तालिबान से होशियार नही तो उठानी होगी मुसीबत

विष्णुगुप्त

तालिबान अपने एजेंडे तेजी के साथ बदल रहा हैं, खासकर वैश्विक प्रसंग में उनकी उदारता काफी उल्लेखनीय है, आश्चर्यजनक है। तालिबान ये संदेश देने के लिए वह हर संभव कोशिश कर रहा है जो वैश्विक स्तर पर जरूरी है और जिससे तालिबान को एक गंभीर और जिम्मेदार राजनीतिक संगठन की हैसियत बनाती है। उदाहरण के तौर पर प्रगति है,, उदारता है,आकर्मकता और बर्बरता जैसे अवगुन और करतूत नहीं है। स्पश्ट तौर पर तालिबान ने काबुल हवाई अड्डे को अमेरिकी नियंत्रण में रखने में कोई विरोध की हिंसा नहीं फैलायी, तय सीमा तक काबुल हवाई अड्डे को अमेरिका के सैनिकों के नियंत्रण में रहने दिया, इतना ही नहीं बल्कि तालिबान ने अमेरिकी सैनिकों के साथ सहयोग ही किया,कोई परेशानी नहीं की और न ही कोई भयंकर हिंसा को अंजाम दिया। प्रारंभिक दौर में उसने यह अनुमति भी प्रदान कर दी कि जो कोई भी देश छोड़कर जाना चाहता है वह जा सकता है, उन्हें जाने दिया जायेगा, कोई रूकावटें नहीं आयेगी। यही कारण है कि काबुल हवाई अड्डे पर अफगानिस्तान छोड़कर विदेश जाने वालों की भयंकर भीड जमी थी। भयंकर भीड़ का लाभ उठाकर तालिबान विरोधी आईएस ने आतंकवादी हमले भी किये जिनमें एक दर्जन अमेरिकी सैनिकों सहित करीब एक सौ से अधिक लोग भी मारे गये और दो सौ से अधिक लोग घायल भी हो गये। तालिबान ने इसके अलावा अफगानिस्तान की राजनीति समीकरण को साधने की कोशिश कर रहा है, राजनीतिक समीकरण को साधने में उसने हिंसा और बम गोली का सहारा नहीं ले रहा है, धमकी और दबाव का सहारा नहीं ले रहा है। राजनीतिक समीकरण को साधने के लिए उसने वार्ता का सहारा लिया है, सवार्नुमति तैयार करने की कोशिश की है। अपने धोर विरोधी हामिद करजई से भी बातें की है। पूर्व वातार्कार अब्दुला अब्दुला से भी तालिबान ने सौहार्द पूर्ण बातें की है। दुनिया यह समझ रही है कि सत्ता के द्वार पर खडे तालिबान दुनिया की नियामकों के सिद्धांतों का पालन करने को लेकर सम्मान दे रहा है।

खासकर भारत के संबंध में तालिबान के विचार और एक्षन आश्चर्य में डालने वाले है, सारी उम्मीदों को ध्वस्त करने वाले हैं। अब तक उम्मीद यही थी कि तालिबान सत्ता में आने के साथ ही साथ भारत को निशाना बनायेगा, भारत के साथ बदला लेगा, भारत के खिलाफ पाकिस्तान की नीति पर चलेगा, पाकिस्तान जैसा चाहेगा वैसा तालिबान करेगा। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि पाकिस्तान की अफगानिस्तान में भारत विरोधी नीति क्या है? पाकिस्तान की अफगानिस्तान में भारत विरोधी नीति स्पश्ट है, जगजाहिर है। पाकिस्तान यह चाहता रहा है कि भारत के प्रसंग मे तालिबान उनका मोहरा बना रहे, यस मैन बना रहा। तालिबान की सरकार बनने और तालिबान की सरकार की गतिशील में होने में भारत सरकार की कोई भी भूमिका नहीं होनी चािहए। इतना ही नहीं बल्कि कश्मीर के प्रश्न पर तालिबान हमेशा पाकिस्तान का साथ देता रहे और कश्मीर को आतंकवाद के बल पर हड़पने में पाकिस्तान का साथ तालिबान देने का काम करें। भारत ने अफगानिस्तान में खरबों डॉलर का जो निवेश किया है उस निवेश पर तालिबान बुलडोजर चलाये। निवेश के माध्यम से खडे किये गये निर्माण कार्य पर भी तालिबान की दृश्टि नकरात्मक होनी चाहिए।

पिछले समय में तालिबान की नाराजगी भारत के प्रति क्या-क्या रही है। इस पर भी विचार करने की जरूरत है। अमेरिका ने जब अफगानिस्तान पर कब्जा किया था और अमेरिका की डर से तालिबान बिना लडे और बिना वीरता दिखाये भाग खड़ा हो गया था तब सबसे अधिक खुशी जाहिर करने वाले देशो मे भारत भी था। भारत के खुश होने के कारण भी थे। भारत की खुशी के केन्द्र में अस्मिता थी, सुरक्षा थी। तालिबान उस काल में पाकिस्तान का एक मोहरा था, पाकिस्तान के समर्थन और सहयोग के कारण ही तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता तक पहुंचा था। तालिबान की पूरी सुरक्षा कवच आईएसआई ने खड़ा किया था। इस कारण तालिबान का पाकिस्तान के प्रति समर्पण भी स्वाभाविक था। पर तालिबान ने अपनी भविश्य की कूटनीति को ध्यान में नहीं रखा और न ही भविश्य में आने वाले संकटों पर ध्यान दिया। उसने भारत विरोधी रवैया अपना लिया। भारत के दुश्मन के तौर पर अपने आप को खड़ा कर लिया। इसका उदाहरण इंडियन एयर लाइन्स के विमान अपहरण कांड है। इस विमान का नेपाल से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवदियों ने अपहरण किया था। पाकिस्तान की इच्छानुसार विमान को काबुल ले जाया गया था। काबुल में इंडियन एयर लाइंस के विमान के अपहरणकतार्ओं की खूब खातिर हुई और अपहरणकतार्ओं को सुरक्षित पाकिस्तान पहुचाया गया था। भारत को इसके बदले में दूर्दांत आतंकवादियों को रिहा करने के लिए मजबूर होना पडा था। इसके अलावा अपने आतंकवादियों को कश्मीर में भी आतंकवाद और जिहाद के लिए भेजता था।

