पोप के स्वागत पर उनके गुनाह भी उन्हें सुनाइये

विष्णुगुप्त

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने राजनीति क्रियाकलापों से अचंभे में डालते रहे हैं, अपने चाहने वालों को ही नहीं, अपने विरोधियों की उम्मीदों और आकलनों को ध्वस्त करते रहे हैं। किसी ने यह उम्मीद तक नहीं की थी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बिना निमंत्रण या फिर कोई कूटनीतिक पहल के बिना पाकिस्तान पहुंच जायेंगे और नवाज शरीफ से दोस्ती के कुलांचे भरंेंगे।प्रांरभ से ही नरेन्द्र मोदी की छवि और राजनीतिक क्रियाकलाप पाकिस्तान को सबक सिखाने और उसे जैसा को तैसा के रूप में जवाब देने की थी, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने अपने कड़े रूख से जनता को प्रभावित कर ही प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल की थी। यही कारण था कि उनकी उस पाकिस्तान कूटनीति की काफी आलोचना हुई थी और उनके समर्थकों को भी मंुंह पर पट्टी लगानी पड़ी थी। सिर्फ पडोसियों और अतंतर्राष्टीय कूटनीति में ही उन्होने भौचक नहीं किया बल्कि आंतरिक राजनीति और निर्णयों में भी अप्रत्याशित कदम उठाये हैं। नोटबंदी भी उनका अप्रत्याशिक कदम था, धारा 370 की समाप्ति भी अप्रत्याशित थी। जब नरेन्द्र मोदी ने अचानक घोषणा की थी कि वे राममंदिर आधारशिला कार्यक्रम में जायेंगे तो फिर देश में भुचाल आ गया था, उनके इस कदम को सांप्रदायिक बताया गया था, पंथनिरपेक्ष संविधान के खिलाफ बताया गया था, मुसलमानों को दबाने जैसा राजनीतिक कदम बताया गया था, यह भी कहा गया था कि प्रधानमंत्री को पंथनिरपेक्षता का पालन करते हुए रामजन्म भूमि आधारशिला रखने नहीं जाना चाहिए। पर नरेन्द्र मोदी उन आलोचनाओं से डरे नहीं, उन आलोचनाओं की परवाह तक नहीं की, उन आलोचनाओं को खारिज करने का काम किया। नरेन्द्र मोदी शान से अयोध्या गये और राममंदिर निर्माण की आधारशिला भी रखी और भगवान राम के प्रति अपना समर्पण और संवेदनाओं को भी प्रदर्शित किया। इसके साथ ही साथ उन्होंने भगवान राम के विरोधियों को भी अप्रत्यक्ष तौर पर नसीहतें दी और कहा था कि हमारी संस्कृति वंदनीय है।
अब नरेन्द्र मोदी ने फिर एक अप्रत्याशित कदम उठाया है, अपने विरोधियों ही नहीं बल्कि अपने समर्थकों को भी भौचक कर दिया है, आश्चर्य में डाल दिया है, भारतीय राजनीति भी भौचक है, कहीं खुशी और कहीं गम वाली स्थिति है। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि नरेन्द्र मोदी ने इस बार कौन सा अप्रत्याशित और भौचक करने जैसा कदम उठाये है, जिसकों लेकर भारतीय राजनीति में कहीं खुशी और कहीं गम की स्थिति है और नरेन्द्र मोदी के समर्थक भी खासे आक्रोशित है। यह कदम हैै वेटिकन सिटी जाकर पोप को आमंत्रण देना। जब नरेन्द्र मोदी अंतर्राष्टीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए इटली जा रहे थे तो किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि वे वेटिकन सिटी के पोप से भी मिलेंगे, पोप के साथ बैठ कर दुनिया की समस्याओं पर चर्चा करेंगे, दुनिया की शांति के लिए मिल कर काम करने की बात करेंगे, इतना ही नहीं बल्कि वेटिकन पोप को भारत आने का निमंत्रण देंगे। नरेन्द्र मोदी ने वेटिकन पोप को भारत आने का निमंत्रण दिया और वेटिकन पोप ने भारत आने का निमंत्रण स्वीकार भी कर लिया है। अब पोप भविष्य में कभी भी भारत का दौरा कर सकते हैं। पोप का भारत आने का निमंत्रण स्वीकार कर लेना बड़ी चर्चा का विषय है। एक ओर जहां ईसाई समुदाय के लोग बड़े खुश हैं और खुशियां भी मनायी जा रही है वहीं दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी के समर्थकों में उबाल है, हिन्दूवादी संगठनों की नाराजगी भी आसमान छू रही है।
