भारत, ईदी अमीन और अफगान संकट

आर.के. सिन्हा

भारत सन 1972 और सन 2021 के बीच वास्तव में बहुत बदल चुका हैं। इस लगभग आधी सदी के अंतराल में भारत की विदेश नीति में एक्शन को खास महत्व मिलने लगा है। अब राजधानी के साउथ ब्लाक से चलने वाले विदेश मंत्रालय से सिर्फ बातें नहीं होतीं। अब बयानबाजी के लिए जगह ही नहीं बची है। अब भारत उन भारतीयों की सुरक्षा के लिए अपने सारे संसाधन झोंक देता है,जो किसी देश में गृहयुद्ध या किसी अन्य कारण के चलते फंस जाते हैं।

यह सारा देश अफगानिस्तान संकट काल में देख रहा है। संभव है कि देश की युवा पीढ़ी को पता न हो कि सन 1972 में अफ्रीकी देश युगांडा में नरभक्षी शासक ईदी अमीन ने अपने देश में रहने वाले लाखों भारतीयों को मुगलिया आदेश दिया था कि वे सभी 90 दिनों में देश को छोड़ दें। हालांकि वे भारतीय ही देश की अर्थव्यवस्था की जान थे। पर सनकी अमीन कुछ भी कर देते थे। खैर, उनके फैसले से वहां पर दशकों से रहने वाले भारतवंशियों के सामने बड़ा भरी संकट खड़ा हो गया कि वे जायें तो कहां जाएं । तब भारत ने नहीं, बल्कि ब्रिटेन ने उन भारतीयों को अपने यहां शरण दी थी। तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने युगांडा सरकार के फैसले की मीडिया में निंदा करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया था। हालांकि कहने को तो भारत तब भी गुट निरपेक्ष आंदोलन का नेता था ।

पर सन 2021 का भारत अब बिलकुल अलग है। अब भारत मैदान में उतरता है। संकट का डटकर मुकाबला करता है। भारतीय वायु सेना और एयर इंडिया के विमान लगातार अफगानिस्तान से भारतीयों को लेकर स्वदेश आ रहे हैं। इन विमानों में भारतीय नागरिकों के साथ कुछ अफगानी और नेपाली भी सवार होते हैं। काबुल में जिस तरह के हालात बने हुए है उसमें हमारे विमानों का भारतीयों को लेकर आना कोई छोटी बात मत मानिए। इनको ताजिकिस्तान के रास्ते दिल्ली या देश के अन्य भागों में लाया जा रहा है। कुछ विमान कतर के रास्ते भारत आ रहे हैं। भारत अब तक अपने हजारों नागरिकों को अराजकता में पूरी तरह डूबते जा रहे अफगानिस्तान से निकाल चुका है। दरअसल भारत अपने दूतावास के अधिकारियों कर्मचारियों समेत आईटीबीपी के जवानों को भी काबुल से सुरक्षित लाने के बाद अफगानिस्तान में काम करने वाले सभी भारतीयों को सुरक्षित देश में वापस ला रहा है। भारत के अफगानिस्तान में दर्जनों बड़े प्रोजेक्ट चल रहे थे, इनमें अफगानिस्तान को खड़ा करने के लिए भारत हर तरह की मदद भी कर रहा था। भारत के तकरीबन 23 हजार करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट अब बुरी तरह फंस गए हैं। इनमें हजारों भारतीय जुड़े हुए थे। इन्हीं भारतीयों को निकाला जा रहा है। भारत की तरफ से अफगानिस्तान बांध से लेकर स्कूल, बिजली घर से लेकर सड़कें, काबुल की संसद से लेकर पावर इंफ्रा प्रोजेक्ट्स और हेल्थ सेक्टर समेत न जाने कितनी परियोजनाओं को तैयार किया जा रहा था।