तालिबान को भारत के खिलाफ सर्वाधिक गुस्सा भारत द्वारा अफगानिस्तान में निवेश को लेकर है, अफगानिस्तान के पुनर्निमाण के क्षेत्र में किये गये भागीरथी प्रयास को लेकर है। अमेरिकी इच्छा का अनादर कर भारत ने अफगानिस्तान में अपनी सेना नहीं भेजी थी पर भारत ने अफगानिस्तान के विकास में कोई कसर नही छोडी थी। खरबों डॉलर का निवेश भारत ने किया। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण कई सड़कों का निर्माण भारत ने किया था। कई सिंचाई बांध बनवाये। सिंचाई बांध बनवाने से किसानों को सिंचाई के लिए पानी मिला, जिसके कारण किसानों की आर्थिक आय बढी, उनजी जरूरतों को पूरा करने के लिए अनाज का उत्पादन संभव हो सका। सबसे बडी बात यह है कि भारत ने अफगानिस्तान की संसद का निर्माण किया है। भारत द्वारा बनाये गयी संसद आधुनिक है और आधुनिक संसाधनों से पूर्ण है। अब भारत द्वारा बनाये गये संसद भवन का उपयोग तो तालिबान ही करेगा।

अफगानिस्तान में कोई पुलिस या फिर सैनिक व्यवस्था नहीं थी। भारत ने अफगानिस्तान में पुलिस और सैनिक व्यवस्था खडी करने में बडी महत्ती भूमिका निभायी थी। भारत ने पुलिस और सेना को प्रशिक्षित करने का काम किया था। पुलिस अधिकारियों और सेना के अधिकारियों को भारत में प्रशिक्षण में मिलता था। जब तक अमेरिका अफगानिस्तान में था और तालिबान के खिलाफ युद्वरत था तब तक अफगानिस्तान की सेना तालिबान के खिलाफ मजबूती के साथ लड रही है, खडी थी। तालिबान का गुस्सा इस कारण था कि अगर भारत ने अफगानिस्तान की पुलिस और सेना की व्यवस्था नहीं खडी की होती तो फिर हमारा काम इतना कठिन नहीं होाता और न ही हमारे हजारों दहशतगर्द अफगानिस्तान बलों के हाथों मारे जाते।

तालिबान ने भारत के साथ दोस्ती की पहल की है। कतर के दोहा शहर में तालिबान ने भारत के राजदूत के साथ एक बैठक की है। तालिबान के प्रतिनिधि ने भारतीय राजदूत के साथ बैठक में भारत की आपत्तियों और आशंकाओं को दूर करने की कोशिश की है। इसके पहले भी तालिबान ने अपने एक बयान में साफ तौर पर कहा है कि हमसे भारत को डरने की जरूरत नहीं है। भारत का हम दुश्मन नहीं है, भारत का हम दोस्त है। हम भारत के हितों का संरक्षण करेंगे। हमने भारत के लोगों को सकुशल निकालने में सहयोग किया है। भारत हमारे साथ सहयोग करे। तालिबान की यह इच्छा और नीति दुनिया भर में चर्चित हुई है। भारत के भी बहुत सारे लोग तालिबान के इस झासे में आ गये और तालिबान के साथ दोस्ती की पैरवी-वकालत कर रहे हैं।

तालिबान जैसी शक्तियां मजहबी सिद्धांत से चलती है। मजहबी सिद्धांत धोखा देने का रहा है। उदाहरण के तौर पर कुछ तथ्य उपस्थित है। मुहम्मद गोरी ने 17 बार कसमें खायी थी कि भारत पर फिर से हमला नहीं करेगा, फिर भी हमला किया, अलाउदीन खिलजी ने चितोड के राजा राना रतन सिंह को दोस्ती का झांसा देकर बुलाया और फिर हत्या कर डाली, औरंगजेब ने शिवाजी को आगरा बुलाया फिर कैद कर लिया, अफजल खान ने शिवाजी दोस्ती की वार्ता करने के लिए बुलाया फिर हत्या करने की कोशिश की, अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मित्रता का ढोंग रचकर पाकिस्तान ने कारिगल पर कब्जा कर लिया।

अगर हम इतिहास से सबक नहीं लेते है और शांति-वार्ता के झांसे में आते हैं तो फिर हमेषा नुकसान उठाते रहेगे। जब तालिबान अमेरिका के साथ वार्ता कर धोखा दे सकता है तो फिर भारत को धोखा क्यों नहीं दे सकता है। अंतर्राश्ट्रीय स्तर पर मान्यता की अहतार्ओं को पूरा करने के लिए तालिबान यह खेल खेल रहा है। तालिबान को यह पता है कि अगर उसकी सरकार को भारत ने मान्यता प्रदान कर दी तो फिर अंतर्राश्ट्रीय कूटनीति में उसकी बहुत बडी जीत होगी। तालिबान की मजहबी और काफिर मानसिकताएं समाप्त नहीं होगी। भारत को तालिबान के साथ दोस्ती में हमेशा सावधान और होशियार ही रहना होगा।

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