अब यहां यह प्रश्न खड़ा हो रहा है कि आखिर इस अप्रत्याशित कदम की आवश्यकता क्या थी? आखिर किस दृष्टिकोण से नरेन्द्र मोदी ने पोप को आमंत्रण दिया और पोप के स्वागत के लिए आतुर हुएं। हर कदम के पीछे किसी न किसी उद्देश्य की पूर्ति की आकंाक्षा होती है, भविष्य के लक्ष्य निहित होते हैं। इसलिए यह कहा जाना ही चाहिए कि इस कदम के पीछे किसी न किसी बड़े उद्देश्य की पूर्ति की आकंाक्षा जरूर होगी, भविष्य की रणनीति और लक्ष्य निहित जरूर होगें। वास्तव में नरेन्द्र मोदी अपने विरोधियों और अपने लक्ष्य की ओरं जाने वाले मार्ग में आने वाली चुनौतियों पर पहले प्यार और प्रशंसा बरसाते हैं। हिन्दी में एक कहावत है कि पानी पिला-पिला कर मारूंगा। इस कहावत का अर्थ है कि मारूंगा जरूर और तुम्हारा संहार जरूर करूंगा पर प्यार से करूंगा। ठीक ऐसी ही रणनीति नरेन्द्र मोदी की रहती है। ऐसी रणनीति उनकी सफल भी होती है। हालांकि ऐसी उनकी रणनीतियों पर प्रकाश अभी तक डाला नहीं गया है और न ही अभी तक कोई चाकचौबंद पड़ताल ही हुई है। तो पहले मोदी के पाकिस्तान रणनीति की ही पड़ताल कर लीजिये। जब नरेन्द्र मोदी बिना बुलाये और बिना किसी कूटनीति पहल के ही नवाज शरीफ से मिलने पाकिस्तान पहुंचे थे और नवाज शरीफ की मां के चरण स्पर्श किये थे तब भारतीय मीडिया और भारतीय राजनीति की प्रतिक्रिया क्या थी? प्रतिक्रिया बहुत ही जहरीली थी, अपमानजनक थी। नरेन्द्र मोदी के बारे में कहा गया था खोदा पहाड़ और निकली चुहिया, छप्पण इंच का सीना तो दस इंच का भी नहीं रहा, यह तो पाकिस्तान और आतंकवादियों की चरणवंदना तक करने लगा।
पर जब पाकिस्तान को सबक सिखाने की बारी आयी तो वे पीछे नहीं हटे। पाकिस्तान को कड़़ा सबक सिखाया। याद कीजिये नरेन्द्र मोदी को पाकिस्तान को जबाब देने की कार्रवाई को। नरेन्द्र मोदी ने कोई एक बार नहीं बल्कि दो-दो बार पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर जवाब दिया है। दो-दो सर्जिकल स्टार्इक किया। एक बार थल सेना ने पाकिस्तान में घुसकर आतंकवादी शिबिरो का संहार किया और आतंकवादियों को मौत के घाट उतारा फिर एयरफोर्स ने पाकिस्तान पर सर्जिकल स्टार्इक की थी। जब अभिनंदन को पाकिस्तान ने बंदी बनाया था तब नरेन्द्र मोदी ने एक दिन का समय दिया था। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के पसीने छूट गये थे। सकुशल अभिनंदन की रिहाई करायी थी। धारा 370 को समाप्त कर पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाया, जिसे पाकिस्तान कभी भी भूल नहीं सकता। नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि हमनें पाकिस्तान जाकर दोस्ती के हाथ बढाये थे पर पाकिस्तान नहीं माना तो फिर उन्हें शक्ति दिखानी पड़ी। दुनिया के नियामक भी नरेन्द्र मोदी के तर्क को खारिज नही ंकर सकें। दुनिया में भारत के समर्थक बढ़े और भारत की साख बढ़ी।
ईसाइयत भी भारत में तरह-तरफ की अफवाहें उड़ाती रही हैं। ईसाइयत अपनी करतूतों को ढकने के लिए और अपनी करतूतों को जारी रखने के लिए तरह-तरफ की मनगढंत आरोप लगाती रही हैं। दुनिया की ईसाई संगठन भारत में असहिष्णुता को लेकर सक्रिय रही हैं और असहिष्णुता पर भारत की छवि खराब करते रहते हैं। इस कारण दुनिया की बडी नियामकें और संगठन भारत पर किचडें उछालते रहें हैं। धार्मिक स्वतंत्रता पर उंगलियां उठाते रहे हैं। इस कारण भारत को अंतर्राष्टीय स्तरों पर परेशानी का सामना करना पड़ता है।