दरअसल, भारत वहां से भारतीयों को निकालने की तैयारी काफी पहले से कर रहा था क्योंकि अफगानिस्तान के हालात तो लगातार खराब हो ही रहे थे। भारत को समझ आ रहा था कि वहां से भारतीयों को देर-सेवर तो निकालना ही होगा। क्या अफगानिस्तान के हालातों की तुलना युगांडा से की जा सकती है? युगांडा में तो तत्कालीन इंदिरा गाँधी की सरकार ने वहां फंसे भारतीयों को राम भरोसे छोड़ दिया था। पर अब हमारी सरकार भारतीयों के साथ पूरी तरह से खड़ी हैं। भारतीय युगांडा में लुटते-पिटते रहे थे, लेकिन हमने घडियाली आंसू बहाने के सिवा कुछ नहीं किया था। उन भारतीयों को हमसे अभी तक गिला है, जो वाजिब भी है। क्या हम सात समंदर पार बस गए भारतीयों से सिर्फ यही उम्मीद रखें कि वे भारत में निवेश करें? हम उन्हें बदले में कुछ न दें। यह तो कभी भी नहीं हो सकता। हम अपने नागरिकों के हकों के लिए किसी देश पर आक्रमण नहीं कर सकते, पर उनके हक में खड़े तो हो ही सकते हैं। आखिर भारत की ताकत तो अपने नागरिकों से ही बनती है। हम युगांडा में रहने वाले भारतीयों को अपने यहां सम्मान पूर्वक बुला सकते थे। वहां पर अधिकतर गुजराती और सिख थे। सभी उधमी ही थे I सिख भाई ईस्ट अफ्रीका में 1890-1920 के बीच रेलों का जाल बिछाने के लिए ले जाए गए थे।

हमारी बदली हुई विदेश नीति के चलते ही हमने कुछ समय पहले टोगो में साल 2013 से जेल में बंद पांच भारतीय को सुरक्षित रिहा करवाया था। ये सब केरल से थे। टोगो पश्चिमी अफ्रीका का एक छोटा सा देश है। भारत सरकार 2015 में यमन में फंसे हजारों भारतीयों को सुरक्षित स्वदेश लाई थी। वह अपने आप में मिशाल हैI इन्हें भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस सुमित्रा से जिबूती ले जाया गया था। जिबूती से इन लोगों को चार विमानों से भारत वापस लाया गया। यमन के हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ सऊदी अरब के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। जिबूती में उस वक्त विदेश राज्य मंत्री का पद संभाल रहे जनरल (रिटायर्ड) वीके सिंह स्वयं मौज़ूद थे। वे यह देख रहे थे कि जिन लोगों को यमन से निकाला गया है, वे किसी तरह सुरक्षित भारत पहुंच जाएं। भारत ने साफ कर दिया था कि यमन में रह रहे हरेक भारतीय को जब तक वहां से निकाल नहीं लिया जाता, तब तक भारत का अभियान जारी रहेगा। हमने यमन से भारतीयों को निकालने के लिए हवाई जहाज और पानी के जहाज दोनों का इस्तेमाल किया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अफगानिस्तान से देश के नागरिकों की सुरक्षित स्वदेश वापसी सुनिश्चित करने और वहां से भारत आने के इच्छुक सिखों व हिंदुओं को शरण देने का अधिकारियों को निर्देश भी दे दिये। अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान के नियंत्रण के बाद भारत सरकार लगातार सक्रिय है। वह अपने प्रवासी नागरिकों को बचा रही है। इस क्रम में अन्य देशों के नागरिकों को भी राहत दी जा रही है। जाहिर है, ये सब कदम उठाने के बाद किसी सरकार का इकबाल बुलंद होता है। मुझे कहने दें, एक दौर में हमारी विदेश विदेश नीति का मतलब निर्गुट या राष्ट्रमंडल जैसे बड़े सम्मेलन राजधानी के विज्ञान भवन में करवाना भर ही था। जब संकट सिर पर आता था तो हमारे हाथ-पैर फूल जाया करते थे। पर अब वह गुजरे दिनों की बातें हो गई हैं। अब तो भारत भी संकट का मुकाबला करता है। यह हम अफगानिस्तान में देख ही रहे हैं।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद हैं)

 

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