर रही है। कश्मीर के बारे में मोदी सरकार मुखर्जी के बताये मार्ग पर चलकर एक झंडा, एक निशान और एक राष्ट्र के अनुरूप धारा 370 हटाकर अपना एजेंडा साफ कर चुकी है।
कश्मीर पर लगता है भाजपा के विचार बदले नहीं है और वह अपने संस्थापक के नक्शे कदम पर चलकर इस समस्या को निपटाना चाहती है। यहाँ हमें डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बारे में जानना जरुरी है की आखिर वे चाहते क्या थे। आज की पीढ़ी के लिए डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम अनजाना हो सकता है मगर कश्मीर के लिए किया गया उनका बलिदान इतिहास में अमर है। डॉ मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। डॉ मुखर्जी भारत के अकेले ऐसे नेता थे जिन्हें एक देश दो संविधान मंजूर नहीं था। उनके अप्रतिम संघर्ष के कारण ही आज कश्मीर भारत का भाग है।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देश की एकता और अखंडता के लिए अपने प्राणों की आहूति दी। समाज के लिए सर्वस्व न्योछावर करने के साथ ही अखंड कश्मीर के खातिर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान सदैव हमारी स्मृतियों में रहेगा। डॉ. मुखर्जी धर्म के आधार पर विभाजन के कट्टर विरोधी थे।डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी जो भारतीय जनता पार्टी के बदले रूप में आज हमारे सामने है। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब जवाहरलाल नेहरु देश के प्रधानमंत्री बने तो स्वयं महात्मा गांधी एवं सरदार पटेल ने डॉ मुखर्जी को तत्कालीन मंत्रिपरिषद में शामिल करने की सिफारिश की। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें अंतरिम सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया। केंद्र सरकार में मंत्री बनने से पहले वो पश्चिम बंगाल सरकार में वित्त मंत्री रह चुके थे। डॉ. मुखर्जी ने लियाकत अली खान के साथ दिल्ली समझौते के मुद्दे पर 6 अप्रैल, 1950 को मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। श्री मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरू गोलवलकर जी से परामर्श करने के बाद 21 अक्तूबर, 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ की नींव रखी और वे इसके पहले अध्यक्ष बने। 1952 के चुनावों में भारतीय जनसंघ ने संसद की तीन सींटें जीतीं, जिनमें से एक सीट पर श्री मुखर्जी जीतकर आए थे।
1929 में बंगाली लेजिस्लेटिव कांउसिल में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर अपना राजनीतिक करियर शुरू करने वाले जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को हुआ। 23 जून उनका समृति दिवस है। इस दिन उनकी जम्मू कश्मीर जेल में उनकी मृत्यु हुई थी। उन्होंने एक राष्ट्र दो विधान दो संविधान का विरोध करते हुए बिना परमिट के जम्मू-कश्मीर में प्रवेश किया। वहां पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। डा. मुखर्जी ने 40 दिन तक जेल जीवन की यातनायें सहन कीं। वहीं वे अस्वस्थ हो गयेे। 22 जून को प्रात 4 बजे उनको दिल का दौरा पड़ा। जनसंघ के उनके साथियों का मानना है उन्हें समय पर उचित चिकित्सा नहीं दी गयीे परिणामस्वरूप अगले ही दिन 23 जून 1953 को रहस्यमयी परिस्थितियों में डा. मुखर्जी का देहान्त हो गया। राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान किया।
डॉ. मुखर्जी ने 1917 में मैट्रिक किया तथा 1921 में बी०ए० की उपाधि प्राप्त की। 1923 में लॉ की उपाधि अर्जित करने के पश्चात् वे विदेश चले गये और 1926 में इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे। 33 वर्ष की अल्पायु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। इस पद पर नियुक्ति पाने वाले वे सबसे कम आयु के कुलपति थे। एक विचारक तथा प्रखर शिक्षाविद् के रूप में उनकी उपलब्धि तथा ख्याति निरन्तर आगे बढ़ती गयी। डॉ मुखर्जी आज हमारे बीच में नहीं है मगर भाजपा के रूप में उनकी विचारधारा को लोगों ने स्वीकारा है। शिक्षाविद और प्रखर देशभक्त के रूप में लोग आज भी उन्हें श्रद्धा से याद करते है।

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