मतांतंरण को लेकर ईसाई संगठन आलोचना के घेरे में रहते हैं। उनकी आलोचना इस आधार पर होती रहती है कि वे लोभ और लालच देकर गरीब और अनपढ़ लोगों का मंतातंरण करा रहे हैं। ऐसे ही विवाद में उड़ीशा के अंदर एक अप्रिय घटना घटी थी। उस अप्रिय घटना मंें एक विदेशी पादरी की उसके दो लड़कों सहित हत्या कर दी गयी थी। उड़ीशा में ईसाई पादरियों पर हिन्दू संत लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार शिष्यों की हत्या का आरोप भी था। विदेशी पादरी के हत्यारे तो बीस साल से जेल में हैं पर हिन्दू संत लक्ष्मणानंद सरस्वती के हत्यारे ईसाई पादरियों और उनके शिष्य बच गये। खास कर जंगली क्षेत्रों में ईसाई संगठन मंतातंरण का खेल-खेल रहे हैं, बड़े पैमाने पर मंतातंरण करा रहे हैं। झाड-फूक के नाम पर बड़ी-बड़ी बीमारियों को ठीक करने का लालच देकर धर्मातंरण कराया जाता है। झांडफूक वाली इनकी बीमारी बहुत ही विषाक्त है। मदर टरेसा को संत की पदवि मिली थी। यह पदवी वेटिकन सिटी ने दी थी। वेटिकन सिटी ने तब कहा था कि मदर टेरसा के स्पर्श मात्र से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी ठीक हो जाती है, इसी कारण उन्हें संत की पदवी दी जा रही है। यह सरासर झूठ था और अंधविश्वास पर आधारित था। अगर मदर टरेसा के स्पर्शमात्र से कैंसर की बीमारी ठीक हो जाती तो फिर वेटिकन सिटी द्वारा कम से कम इटली के सभी कैंसर और अन्य अस्पतालों में ताले डलवा देना चाहिए था। भारत में एक ऐसा पादरी भी है जिस पर अमेरिका में अपंग सैकड़ों बच्चियों का यौन उत्पीड़न का आरोप है। जब अमेरिका में उस पादरी पर जांच प्रारंभ हुई तब वेटिकन सिटी ने उस पादरी को भारत में भेजकर उसे छिपा दिया। बाद में वह पादरी कहता है कि वर्षों पुरानी घटना में वह सहयोग नहीं करेगा और न ही किसी जांच में शामिल होगा। इधर ईसाई स्वयं सेवी संस्थान विदेशों से समाजसेवा के नाम पर मिले धन को ईसाईकरण पर खर्च कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कुछ बंदिशें लगायी है। जिसके कारण ईसाई स्वयं सेवी संस्थानों को कुछ परेशानियां जरूर हो रही हैं।
नरेन्द्र मोदी का यह कदम राजनीति से भी प्रेरित हो सकता है। ईसाई आबादी को अपना समर्थक बनाने की इच्छा भी हो सकती है। गोवा विधान सभा चुनाव सिर पर है। गोवा में ईसाई ही सत्ता समीकरण बनाते हैं। इसके अलावा वन क्षेत्रों में वनवासियों के बीच ईसाईयों की पकड़ मजबूत है। वन क्षेत्रों की आबादी को नरेन्द्र मोदी खुश करना चाहते होंगें। इसके अलावा भविष्य में ईसाई संगठनों को कानून के दायरे में बांधने की भी इच्छा हो सकती है। पोप का स्वागत कर नरेन्द्र मोदी दुनिया को यह संदेश देना चाहते होंगे कि उनके देश में धार्मिक स्वतंत्रता बाधित नहीं है बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता गतिशील है। फिर ईसाई संगठनों को भी कानूनी तौर पर तोलेंगे।
वेटिकन पोप के स्वागत में कोई हर्ज नहीं है। इसमें कोई विरोध की बात नहीं है। पर हमारी भी कुछ जिम्मेदारियां हैं। अगर हम वेटिकन पोप का स्वागत कर रहे हैं तो हमें उन्हें यह भी अहसास कराना होगा कि वे हमारे लिए भस्मासुर नहीं बनें। लोभ-लालच देकर ईसाईकरण का खेल बंद करें। अंधविश्वास के आधार पर संत का सर्टिफिकेट बांटना बंद करें। अगर नरेन्द्र मोदी ऐसा संदेश वेटिकन के पोप को दे पाये ंतो फिर यह राष्ट के प्रति बहुत ही प्रशंसनीय कार्य माना जायेगा।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार व चिंतक हैं)

 

 

 

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