अपने ही घर में प्रताड़ित हैं बुजुर्ग

बाल मुकुन्द ओझा

हमारे देश में बुजुर्गों को अपने ही घर में प्रताड़ित होने के समाचार निश्चय ही दिल दहलाने वाले है। आश्चर्य की बात तो यह है इन्हें प्रताड़ित करने वाले कोई दूसरे नहीं अपने ही है। इनमें लाखों बुजुर्गों ने अदालतों में अपने ही लोगों के खिलाफ न्याय की गुहार की है। ये बुजुर्ग अपनी बची खुची जिंदगी बिना – विघ्न बाधा परिवारजनों के साथ काटना चाहते है।
नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार देश में बड़ी संख्या में ऐसे बुजुर्ग हैं जो उम्र के अंतिम पड़ाव में कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। वरिष्ठ नागरिकों के 25.02 लाख केस लंबित हैं। इनमें 18.73 लाख सिविल केस और 6.28 लाख आपराधिक मामले हैं। तीन लाख केस तो ऐसे हैं जिसमें बुजुर्ग गुजारा भत्ता पानेे, अपने ही घर में रहने और बच्चों द्वारा मारपीट के खिलाफ संरक्षण के लिए कोर्ट जाने को मजबूर हुए हैं। देश की राजधानी दिल्ली में 10 साल से बुजुर्गों के 200 से अधिक केस निःशुल्क लड़ चुके वकील एनके सिंह भदौरिया कहते हैं कि अदालतों से बुजुर्गों को सम्मान से जीने का हक मिलता है। ज्यादातर मामलों में कोर्ट की फटकार पर दो से तीन सुनवाई में सकारात्मक परिणाम मिल जाते हैं। पिछले कुछ सालों में ऐसे केसों में काफी इजाफा हुआ है।
सीनियर सिटीजन एक्ट 2007 बुजुर्गों को दो विशेष अधिकार देता है। पहला-अगर संतान गुजर-बसर के लिए खर्च नहीं देते हैं तो बुजुर्ग कानूनन उनसे प्रतिमाह भत्ता लेने के लिए कोर्ट जा सकते हैं। दूसरा-बच्चे बुजुर्गों को घर से नहीं निकाल सकते हैं। जबकि बुजुर्गों को यह अधिकार है कि वे परेशान करने पर बालिग संतान को घर छोड़ने के लिए बाध्य कर सकते हैं। इसके लिए बुजुर्ग को एसडीएम से शिकायत करनी होगी या कोर्ट जाना होगा।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के हालिया जारी आंकड़ों के मुताबिक देश में साल 2021 में बुजुर्गों की संख्या 13.8 करोड़ पर पहुंच गयी है। इनमें 6.7 करोड़ पुरुष और 7.1 करोड़ महिलाएं शामिल हैं। बुजुर्गों की आबादी बढ़ने की वजह मृत्यु दर में कमी आना बताई गई है। इस अध्ययन में 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र वाले लोगों को बुजुर्ग माना गया है। सांख्यिकी अध्ययन में कहा गया है कि 2011 में भारत में बुजुर्गों की आबादी 10.38 करोड़ थी, जिसमें 5.28 करोड़ पुरुष और 5.11 करोड़ महिलाएं शामिल थीं। वही साल 2031 में बुजुर्गों की संख्या 19.38 करोड़ पर पहुंचने का अनुमान है। बुजुर्गों की बढ़ती आबादी के मधे नज़र यह देखना भी जरुरी है की बुजुर्ग आज किस स्थिति में अपना जीवन यापन कर रहे है। बुजुर्ग देश और समाज के लिए एक समस्या है या गौरव है। बुजुर्गों की बढ़ती संख्या देखकर ख़ुशी होती है की व्यक्ति की औसत आयु में वृद्धि हो रही है मगर बुजुर्गों की उपेक्षा को देखकर दुःख भी होता है। हर एक को याद रखना चाहिए की बुढ़ापा एक दिन सब को आएगा। जिस दिन यह सच्चाई हम स्वीकार कर लेंगे उस दिन समाज बुजुर्गों की इज्जत और सम्मान करना सीख लेंगा।
विश्व में बुजुर्गों की संख्या लगभग 60 करोड़ है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में प्रत्येक पांच में से एक बुजुर्ग अकेले या अपनी पत्नी के साथ जीवन व्यतीत कर रहा है। यानी वह परिवार नामक संस्था से अलग रहने को विवश है। ऐसे बुजुर्गों में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। अशिक्षित बुजुर्गों की हालत और भी ज्यादा दयनीय है। अधिकतर बुजुर्ग डिप्रेशन, आर्थराइटिस, डायबिटीज एवं आंख संबंधी बीमारियों से ग्रस्त हैं और महीने में औसतन 15 दिन बीमार रहते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी उन वरिष्ठ नागरिकों को होती है, जिनके पास आय का कोई स्रोत नहीं है। हेल्पेज इंडिया द्वारा जारी एक रिपोर्ट बताती है कि देश के लगभग 10 करोड़ वरिष्ठ नागरिकों में से पांच करोड़ से भी ज्यादा बुजुर्ग आए दिन भूखे पेट सोते हैं। देश की कुल आबादी का आठ फीसदी हिस्सा अपने जीवन की अंतिम वेला में सिर्फ भूख नहीं, बल्कि कई तरह की समस्याओं का शिकार है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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