लंबा चलेगा अफगानिस्तान में अराजकता का दौर

 डा. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

अफगानिस्तान के अधिकांश हिस्सों पर भले ही तालिबानी लड़ाकों ने कब्जा जमा लिया हो और सत्ता पर काबिज भी हो जाए पर सरकार चलाना तो दूर की बात सरकार बनाना ही अभी टेडी खीर साबित हो रही है। हांलाकि अमेरिका ने तय समय सीमा यानी कि 31 अगस्त को काबुल से अपने सैनिकों व सेना को हटा लिया है पर तालिबानियों के सामने सरकार बनाने और उसे चलाने की चुनौतियां बेसुमार है और रहेगी। इसका प्रमुख कारण अत्यधिक महत्वाकांक्षा के चलते सत्ता संघर्ष तो है ही अन्य भी बहुत से कारण है जो तालिबानियों के सामने नित नई समस्याएं पैदा करेंगे। अमेरिका के जाने के पांच दिन बाद भी सरकार गठन को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है। बल्कि समाचार तो यह आ रहे हैं कि सत्ता संघर्ष आपसी गुटों के नेताओं के बीच गोलीबारी तक पहुंच गया है। मजे की बात यह कि गुटों के बीच आपसी सहमति बनाने के लिए पाकिस्तान अपने प्रतिनिधि को भेज रही है। इसके कई कारण है एक तो यह कि पाकिस्तान अपनी चैधराहट चाहता है तो दूसरी और अधिकांश तालिबानी ईरान मॉडल पर सरकार गठित करना चाहते हैं। तीसरा यह कि सरकार गठन से जुड़े अलग अलग गुटों में महत्वाकांक्षाओं के चलते सामंजस्य नहीं बैठ पा रहा तो चीन और रुस ऐन केन प्रकारेण यह चाहते हैं कि नई सरकार उनकी कठपुतली बन कर रह जाए। उधर पंजशीर तालिबानियों के लिए हमेशा ही चुनौती भरा रहा है और रहेगा। देखा जाए तो अफगानिस्तान अराजकता के दौर से गुजर रहा है। अमेरिकी सेना 20 साल तक अफगानिस्तान में काबिज रहने और जनधन की हानि के बावजूद कुछ हासिल नहीं कर पाई है। 20 साल बाद आज अफगानिस्तान पर तालिबान लड़ाकों ने कब्जा जमा लिया है और दुनिया के देशों के सामने नई समस्या यह भी आ रही है कि अमेरिकी सेना वहां पर अत्याधुनिक सैन्य सामग्री छोड़कर गई है जिसका उपयोग तालिबानी आंतक का राज जमाने के लिए करेंगे ही। हांलाकि सूत्र यह भी कहते हैं कि अमेरिकी सेना ने जाते जाते सैन्य सामग्री को इस्तेमाल योग्य नहीं छोड़ा है पर इस पर अभी विश्वास करना जल्दीबाजी होगा।

अफगानिस्तान के जो ताजा समाचार मिल रहे हैं वे सत्ता संघर्ष की ओर साफ इशारें कर रहे हैं। सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने के लिए तालिबान के सहसंस्थापक और 20 साल पहले रहे अब्दुल गनी बरादर और हक्कानी ग्रुप के बीच गोलीबारी के समाचार है। हांलाकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है पर यह साफ है कि पाकिस्तान ने अपने प्रतिनिधि ले. जनरल फैज हमीद को अफगानिस्तान भेजा है। लगता है अभी समझौता होने में समय लगेगा जबकि पहले यह माना जा रहा था कि अमेरिका के अफगानिस्तान से पलायन के साथ ही तालिबानी सरकार बन जाएगी। पर यदि अभी समझौता हो भी जाए तो इसे सत्ता संघर्ष का अंत नहीं माना जा सकता है। उधर अफगानिस्तान के ताजा हालातों पर नजर रखने वालों की माने तो ईरान की तर्ज पर सरकार बनाने की अधिक संभावनाएं मानी जा रही है। ऐसा माना जा रहा है कि तालिबानी प्रमुख हेबतुल्लाह अखुंदजादा सर्वोच्च नेता होेंगे। हांलाकि माना यह जा रहा है कि सभी शीर्ष नेताओं का जमावड़ा काबुल में हो गया है। ईरान में सर्वोच्च नेता ही सर्वेसर्वा होता है। इसके बाद राष्ट्र्पति और गार्जिअन काउंसिल और विशेषज्ञों की समिति व संसद भी होगी। न्यायपालिका प्रमुख की भी प्रमुख भूमिका होती है। देर सबेर यह सब तो हो जाना है पर जिसके भी सर पर ताज होगा वह कांटों भरा ही होगा। सत्ता संघर्ष, अंदरुनी खींचतान और आतंकवादी गतिविधियों के साथ ही पंजशीर और भूखमरी की समस्या सबसे अधिक गंभीर है। जानकारों की माने तो अफगानिस्तान में भूखमरी के हालात अधिक दूर नहीं है। खाद्य सामग्री कुछ ही दिनों की बची है तो आने वाले दिनों में लूट कसोट आम हो जाएगी। सूत्रों का मानना है कि चार करोड़ की आबादी के लिए एक माह का राशन ही उपलब्ध है। हांलाकि पाकिस्तान, चीन, रुस कितनी ही नजदिकियां दिखाएं पर सबके अपने हित टकरा रहे हैं। इनमें से कोई भी नहीं चाहेगा कि अफगानिस्तान के हालात सामान्य रहे। चीन अपने वन बेल्ट के एजेंडा को पूरा करना चाहता है तो रुस अफगानिस्तान पर अपनी दखल बनाए रखना चाहता है। पाकिस्तान तालिबानी लड़ाकों के सहयोग से कश्मीर में अराजकता फैलाने के प्रयास में है। इसके साथ ही आईएसआई अपने हितों के अनुसार सरकार बनवाना चाहती है। अब तालिबानी इन सबके मकसद को समझने की भूल कर रहे हैं तो दूसरी और अभी उनका मकसद सत्ता हथियाना ही है। अफगानिस्तान से पलायन का दौर जारी है तो महिलाओं को लेकर कट्टरता के कारण भी देरसबेर समस्या तो बनी ही रहेगी। ऐसे में अफगानिस्तान में शांति का माहौल बनना अभी टेड़ी खीर ही होगी। इस सबके बावजूद मजे की बात यह है कि तालिबानियों के लिए यदि कोई सहारा बन सकता है तो वह हिन्दुस्तान ही होगा। इसका कारण साफ है। मानवीयता के चलते हिन्दुस्तान सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहता है। पाकिस्तान के खुद के खाने के लाले पड़े हुए हैं तो चीन पूरी तरह से व्यावसाहिक हितों को लेकर चलने वाला देश है। उसका सहायता आदि में विश्वास नहीं होता। वह पूरी तरह से केलकूलेटिव आधार पर चलने वाला देश है। वह तो वन बेल्ट वन रोड़ के आधार पर अपना हस्तक्षेप बढ़ाना चाहता है। पाकिस्तान भी भूल कर रहा है। भले ही आज वह तालिबानियों के सहयोग से कश्मीर में हालात तनावपूर्ण करने के सपने देख रहा हो पर उसे हासिल कुछ होने वाला नहीं है। ऐसे में साफ हो जाता है कि अफगानिस्तान में हालात अच्छे होना दूर की कोड़ी ही होगा।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

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