70 प्रतिशत से ज्यादा भारतीय परिवार खाना पकाने के लिए प्राथमिक ईंधन के रूप में एलपीजी का उपयोग करते हैं: सीईईडब्ल्यू

85 प्रतिशत परिवारों के पास एलपीजी कनेक्शन है

@ chaltefirte.com                        नई दिल्ली।  काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) की ओर से आज जारी किए गए एक स्वतंत्र अध्ययन के अनुसार, 70 प्रतिशत से ज्यादा भारतीय परिवार खाना पकाने के प्राथमिक ईंधन के रूप में एलपीजी का इस्तेमाल करते हैं और 85 प्रतिशत परिवारों के पास एलपीजी कनेक्शन हैं। हालांकि,54 प्रतिशत भारतीय परिवारों ने पारंपरिक ठोस ईंधनों का नियमित रूप से उपयोग जारी रखा है, फिर चाहे वह केवल ठोस ईंधनों का उपयोग हो या फिर एलपीजी के साथ अतिरिक्त ईंधन के रूप में खाना पकाने के लिए लकड़ी, उपले, कृषि अवशेष, लकड़ी का कोयला (चारकोल) और केरोसिन जैसे पारंपरिक ठोस ईंधनों का उपयोग ऐसे परिवारों के लिए घरेलू वायु प्रदूषण का जोखिम बढ़ा देता है। अध्ययन ने यह भी रेखांकित किया कि बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, और पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी कवरेज और खाना पकाने के लिए प्राथमिक ईंधन के रूप में इसका उपयोग में विशेष रूप से सुधार किया जाना चाहिए। पिछले महीने, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (उज्ज्वला) 2.0 का उद्घाटन किया, जिसका उद्देश्य देश में एक करोड़ गरीब और प्रवासी परिवारों को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध कराना है।

सीईईडब्ल्यू के यह निष्कर्ष ‘इंडिया रेजिडेंशियल एनर्जी सर्वे (आईआरईएस) 2020’ पर आधारित हैं, जो वित्त वर्ष 2019-20 में इनिशिएटिव फॉर सस्टेनेबल एनर्जी पॉलिसी (आईएसईपी) के साथ साझेदारी में किया गया था । कोरोना महामारी से ठीक पहले संपन्न हुए इस सर्वेक्षण में भारत के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले 21 राज्यों में 152 जिलों के लगभग 15 हजार शहरी और ग्रामीण परिवार शामिल थे सीईईडब्ल्यू  के अध्ययन ने यह भी रेखांकित किया कि देश में 39 प्रतिशत परिवार एलपीजी के साथ-साथ पारंपरिक ठोस ईंधन का भी इस्तेमाल करते हैं। इन परिवारों में से 84 प्रतिशत परिवारो ने एलपीजी का पूर्णतया प्रयोग न करने का कारण एलपीजी की ऊंची कीमतों को बताया है। यह निष्कर्ष एलपीजी की कीमतों में जारी मौजूदा बढ़ोतरी के संबंध में महत्वपूर्ण है, जो पिछले एक साल में प्रति सिलिंडर 240 रुपये (40% बढ़ोतरी) बढ़ी है। महामारी के दौरान परिवारों की कम आय और मई 2020 में सब्सिडी के निलंबन ने जनसंख्या के एक बड़े हिस्से के लिए एलपीजी को उसकी आर्थिक क्षमता से बाहर कर दिया है। एलपीजी के साथ-साथ पारंपरिक ठोस ईंधनों के इस्तेमाल के लिए जिम्मेदार अन्य कारणों में पारंपरिक चूल्हे पर खाना पकाने की प्राथमिकता (72 प्रतिशत परिवार), बिना किसी खर्च के बायोमास (लकड़ी, उपले या फसल अवशेष) की उपलब्धता (59 प्रतिशत परिवार), और एलपीजी रिफिल की सीमित उपलब्धता (46 प्रतिशत परिवार) शामिल हैं।

शालू अग्रवाल, सीनियर प्रोग्राम लीड, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “एलपीजी को जन-जन तक पहुंचाने के लिए सरकार द्वारा उज्ज्वला के पहले चरण के अंतर्गत किये गए प्रयास सराहनीय हैं। लेकिन 15 प्रतिशत भारतीय परिवारों के पास अभी भी एलपीजी कनेक्शन नहीं है। उज्ज्वला के दूसरे चरण में सुनियोजित तरीके से लाभार्थी पहचान, संशोधित नामांकन प्रक्रिया, और जागरूकता अभियान के माध्यम से इस अंतर को कम करने पर ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा, सरकार को एलपीजी रिफिल पर सब्सिडी की दोबारा शुरुआत को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि लोग ठोस ईंधन का उपयोग घटा सके, जो महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर अधिक असर डालता है।”

सुनील मणि, प्रोग्राम एसोसिएट, सीईईडब्ल्यू, और अध्ययन के मुख्य लेखक, ने कहा,“नागरिकों के लिए घरेलू वायु प्रदूषण के जोखिम में कमी लाना जनस्वास्थ्य की प्राथमिकता होनी चाहिए। ठोस ईंधन का उपयोग देश में स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कारणों में से एक है। इसकी सामाजिक और आर्थिक नुकसान बहुत अधिक है, इसलिए सरकार को एलपीजी को किफायती बनाने और आर्थिक रूप से कमजोर

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