सभी बेटियों के लिए प्रेरणास्रोत है अवनि का गोल्डन सफर

पैरालम्पिक में दो पदक जीतने वाली पहली महिला खिलाड़ी हैं अवनि

 योगेश कुमार गोयल

टोक्यो पैरालम्पिक में भारतीय खिलाडि़यों ने कमाल का प्रदर्शन किया और सबसे बड़ा कारनामा कर दिखाया भारत की पैरा शूटर अवनि लखेरा ने, जो 5 सितम्बर को पैरालम्पिक के समापन समारोह में भारतीय ध्वजवाहक बनी। दरअसल अवनि ने इस पैरालम्पिक में दो-दो पदक जीतकर ऐसा इतिहास रच डाला, जो अब तक ओलम्पिक या पैरालम्पिक के इतिहास में भारत की कोई भी महिला खिलाड़ी नहीं कर सकी है। भारतीय निशानेबाज अवनि लखेरा ने टोक्यो पैरालम्पिक में 30 अगस्त को हुई निशानेबाजी स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता था, जो पैरालम्पिक्स के इतिहास में भारत का शूटिंग में पहला स्वर्ण पदक था। अवनि ने 21 निशानेबाजों के बीच 7वें पायदान पर रहते हुए फाइनल में अपनी जगह बनाई थी और महिलाओं के आर-2 10 मीटर एयर राइफल क्लास एसएच-1 में फाइनल मैच में उनका मुकाबला चीन की झांग कुइपिंग और यूक्रेन की इरियाना शेतनिक से था। अवनि ने 249.6 प्वाइंट प्राप्त कर न केवल चीन की शूटर को पराजित करते हुए स्वर्ण पर कब्जा जमाया बल्कि यूक्रेन की खिलाड़ी के वर्ष 2018 के विश्व रिकॉर्ड की बराबरी भी की। अवनि की जीत के बाद चीन की झांग कुइपिंग को रजत और यूक्रेन की इरियाना शेतनिक को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा।
व्हील चेयर पर होते हुए भी जयपुर की अवनि ने महज 19 वर्ष की आयु में निशानेबाजी में 30 अगस्त को भारत के लिए पहला पैरालम्पिक स्वर्ण पदक जीतने के बाद जब 3 सितम्बर की निशानेबाजी स्पर्धा में कांस्य पदक भी भारत के नाम किया तो उनकी इस उपलब्धि पर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। दरअसल इस जीत के साथ ही अवनि एक ही पैरालम्पिक में दो पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बन गई। हालांकि पुरूषों की स्पर्धा में अवनि से पहले यह कारनामा जोगिंदर सिंह सोढ़ी कर चुके हैं, जिन्होंने 1984 के पैरालम्पिक में एक रजत और दो कांस्य पदक (गोला फैंक में रजत और चक्का फैंक तथा भाला फैंक में कांस्य) जीते थे। वह किसी भी पैरालम्पिक में खेलों के एक ही चरण में कई पदक जीतने वाले पहले भारतीय थे। अवनि ने टोक्यो पैरालम्पिक में महिलाओं की 50 मीटर राइफल 3 पोजीशन एसएच1 स्पर्धा में कांस्य पदक जीता। उस स्पर्धा के फाइनल में 445.9 के स्कोर के साथ वह तीसरे स्थान पर रही।
8 नवम्बर 2001 को राजस्थान के जयपुर में जन्मी अवनि लखेरा के पिता प्रवीण लखेरा राजस्थान के रेवेन्यू विभाग में आरएएस के पद पर कार्यरत हैं। अवनि जब केवल 11 वर्ष की थी, उस दौरान उनके साथ एक दिन ऐसी घटनी घटी, जिसने उनकी जिंदगी को एकाएक गहरे अंधकार में धकेल दिया था। 20 फरवरी 2012 को वह अपने पिता के साथ जयपुर से धौलपुर जा रही थी कि रास्ते में उनकी कार दुर्घटना की शिकार हो गई। उस हादसे में अवनि और उनके पिता को गहरी चोटें लगी। हालांकि पिता तो कुछ समय बाद पूरी तरह ठीक हो गए लेकिन सड़क हादसे में अवनि की रीढ़ की हड्डी टूट गई थी, जिस कारण वह करीब पांच महीने तक अस्पताल में बैड पर ही रही और इलाज के बाद भी जीवन पर्यन्त चलने-फिरने में असमर्थ हो गई। उस दर्दनाक हादसे के बाद अवनि बुरी तरह से टूट गई थी और उसने अपने आप को घर में एक कमरे में बंद कर लिया था लेकिन परिजनों ने हार नहीं मानी और लगातार उसका हौंसला बढ़ाते रहे। उस दौरान अवनि अपनी पढ़ाई-लिखाई पर ही फोकस करने लगी थी लेकिन उसके पिता ने उसे खेलों में भी ध्यान लगाने को प्रेरित किया।
