विकराल होती आत्महत्या के सामजिक सबक

भूपेश दीक्षित

कुछ मधुर और कुछ कटु स्मृतियों को समेटे साल 2021 अपने अंतिम पड़ाव की ओर है। इस वर्ष जहाँ समाज ने सरकारों के कमकाज करने के तरीकों को ओर अधिक निकटता से देखा व अपनी पैनी नजरों से जांचा-परखा वहीँ सरकारों ने समाज के विभिन्न वर्गों का एक-दुसरे के प्रति समन्वय, सहयोग एवं सम्बन्ध और प्रगाढ़ होते देखा । लोक व तंत्र दोनों को विपरीत परिस्थितियों में शक्तिशाली और समृद्ध बनाये रखने में प्रत्येक नागरिक अपनी भूमिका भली-भांति निभा रहा है। किन्तु इन सबके बीच एक कटु सत्य यह भी है कि देश में आत्महत्या की वजह से लगातार बढ़ रहे मृत्यु के मामलों में सरकार और समाज दोनों ने एक दुसरे के प्रति आँखें मूँद रखी है । हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा प्रकाशित एक्सीडेंटल डेथस एंड सुसाइड इन इंडिया – 2020 की रिपोर्ट पर नजर डाले तो पता चलता है की देश में वर्ष 2017 से लगातार आत्महत्या के मामलों में वृद्धि हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार देश में वर्ष 2017 के मुकाबले वर्ष 2020 में आत्महत्याओं के मामलों में 17.83 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी है । रिपोर्ट के मुताबिक भारत में जहाँ साल 2017 में 129887 लोगों ने अपना जीवन स्वयं समाप्त कर लिया वहीँ साल 2020 में सुसाइड के मामलों की संख्या बढ़कर 153052 हो गयी। हालत इतने चिंताजनक है कि वर्ष 2020 में भारत के 28 राज्य में से 24 राज्य आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों की चपेट में है।
देश में जनस्वास्थ्य और सामाजिक रूप से विकराल होती आत्महत्या की समस्या सरकार, समाज, लोक, तंत्र, शिक्षा, संस्कृति, कानून, न्याय, मानवीय मूल्यों और अधिकारों के शक्तिशाली ढाँचे पर निरंतर चोट कर रही है और इनको चुनौती दे रही है। हालाँकि बीते एक दशक में भारत सरकार द्वारा मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र को मजबूत करने के लिए अनेक महत्वपूर्ण कार्य हुए है किन्तु आत्महत्या रोकथाम के लिए कोई ठोस कदम अभी भी धरातल पर नजर नहीं आता और यही हाल राज्य सरकारों का है । देश की मीडिया भी आत्महत्या के मामलों की जिम्मेदार रिपोर्टिंग और प्रकाशन की गाइडलाइन्स की पालना करने से जी चुरा रही है और मनोरंजन जगत टीआरपी की चादर अपने मुँह पर ओढ़े असंवेदनशील स्क्रिप्ट दर्शकों को गढ़े और परोसे जा रहा है। देश में पिछले अनेक वर्षों से विभिन्न सामाजिक संगठनो, चिकित्सकों, जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों एवं मानसिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम नीति बनाकर उसे लागू करने की मांग के साथ-साथ एक्सीडेंटल डेथस एंड सुसाइड इन इंडिया रिपोर्ट के आंकड़ो और उसकी गुणवता सुधार करने के लिए भी लगातार मांग उठाई जा रही है किन्तु न तो देश की संसद में और न ही किसी विधानसभा में आत्महत्या रोकथाम को लेकर और डेटा क्वालिटी को लेकर कोई व्यापक चर्चा और स्वस्थ संवाद किया गया है। ज्ञात हो कि विश्व में आत्महत्याओं की वजह से होने वाली कुल मृत्यु में से 20 प्रतिशत से अधिक मृत्यु भारत में होती है और यदि इस दशक में देश ने आत्महत्या रोकथाम को लेकर ठोस कार्य या प्रयास नहीं किया तो सच यह है कि दिशाहीन चर्चा, विवाद और शोर-शराबे के बीच हर साल लाखों जिंदगियां असमय काल का ग्रास बनती चली जायेगी जिसके बोझ के नीचे दबकर सरकार और समाज दोनों का पतन निश्चित है ।
(लेखक जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ है)

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