फसलों के लिए अमृत है मावठ की एक एक बूंद

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

        फसलों के लिए मावठ की एक एक बूंद अमृत से कम नहीं है। इस समय उत्तरी भारत के अधिकांश हिस्सों में सर्दी की बरसात यानी की मावठ का दौर चल रहा है। आसमान से एक एक बूंद अमृत बन कर टपक रही है तो यह रबी की फसलों को नया जीवन दे रही है। हांलाकि सर्दी के तेवर तीखे होने के साथ ही जन-जीवन प्रभावित होने लगा है। कोरोना के नए दैत्यावतार ओमिक्रान के कारण अवश्य चिंता का कारण बन रही है। पर इसमें कोई दो राय नहीं कि राजस्थान सहित समूचे उत्तरी भारत में सर्दी की मावठ से किसानों के चेहरे खिल गए हैं। मावठ से निश्चित रुप से कोयला संकट से जूझते देश के विभिन्न राज्यों के विद्युत वितरण निगमों के अधिकारियों ने भी राहत की सांस ली होगी। इस समय रबी का सीजन चल रहा है। अच्छे मानसून के कारण देश में रबी फसलों की रकबा बढ़ रहा है। रबी फसलों को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। खासतौर से गेहूं की फसल के लिए समय पर सिंचाई की अधिक आवश्यकता होती है। राजस्थान आदि सरसो उत्पादक प्रदेशों में सरसों की फसल के लिए जहां पानी की आवश्यकता पूरी होगी वहीं चने की फसल को भी बड़ी राहत मिलेगी। बागवानी फसलों में मटर, गाजर मूली आदि इससे फलेगी-फूलेगी। किसानों को रबी फसल के लिए मावठ का इंतजार रहता है। ऐसे में किसान सर्दी की मावठ का बेसब्री से इंतजार करते है। हांलाकि आज गांव-गांव में बिजली उपलब्ध होने से किसान पूरी तरह तो मावठ पर निर्भर नहीं रहते पर तेज सर्दी के साथ मावठ व बून्दा-बान्दी से काश्तकारों को बड़ी राहत मिलती है। किसानों को बड़ा फायदा जहां बिजली आने की प्रतीक्षा में कड़ाके की ठण्ड में खेतों की जुताई करने से राहत मिली हैं वहीं बिजली के बिल पर होने वाले खर्चे से भी प्रकृति की मावठ के कारण छुटकारा  मिल गया है। इसके साथ ही सर्दी के मौसम की यह मावठ फसलों के लिए अमृत सिद्ध होती है। इसका सीधा पर्यावरणीय लाभ इस बरसात से फसलों को मिलता है और खेत लहलहा उठते हैं। इसके साथ ही सिंचाई के लिए पानी की आवश्यकता नहीं होने से पानी का दोहन सीमित हो जाता है। इस तरह से देखा जाए तो मावठ की यह बरसात लाभकारी ही लाभकारी सिद्ध होती है।
रबी फसल के समय बिजली की मांग बढ़ जाने से विद्युत वितरण निगमंा को भी बिजली की व्यवस्था करने के लिए दो चार होना पड़ता है। पिछले दिनों देशव्यापी कोयला संकट के कारण बिजली निगम अभी पूरी तरह से सामान्य स्थिति में नहीं आ पाए है। विदेशों से आयातीत कोयला भी बहुत अधिक महंगा होने से बिजली निगमों के पास दोहरा संकट हो गया है। एक और विदेशों से आयात करने वाले निजी प्लेयर्स अब कोल इंडिया पर ही निर्भर हो गए हैं तो इससे कोयले की मांग बढ़ गई है। सरकारों की किसानों को फसल के लिए समय पर बिजली उपलब्ध कराना प्राथमिकता होती हैं। यहां तक कि सरकारों को प्राथमिकता को देखते हुए मंहगी बिजली खरीद कर भी काश्तकारों को उपलब्ध करानी पड़ती है। इतना करने के बाद भी बिजली वितरण के समय या अन्य किसी कारण से व्यवधान केे कारण किसानों का आक्रोश भी क्षेत्र में देखने को मिल जाता है। इसलिए  देखा जाए तो किसान ही नहीं अपितु सभी के लिए सर्दी की मावठ राहत लेकर आती है। सर्दी की मावठ, बून्दा-बान्दी व बरसात से फसलोें को पानी मिलने से करोड़ों रुपए की बिजली की बचत हो जाती है। इसके साथ ही जल दोहन भी बच जाता है। ऐसे में सर्दी के अमृत जल मावठ का स्वागत किया जाना चाहिए।
इसमें कोई दो राय नहीं कि कड़ाके की सर्दी से जन-जीवन बुरी तरह से प्रभावित होता है। फिर कोरोना का दौर चल रहा है सो अलग। ऐसे में सर्दी से बचाव भी बड़ी आवश्यकता हो जाती है। इस मौसम में सर्दी जनित बीमारियां भी बढ़ती है और इसके साथ ही बुजुर्गों के लिए सर्दी का मौसम थोड़ा तकलीफ देय हो जाता है पर इसका हल सर्दी से बचाव के तरीके अपना कर किया जा सकता है। कहा जाता है कि सर्दी का मौसम स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छा मौसम होता है। इस मौसम में जीवंतता होती है। आप अच्छा खा-पी सकते हो, अच्छा पहन सकते हैं। सूटेड़-बुटेड़ हो सकते हैं। यही कारण है कि सर्दी में खान-पान पर विशेष जोर दिया जाता है। सूखे मेवे या गरीब के मेवे मूंगफली का सेवन स्वास्थ्य के लिए बेहतर होने के साथ ही स्वास्थ्यवर्द्धक मोदकों, गुड़ व गुड़ से जुड़े खाद्य पदार्थ गजक, तिलपट्टी, तिल सकरी आदि का उपयोग बढ़ जाता है। केवल करना यह पड़ता है कि सर्दी के बचाव के लिए गर्म कपड़े पहन कर बाहर निकलना व खासतौर से तिखी हवा से बचने की सावधानी तो बरतनी ही पड़ेगी।
प्रकृति की मेहरबानी से सर्दी की मावठ किसानों के लिए वरदान बन कर आई है। हमें जरुर दो चार दिन की सर्दी की तकलीफ भुगतनी पड़ेगी पर अन्नदाता किसानों और देश के बिजली निगमों को निश्चित रुप से यह राहत का काम है। करोड़ों रुपए की बिजली की बचत होगी और खेतों में फसलें फल फूल सकेगी। अरबों रुपयों का कोयला बचेगा तो किसानों की फसल पर लागत कम होगी।  खासबात यह कि कोरोना ने अर्थ व्यवस्था में खेती किसानी की भूमिका को रेखांकित कर दिया है। ऐसे में प्रकृति के इस उपहार का स्वागत करना ही होगा।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

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