ब्राह्मण बनेंगे यूपी के तारणहार

बाल मुकुन्द ओझा

बताते है दिल्ली का रास्ता यूपी होकर जाता है। इसे ही ध्यान में रखते हुए सियासी दलों ने अपनी तैयारियां शुरू की है। यूपी इस समय जातीय संघर्ष के महाभारत में डूबकी लगा रहा है। सभी राजनैतिक पार्टियों ने सिद्धांतों और विचारों के इतर जात- पांत को जीत के मूल मंत्र रूप में स्वीकार कर लिया है और तदनुरूप अपनी गतिविधियां बढ़ा दी है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का शंखनाद बज चुका है। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी रणनीतियां बनाना शुरू कर दिया है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जातियों की सियासत जोर शोर से शुरू हो गयी है। जातियों की बहती गंगा में हाथ धोने के लिए सभी सियासी दलों में होड़ सी मच गयी है। इस जातीय महासंग्राम में एक दूसरे को पछाड़ने के लिए राजनीतिक पार्टियों ने अपनी कमर कसनी शुरू करदी है। चुनावी हथियार निकाल लिए है और प्रहार शुरू कर दिए है। सब जानते है केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के लिए रास्ता यहीं से जाता है। यहाँ विधानसभा चुनाव अगले साल होने है मगर राजनीतिक दलों ने अपनी चुनावी तैयारियां अभी से प्रारम्भ करदी है।
उत्तर प्रदेश ब्राह्मणों का गढ़ रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर 1990 तक उनका वर्चस्व रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन में ब्राह्मणों की बड़ी भूमिका थी। यूपी में ब्राह्मण एक बड़ा वोट बैंक है, जो किसी भी राजनैतिक दल की किस्मत बदल सकता है। इस चुनाव में भी सभी पार्टियां ब्राह्मण कार्ड खेलने को तैयार हैं। ब्राह्मण वोट बैंक यहाँ लगभग हर जिले में है। विशेषकर फैजाबाद, वाराणसी, गोरखपुर, गाजीपुर, गोंडा, बस्ती, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर, जौनपुर, कानपुर, रायबरेली, फर्रुखाबाद, कन्नौज, उन्नाव, लखनऊ, सीतापुर, बाराबंकी, हरदोई, इलाहाबाद, सुल्तानपुर, प्रतापगढ, अमेठी आदि जिले भी इस वोट बैंक का गढ़ हैं। इसी भांति हमीरपुर, हरदोई, जालौन, झांसी, चित्रकूट, ललितपुर, बांदा आदि इलाकों में ब्राह्मणों का बोलबाला हैं। इस तरह प्रदेश के लगभग 30 जिलों में इस वर्ग के मतदाताओं महत्वपूर्ण भूमिका है।
उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी दल ब्राह्मण वोटरों पर दांव लगाने में जुटे हैं। यूपी में एक बार फिर ब्राह्मणों की पूछ शुरू हो गयी है। इस बार ब्राह्मण मतों पर सबकी निगाहें टिकी है। ब्राह्मण वोटों के लिए सियासी संग्राम छिड़ गया है। चुनाव से पहले सभी दलों ने ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने के लिए संग्राम छेड़ दिया है। ब्राह्मण मतों को लुभाने के लिए सियासी दांव पेच भी शुरू हो गए है। बड़े बड़े ब्राह्मण सम्मलेन बुलाये जा रहे है जिनमें कमंडल लिए साधु संतों को दिखाया जा रहा है। कहा जा रहा है भगवान राम के मुद्दे पर यूपी के ब्राह्मणों का बड़ा वर्ग भाजपा के साथ है जिनकी काट के लिए बसपा और सपा ने ब्राह्मण राजनीति शुरू करदी है। सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस ने ब्राह्मणों का गुणगान करना शुरू कर दिया है। उत्तरप्रदेश की सियासत में इन दिनों हर तरफ ब्राह्मण वोटों की चर्चा रही है। नेता और पार्टियां उठते बैठते ब्राह्मणों की माला जपने लगे है। भगवान परशुराम के नाम पर मूर्तियां बनवाने की बात होने लगी है। भाजपा ने ब्राह्मणों के लिए जीवन बीमा और हेल्थ इंश्योरेंस कराने की घोषणा कर दी है।
उत्तर प्रदेश की सियासत में लंबे समय तक सत्ता की कमान ब्राह्मणों के हाथों में रही है। नारायण दत्त तिवारी के बाद यूपी में कोई भी ब्राह्मण समुदाय से मुख्यमंत्री नहीं बन सका। प्रदेश में पिछले तीन दशकों से राजनीतिक पार्टियों के लिए ब्राह्मण समुदाय एक वोटबैंक बनकर रह गया है। भाजपा के बाद बसपा ने यूपी में ब्राह्मण सम्मेलन का आगाज कर दिया है। भाजपा तथा बसपा के बाद सपा और कांग्रेस ब्राह्मण समुदाय को साधने में जुट गई हैं। आजादी के बाद यूपी में कांग्रेस में ब्राह्मण सियासत का बोलबाला रहा है। 1989 यूपी में छह ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने। इनमें गोविंद वल्लभ पंत, सुचेता कृपलानी, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीपति मिश्र और नारायण दत्त तिवारी बने शामिल थे। इनमें नारायण दत्त तिवारी तीन बार यूपी के सीएम रहे।
उत्तर प्रदेश की सियासत जातियों के ईर्दगिर्द ही घूमती रही है। यूपी चुनाव में जातीय समीकरण शुरु से ही अहम भूमिका निभाता आया है, ऐसे में सभी पार्टियां अपनी चुनावी रणनीति जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए ही बनाती हैं। राजनीति में जातीय समीकरण का बड़ा खेल हमेशा से माना जाता रहा है। यूपी में ओबीसी और दलितों के बाद सबसे ज्यादा 23 प्रतिशत आबादी सवर्णों की है। सवर्ण यानी ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, भूमिहार, कुछ बनिया, आदि। इनमें भी सबसे ज्यादा ब्राह्मण (11-13 फीसदी), फिर राजपूत (7-8 फीसदी), कायस्थ (करीब 2.25 फीसदी) और अन्य अगड़ी जातियां (करीब 2.75 फीसदी) हैं।

 

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