ग्रामीण क्षेत्रों में ऑनलाइन पढाई वरदान या अभिशाप

बाल मुकुन्द ओझा

देश में कोरोना संकट ने सबसे ज्यादा पठन पाठन पर असर डाला है। ऑनलाइन पढाई जरूर हुई मगर साधनों के भाव में यह ज्यादा सफल नहीं हुई। देश भर में कोरोना संकट के कारण बंद हुए स्कूलों के बाद एक सर्वेक्षण से सामने आया है कि ग्रामीण परिवारों के केवल आठ प्रतिशत बच्चें ही ऑनलाइन कक्षाओं में शामिल होते हैं। नगरीय क्षेत्रों में ज्यादातर छात्रों के अभिभावकों ने मोबाईल, लैपटॉप जैसी उपकरण का इंतजाम अपने बच्चों के लिए कर लिए लेकिन इन सुविधाओं से कोसों दूर गांव के छात्रों के लिए ये उतना ही कठिन रहा। सरकार ने तो मोबाइल के जरिए पढ़ाई की घोषणा कर दी लेकिन इस बात से अनजान बने रहे कि आज भी बहुत से ऐसे गांव हैं जहां के लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती, ऐसे में उनके पास स्मार्ट मोबाइल फोन होना दूर की कोड़ी के सामान है। इन सब का परिणाम ये रहा कि जब से ऑनलाइन पढ़ाई की शुरूआत हुई है तब से देश के 37 प्रतिशत छात्रों का पढ़ाई से नाता टूट गया।
अगस्त 2021 में आयोजित स्कूल चिल्ड्रन ऑनलाइन एंड ऑफ लाइन लर्निंग (स्कूल) नामक यह सर्वेक्षण किया गया जिसमें सामने आया कि 37 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं जो ऑनलाइन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं पढ़ पा रहे है। स्कूल चिल्ड्रन ऑनलाइन एंड ऑफलाइन लर्निंग की टीम ने कुल 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सर्वेक्षण किया है। जिसमें दिल्ली, हरियाणा, बिहार, उत्तर प्रदेश, चंडीगढ़, असम, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में वंचित समाज के परिवारों के 1,400 स्कूली बच्चे शामिल हैं। इससे सामने आया कि ग्रामिण क्षेत्रों में केवल 8 प्रतिशत ही ऐसे बच्चे हैं जो ऑनलाइन पढ़ पा रहे हैं। वहीं ज्यादातर बच्चों के माता-पिता का कहना है कि स्कूल जल्द से जल्द फिर खोल देना चाहिए। सर्वेक्षण रिपोर्ट कहता है कि पढ़ाई की इस क्षति की भरपाई के लिए वर्षों तक काम करना पड़ेगा। हालांकि कई राज्यों में कुछ नियमों के साथ अब स्कूल फिर से खोले जा रहे हैं, इससे उम्मीद की जाती है कि शिक्षा के स्तर में जल्द सुधार देखा जाएगा।
कोरोना काल में सबसे ज्यादा हमारी शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हुई है। कोविड 19 ने पूरी शिक्षा व्यवस्था को एकदम नई और तकनीकी पर आश्रित कर दिया है। कोरोना संकट के दौर में शैक्षणिक संस्थानों के आगे जो चुनौती है उसमें ऑनलाइन एक स्वाभाविक विकल्प है। आज शिक्षा और पठन-पाठन से जुड़ा हुआ हर शख्स मोबाइल, आईपैड्स, लैपटॉप्स, डेक्सटॉप्स, टैब्स पर आ चुका है। शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्ति को सफल जीवन जीने के लिए सशक्त बनानां, परिवार, समाज, राष्ट्र के लिए सर्वश्रेष्ठ योगदान देना है। कोरोना की वैश्विक महामारी के दौर में भारत में शिक्षक और शिक्षार्थी नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। स्कूल, कॉलेज विश्वविधालय बंद पड़े है। शिक्षण व्यवस्था ठप्प पड़ी है। छात्र और शिक्षक आमने सामने बैठकर कब पढ़ेंगे अभी कोई तय नहीं है। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षण के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
स्कूल वह संस्था है जहाँ बच्चा अपने जीवन के सर्वांगीण विकास और प्रगति का ककहरा सीखता है। यह कच्ची उम्र है जहाँ सीखने को बहुत कुछ है। प्रारंभिक अवस्था में बच्चों को एक स्वतंत्र और गतिशील वातावरण की आवश्यकता होती है ऐसे में वह घर की चाहरदीवारों में कैद हो कर मनोवैज्ञानिक दबावों से जूझ रहे हैं।
कोरोना महामारी से पूर्व भारत के अधिकांश शिक्षण संस्थानों को ऑनलाइन शिक्षा का कोई विशेष अनुभव नहीं रहा है, ऐसे में शिक्षण संस्थानों के लिये अपनी व्यवस्था को ऑनलाइन शिक्षा के अनुरूप ढालना और छात्रों को अधिक-से-अधिक शिक्षण सामग्री ऑनलाइन उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती होगी। वर्तमान समय में भी भारत में डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की बहुत कमी है, देश में अब भी उन छात्रों की संख्या काफी सीमित है, जिनके पास लैपटॉप या टैबलेट कंप्यूटर जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। अतः ऐसे छात्रों के लिये ऑनलाइन कक्षाओं से जुड़ना एक बड़ी समस्या है। शिक्षकों के लिये भी तकनीक एक बड़ी समस्या है, देश के अधिकांश शिक्षक तकनीकी रूप से इतने प्रशिक्षित नहीं है कि औसतन 30 बच्चों की एक ऑनलाइन कक्षा आयोजित कर सकें और उन्हें ऑनलाइन ही अध्ययन सामग्री उपलब्ध करा सकें। इंटरनेट पर कई विशेष पाठ्यक्रमों या क्षेत्रीय भाषाओं से जुड़ी अध्ययन सामग्री की कमी होने से छात्रों को समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। कई विषयों में छात्रों को व्यावहारिक शिक्षा की आवश्यकता होती है, अतः दूरस्थ माध्यम से ऐसे विषयों को सिखाना काफी मुश्किल होता है।
अभिभावकों को यह समझना होगा डिजिटल पढ़ाई अतिरिक्त ज्ञान के लिए है न की सर्वांगीण विकास के लिए। अभी कोरोना के कारण स्कूलों का सञ्चालन नहीं हो रहा है मगर जल्द ही इस स्थिति में बदलाव आएगा और हमें अपने बच्चों को हमेशा की तरह स्कूल भेजना है तभी बच्चा अपने जीवन को सार्थक बना पायेगा।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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