बुनकर कपड़ो की गुणवत्ता से न करे कोई समझौता :  नितिन गडकरी

@ chaltefirte.com                 नई दिल्ली । बुनकर कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने के लिए दिल्ली दो दिवसीय उनके नीति विचार मंथन का आयोजन हुआ जिसमें केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी शामिल हुए। नितिन गडकरी ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि बुनकर कबीर समाज की विसंगतियों पर चोट करते थे। बुनकरों का ध्यान रहता था कि धागा जहां कहीं टूटे, उसे ढंग से जोड़ते जाओ, ऐसा जोड़ो कि धागा धागे में मिल जाए, कोई गांठ न पड़े, फिर टूटने की सम्भावना भी न रहे।  यही कबीर के समाज का सूत्र भी है। कबीर का यह संकल्प बाद में महात्मा गांधी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपना लिया। गांधी का चरखा तो पंडित दीनदयाल का अंत्योदय कार्यक्रम अभियान इसी कड़ी का हिस्सा है। केंद्रीय सड़क व परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने महात्मा गांधी और पंडित दीनदयाल के कामों का उदाहरण देते हुए बुनकरों को अपने पैरों पर खड़े होने के कई रास्ते सुझाए।
केंद्रीय मंत्री गडकरी ने कहा कि कपड़े के क्षेत्र में वहीं आगे बढ़ सकता है जिसकी कपड़े की गुणवत्ता बेहतर हो। उन्होंने बुनकरों से कहा कि कपड़े की गुणवत्ता पर कभी समझौता न करे। पावरलूम को टक्कर देने के लिए कपड़े की गुणवत्ता बेहतर होना जरूरी है। इसके सरकार से जो भी मदद की बात होगी, बुनकरों के लिए बनने वाली नीति में वह सामने रखेंगे। इतना ही नहीं उन्होंने बुनकरों को नसीहत का पाठ भी पढ़ाया। उन्होंने कहा कि केवल सरकार के भरोसे न रहे, अपना रास्ता खुद बनाए। इसके लिए आधुनिक संयंत्रों का इस्तेमाल करने से न चूके। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने गांधी जी और दीनदयाल की बातों का उदाहरण देते हुए कहा कि दोनों यह चाहते थे कि ज्यादा से ज्यादा उत्पादन हो, लेकिन इस उत्पादन में ज्यादा से ज्यादा लोगों का सहयोग होना चाहिए। इससे लोगों को रोजगार मिलेगा। केंद्रीय मंत्री ने बुनकर समाज से यह वादा किया कि इस क्षेत्र के प्रोत्साहन के लिए जो भी नीतियां बनाई जाएगी, उसमें बुनकर समाज के सुझाव को सरकार के सामने रखने में मदद करेंगे। वहीं इस मौके पर मौजूद बुनकर विकास व अनुसंधान संगठन के अध्यक्ष विजय भारती ने कहा कि औद्योगिक विकास की लहर गाँव में पहुँच जाने से बुनकरों को रोटी के लाले पड़ गये हैं। बुनकर अपने मूल कार्य को छोड़ते जा रहे हैं और दूसरे धंधे अपनाने को बाध्य हो रहे हैं। अगर इस समाज को सरकारी सुविधाएं मिल जाएं, तो ये लोग रोजी-रोटी की कठिनाइयों से पार पा सकते हैं। इनके नष्ट होते उद्योगों को बचाने के लिए बैंकों से सस्ते ब्याज की दर पर ऋणों की सुविधा दी जानी चाहिए। साथ ही इनके बुनाई के पारंपरिक औजारों में आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ाकर उन्हें प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
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