एमएसपी दरों की घोषणा के साथ ही जरुरी है माकूल खरीद व्यवस्था

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

केन्द्र सरकार ने एक बार फिर रवी फसलों के लिए समय रहते न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा कर दी है। केन्द्र द्वारा घोषित समर्थन मूल्यों में दलहनी फसल मसूर की कीमत में चार सौ रुपए के साथ ही तिलहनी फसल सरसों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में चार सौ रुपए की बढोतरी की है। इसके साथ ही गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 40 रुपए तो जौ के मूल्य में 35 रुपए बढ़ाए हैं। चने में 130 तो सूरजमुखी के मूल्य में 114 रुपए की बढ़ोतरी की है। केन्द्र का यह निर्णय इस मायने में महत्वपूर्ण हो जाता है कि सरकार ने रवी की बुवाई से पहले ही एमएसपी की घोषणा कर किसानों को संदेश दे दिया है। पर लाख टके का सवाल जिंसों की खरीद की व्यवस्था को लेकर ही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले कुछ सालों से कृषि जिंसों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की समय पर घोषणा के साथ ही बढ़ोतरी हो रही है। मूल्य बढ़ोतरी की कम ज्यादा को लेकर मत विमत हो सकता है पर इसका प्रभाव स्पष्ट रुप से सामने आने लगा है। पिछले सीजन में कई जिंसों के मण्डियों में भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक रहे हैं। ऐसे में लाभ होना स्वाभाविक है पर यक्ष प्रश्न यही है कि इसका लाभ वास्तविक किसान को मिला या बिचौलियें ही उठा ले गए।

हांलाकि किसान आंदोलन का प्रमुख पेच एमएसपी पर खरीद को लेकर भी है। सरकार कहती है कि एमएसपी व्यवस्था चालू है और चालू रहेगी वहीं आंदोलनकारी इस पर संदेह व्यक्त करते हैं। एमएसपी को लेकर आंदोलनकारी मुखर है तो सरकार भी इसे लेकर लगातार सफाई देती आ रही है। दरअसल समस्या की जड़ एमएसपी की घोषणा नहीं अपितु एमएसपी की खरीद व्यवस्था को लेकर है। एमएसपी खरीद व्यवस्था की खामियों को दूर कर दिया जाएं तो निश्चित रुप से किसान को उसकी मेहनत का पूरा पैसा मिलने लगेगा। पर दोष सारा व्यवस्था को लेकर है और इसका फायदा बिचौलियें ले जाते हैं। ऐसा नहीं है कि यह समस्या आज की है पर यह समस्या नासूर बन चुकी है। हांलाकि सरकार अब खरीद व्यवस्था को ऑनलाईन करने के साथ ही सीधे खाते में भुगतान करने लगी है पर इसका भी तोड़ निकाला जा रहा है। सीधे किसान से ही खरीद हो इसके लिए गिरदावरी रिपोर्ट व अन्य कदम उठाए जा रहे हैं। पर ढाक के वहीं पात वाली कहावत चरितार्थ हो रही है।

तीन से चार दशक पहले बाजार विशेषज्ञों द्वारा यह माना जाता रहा था कि सरकारी खरीद की घोषणा चाहे वह एमएसपी पर हो या सीधे खरीद की घोषणा, मण्डियों में केवल घोषणा होने मात्र से असर दिखाई देने लगता था। मण्डियों में खरीद घोषणा वाली जिंसों के भावों में तेजी आने लगती थी। इसके बाद अधिक समस्या होने पर सरकार मार्केट इंटरवेंशन योजना में खरीद कर बाजार में संतुलन बनाए रखने का प्रयास करती रही है। पर अब समस्या दूसरी हो रही है। जिंसों के न्यूनतम समर्थन मूल्य अधिक होने के चलते इसका लाभ बिचौलिएं अधिक उठाने लगे हैं। सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद ऐसे समाचार आम है कि जिस क्षेत्र में पैदावार होने का कृषि मंत्रालय का आंकलन होता है उससे अधिक जिंस एमएसपी पर खरीद होने लगी है। इससे साफ हो जाता है कि कहीं कुछ व्यवस्था में दोष तो है। यह भी साफ है कि इसका फायदा गरीब और छोटा किसान तो नहीं उठा पाता है। ऐसे में वह अपने को ठगा महसूस करता है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद व्यवस्था का वास्तविक लाभ किसानों तक पहुंचाना ही है तो सरकार को फूलप्रूफ व्यवस्था करनी ही होगी। इसके लिए सरकारी खरीद नेटवर्क को इस तरह से तैयार करना होगा जिससे फसल आने के बाद न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे भाव जाने लगे तो तत्काल बिना किसी औपचारिकता के खरीद आरंभ कर दी जाएं तो समस्या का समाधान हो सकता है। होता यह है कि एमएसपी तो समय से घोषित हो गई पर खरीद कब से होगी यह निर्णय समय पर नहीं हो पाता। इससे छोटा किसान जिसे पैदावार आते ही उसे बेचना होता है वह इसका लाभ नहीं उठा पाता। क्योंकि एक तो उसकी अपनी रुपए पैसे की जरुरत और दूसरी उसके पास फसल को रखने के लिए भण्डारण क्षमता नहीं होती तो तीसरी यह कि साहूकार या अन्य संस्था से लिया कर्जा चुकाने की बाध्यता। इन सबके चलते उसे तो फसल तैयार होते ही बेचने को मजबूर होना पड़ता है। ऐसे में सरकार को यह व्यवस्था सुनिश्चित कर देनी चाहिए कि ज्योंही फसल के भाव कम आएं त्योंही तत्काल खरीद शुरु हो जाए। इसमें इसलिए भी परेशानी नहीं हो सकती कि मण्डियों में चल रहे भावों का विश्लेषण समय रहते किया जा सकता है तो सरकार के पास यह जानकारी होती है कि किस फसल की कितनी बुवाई हुई है और उसका संभावित उत्पादन कितना होगा। होता यह है कि सरकार की खरीद की घोषणा के साथ ही राज्यों में संस्थाएं सक्रिय होती है और फिर वे खरीद केन्द्रों को चिन्हित करने, उपलब्ध भण्डारण क्षमता का आकलन, बारदानें की व्यवस्था, तुलाई केन्द्रों की व्यवस्था, परिवहन, मानव संसाधन और बैंकों से टाई अप करने में समय गवाने लगती है और इस देरी का खामियाजा किसान को भुगना होता है। इसलिए जब सरकार के पास राज्यों में खरीद एजेंसी पहले से ही तय है तो फिर जिस तरह से समय से पहले न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा की जाने लगी है उसी तरह से खरीद व्यवस्था भी सुनिश्चित कर किसानों को इस व्यवस्था से वास्तविक रुप से लाभान्वित किया जा सकता है। इस दिशा में सरकार को ठोस प्रयास करते हुए दूरगामी योजना समय रहते बनानी होगी और योजना भी ऐसी जो धरातल पर खरी उतर सके।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

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