पिता के मार्गदर्शन में जब अवनि ने अभिनव बिंद्रा की जीवनी पढ़ी तो वह इस कदर प्रभावित हुई कि खेलों के प्रति उसके मन में जोश बढ़ गया। आखिरकार एक दिन ऐसा आया, जब वर्ष 2015 में अवनि जगतपुरा स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स में निशानेबाजी की ट्रेनिंग लेने के लिए पहली बार व्हील चेयर पर ही मैदान में उतरी। छोटी सी उम्र में व्हील चेयर पर होने के बावजूद अवनि ने अपनी परिस्थितियों से उसके बाद कभी हार नही मानी और दृढ़ संकल्प की बदौलत पैरालम्पिक में वह करिश्मा कर दिखाया, जिसे कर दिखाने में सामान्य खिलाडि़यों को भी बेहद कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। खेलों के प्रति वह इस हद तक समर्पित हो गई कि अब उन्हें ‘गोल्डन गर्ल’ के नाम भी जाना जाता है। हालांकि वह पढ़ाई-लिखाई में भी काफी अव्वल रहती हैं तथा फिलहाल शूटिंग के साथ-साथ लॉ की पढ़ाई कर रही हैं और आगे राजस्थान सिविल सर्विस में जाना चाहती हैं।
हालांकि शुरुआती दौर में अवनि को व्हील चेयर चलाने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ा क्योंकि वह मानदंडों के मुताबिक नहीं थी, इसके अलावा बंदूक और शूटिंग किट भी उपलब्ध नहीं थी लेकिन अपने दृढ़ संकल्प के साथ वह शूटिंग में बहुत जल्द शानदार प्रदर्शन करने लगी। वर्ष 2015 में अपनी ट्रेनिंग शुरू करने के कुछ महीनों बाद ही अवनि ने राजस्थान स्टेट चैम्पियनशिप में हिस्सा लेकर स्वर्ण पदक जीतकर हर किसी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। मजे की बात रही कि वह चैम्पियनशिप अवनि ने अपने कोच से उनकी राइफल उधार लेकर जीती थी। 2016 में पुणे में आयोजित हुई नेशनल चैम्पियनशिप में अवनि ने कांस्य पदक अपने नाम किया। उसके बाद तो अवनि ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक के बाद एक कई पदक अपने नाम किए। 2018 में 61वीं नेशनल शूटिंग चैम्पियनशिप में भी अवनि ने पदक जीते थे। अपनी कड़ी मेहनत और जुनून के चलते अवनि ने 2016 से 2020 तक कुल पांच स्वर्ण पदक जीते। महिला 10 मीटर एयर राइफल स्टेडिंग एसएच1 में विश्व रैकिंग में वह पांचवें स्थान पर आती हैं।
बहरहाल, टोक्यो पैरालम्पिक में अवनि की दोहरी सफलता ने साबित कर दिया है कि भारत की बेटियां भी अपनी मेहनत और बुलंद हौंसलों के बल पर बड़ी से बड़ी सफलता हासिल करने का सामर्थ्य रखती हैं। दिव्यांग होते हुए भी अवनि ने निरन्तर सघंर्ष किया और उसी का प्रतिफल है कि उन्होंने टोक्यो पैरालम्पिक में दो-दो पदक जीतकर इतिहास रच डाला। 2012 में सड़क दुर्घटना में कमर के नीचे के शरीर को लकवा मार जाने के बावजूद अवनि का गहरे अवसाद से निकलकर कड़ा संघर्ष करने, दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ने और टोक्यो पैरालम्पिक में दो पदक जीतने तक का शानदार सफर हर किसी के लिए प्रेरणास्रोत है। निश्चित रूप से 19 साल की आयु में अवनि की देश को गौरवान्वित करने वाली उपलब्धियां समस्त भारतवर्ष की बेटियों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेंगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा कई पुस्तकों के रचयिता हैं)

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