बंगाल की दुर्गा पूजा को यूनेस्को ने दी वैश्विक पहचान

बाल मुकुन्द ओझा

भारत के विलक्षण रंगीले त्योहारों और पर्वों को भी वैश्विक स्तर पर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मान्यता मिल रही है। इस कड़ी में यूनेस्को ने बुधवार को बंगाल की दुर्गापूजा को सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिया है।इसके साथ ही भारतीय परंपरा और संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाले 14 आयोजनों को सूची में शामिल किया गया है। ‘दुर्गा पूजा का पावन पर्व भारत की शानदार सांस्कृतिक विरासत और एकता की भावना को दर्शाता है। भारत की ओर से यूनेस्को से दुर्गा पूजा को विरासत का दर्जा देने की मांग रखी थी। इसे यूनेस्को ने मंजूरी दे दी है। दुर्गा पूजा को अब विश्व स्तर पर मान्यता मिलेगी। इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मान से देश विशेषकर बंगाल में खुशी की लहर दौड़ गई है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस खुशी को साझा करते हुए ट्विटर पर लिखा ‘हर भारतीय के लिए बहुत गर्व और खुशी की बात.’ यह फैसला पेरिस में चल रही यूनेस्को की बैठक में लिया गया।
यूनेस्को ने बुधवार को ट्विटर पर इस पल की सराहना की और भारत को बधाई दी। यूनेस्को ने लिखा ‘कोलकाता में दुर्गा पूजा को अभी-अभी अमूर्त विरासत सूची में अंकित किया गया है। यूनेस्को की इस प्रतिष्ठित सूची में 2020 में छाउ नृत्य को भी अंकित किया जा चुका है। यह नृत्य ओडिशा में उत्पन्न हुआ लेकिन यह पश्चिम बंगाल और झारखंड में भी लोकप्रिय है।
यूनेस्को ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि दुर्गा पूजा को धर्म और कला के सार्वजनिक प्रदर्शन के सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में देखा जाता है।सहयोगी कलाकारों और डिजाइनरों के लिए यह बड़ा अवसर होता है। बंगाल में इस त्योहार को बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। घर घर मंडप सजाए जाते हैं। इसके साथ ही पारंपरिक बंगाली ड्रमिंग और देवी की पूजा सबसे खास होती है।दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान वर्ग, धर्म और जातियों के विभाजन टूट जाते हैं। समाज के सभी वर्गों के लोग  दुर्गा पंडाल या दुर्गा मंडप को देखने के लिए आते हैं।
भारतीय त्योहारों, परंपराओं और संस्कृति से जुड़ी गतिविधियां जिन्हें अब तक यूनेस्को की ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ सूची में अंकित किया गया है उनमें कोलकाता में दुर्गा पूजा सहित कुटियाट्टम, केरल में संस्कृत थिएटर, वैदिक मंत्रोच्चार की परंपरा, रामलीला, रामायण का पारंपरिक प्रदर्शन, रमण, हिमालय में गढ़वाल का धार्मिक त्योहार और अनुष्ठान थियेटर, छाऊ नृत्य, कालबेलिया राजस्थान के लोक गीत और नृत्य, मुदियेट्टू, केरल का अनुष्ठानिक रंगमंच और नृत्य नाटिका, ट्रांस-हिमालयी लद्दाख क्षेत्र, जम्मू और कश्मीर, भारत में पवित्र बौद्ध ग्रंथों का पाठ, मणिपुर का संकीर्तन, अनुष्ठान गायन, ढोल नगाड़ा और नृत्य, पंजाब में जंडियाला गुरु के ठठेरों के बीच बर्तन बनाने का पारंपरिक पीतल और तांबे का शिल्प, योग, कुंभ मेला और नवरोज, नोवरूज, नाउरोज, नॉरूज, नवरोज, नौरीज, नूरुज, नॉरूज, नवरूज, नेवर्ज, नॉरूज, नवरूज (भारत सहित, 21 मार्च को 12 देशों में नए साल का जश्न) शामिल है।
मिली जानकारी के मुताबिक, पेरिस में 13 से 18 दिसंबर तक आयोजित हो रही अंतर सरकारी समिति के 16 वें सत्र के दौरान दुर्गा पूजा को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया है। धर्म, लिंग और आर्थिक तबके की बाधाओं को पार करते हुए इसके सर्व-समावेशी दृष्टिकोण के लिए इसकी विशेष रूप से प्रशंसा की गई है।दरअसल, दुर्गा पूजा के दौरान बंगाल की राजधानी कोलकाता के मध्य से शुरू कर पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक धूमधाम से बनाई जाती है।
गौरतलब है  पश्चिम बंगाल में हर साल शारदीय नवरात्रि के समय दुर्गा पूजा का धूमधाम  और हर्षोल्लास से आयोजन किया जाता है। इस दौरान 9 दिनों तक मां शक्ति की आराधना की जाती है। पश्चिम बंगाल में जगह-जगह भव्य पंडाल तैयार किए जाते हैं। विभिन्न शहरों में होने वाली दुर्गा पूजा की रौनक देखती ही बनती है।  बड़े-बड़े पंडाल और आकर्षक मूर्तियों के साथ शानदार तरीके से बंगाली समाज देवी दुर्गा की पूजा करता है। बंगाल में बहुत पुराने समय से दुर्गा पूजा हो रही है। बताया जाता है कि बंगाल से ही देश के दूसरे हिस्सों में दुर्गा पूजा आयोजित करने का चलन शुरू हुआ था। आज भी पश्चिम बंगाल जैसी दुर्गा पूजा कहीं नहीं होती।  पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा आयोजित करने की शुरुआत को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं।
बताते हैं पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की शुरुआत 1757 के प्लासी के युद्ध के बाद हुई थी। प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों की जीत पर भगवान को धन्यवाद देने के लिए पहली बार दुर्गा पूजा का आयोजन किया गया था। प्लासी के युद्ध में बंगाल के शासक नवाब सिराजुद्दौला की हार हुई थी। बंगाल में मुर्शिदाबाद के दक्षिण में 22 मील दूर गंगा किनारे प्लासी नाम की जगह है।इसी स्थान पर 23 जून 1757 को नवाब की सेना और अंग्रेजों के बीच युद्ध हुआ। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में युद्ध लड़ा और नवाब सिराजुद्दौला को शिकस्त दी। युद्ध में जीत के बाद रॉबर्ट क्लाइव ईश्वर को धन्यवाद देना चाहता था। उस वक्त अंग्रेजों के
हिमायती राजा नव कृष्णदेव सामने आए। उन्होंने रॉबर्ट क्लाइव के सामने भव्य दुर्गा पूजा आयोजित करने का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव पर रॉबर्ट क्लाइव भी तैयार हो गए थे। उसी वर्ष पहली बार कोलकाता में दुर्गा पूजा का आयोजन किया गया था।
    (लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)                                        

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