पहाड़ियों का नगर डूंगरपुर

डॉ.प्रभात कुमार सिंघल,कोटा

चारों और अरावालियों की पर्वत मालाओं के बीच अवस्थित प्राकृतिक संपदा का धनी डूंगरपुर जिले की विशेषता है यहां का आदिवासी जन-जीवन। बताया जाता है कि रावल वीर सिंह ने 1282 ई. में भील सरदार डूंगरिया को हरा कर डूंगरपुर की स्थापना की थी। भील सरदार के नाम पर डूंगरपुर नाम पड़ा। वर्ष 1818 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इसे अपने अधिकार में ले लिया। वर्ष 1945 में डूंगरपुर में प्रजा मण्डल की स्थापना हुई। वर्ष 1946 मार्च में तत्कालीन शासक ने यहाँ उत्तरदायी सरकार बनाने की घोषण कर दी। राजस्थान के एकीकरण के समय डूंगरपुर जिला अस्तित्व में आया। डूंगरपुर को पहाड़ियों का नगर कह कर बुलाया जाता है जो प्राचीन मंदिरों कर लिए प्रसिद्ध है। महलों में अनोखा वास्तु शिल्प दिखाई देता है।
जिले में डूंगरपुर, सागवाड़ा, गलियाकोट, सीमलवाडा, एवं आसपुर प्रमुख स्थान हैं। माही, सोम एवं जाखम तीन नदियों का संगम यहाँ होता है। माही नदी को दक्षिणी राजस्थान की गंगा कहा जाता है। गैप सागर प्रमुख जलाशय है। आदिवासी भील होली पर गैर नृत्य करते हैं। अप्रैल माह में आयोजित भगोरिया मेलों में युवक-युवतियां अपना जीवन साथी भी चुनते हैं। गवरी नाट्य भीलों का प्रमुख सांस्कृतिक प्रदर्शन है। प्रति वर्ष वैशाख की पूर्णिमा पर माही नदी की गोद में बोरेश्वर तथा आसपुर तहसील में नवातपुरा गांव के समीप वेणेश्वर का मेला एवं गलियाकोट में प्रतिवर्ष संत फखरूद्दीन की दरगाह पर 27 वें मुहर्रम पर आयोजित सालाना उर्स जिले के प्रमुख सांस्कृतिक उत्सव हैं। वेणेश्वर धाम जिले का प्रमुख तीर्थ है।
गेप सागर झील
डूंगरपुर शहर में अनेक पर्यटक स्थलों में रमणिक गैप सागर झील का निर्माण स्थापत्य प्रेमी महाराज गोपीनाथ (गेपा रावल) ने 1428 ई. में कराया था। एक शिलालेख से इसके निर्माण की जानकारी मिलती है। अनेक जनश्रुतियों के चलते यह झील लोगों की आस्था का स्थल बना हुआ है। झील का सौन्दर्य निहारने के लिए गेपा रावल ने इसके पीछे ’भागा महल’ बनवाया एवं बाद में इसके मध्य ’बादल महल’ बनवाया। वागड़ की मीरा के रूप में विख्यात गवरी बाई ने यहाँ अपने पदों में इसे ’गैप सागर गंग’ कहा है। गैप सागर के किनारे हरे-भरे बगीचे इसकी सुंदरता को बढ़ाते हैं।
गैप सागर के मध्य बना विजय राजराजेश्वर शिवालय अपने सुन्दरता के लिए आकर्षण का केन्द्र है। शिवालय के गर्भगृह में शिव विग्रह के साथ देवी पार्वती की प्रतिमा स्थापित हैं। इसका निर्माण महारावल विजय सिंह ने शुरू करवाया परन्तु प्राण प्रतिष्ठा महारावल लक्ष्मणसिंह ने 1923 ई. में करवाई थी। गैप सागर के किनारे बने बादल महल की कारीगरी एवं स्थापत्य दर्शनीय है। महल के गोल गुम्बद पर अधखिले कमल, कलात्मक गोखड़े एवं स्थापत्म शिल्प देखते ही बनता है। महल में राजपूत एवं मुगल निर्माण शैली का मिश्रण देखने को मिलता है। बादल महल निर्माण के प्रथम चरण में चबूतरा एवं पहली मंजिल का निर्माण गैप रावल ने करवाया था। दूसरे चरण में महारावल पुंजराज (1609-1657 ई) ने पहले बने निर्माण की मरम्मत के सामने पहली मंजिल पर बरामदा, दूसरी मंजिल और गुम्बद बनवाये थे। गैप सागर की पाल पर 25 अप्रेल 1623 को महारावल पुंजराज द्वारा निर्मित श्रीनाथ जी का विशाल मंदिर श्रद्धा का केन्द्र है। इसके प्रांगण में 36 छोटे-छोटे मंदिर बने हैं। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण की आदमकद प्रतिमा स्थापित है। मंदिर का निर्माण पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक श्री वल्लभाचार्य के पुत्र श्री विट्ठलनाथ के वशंज गोपेन्द्रलाल वि. सं 1732 तक डूंगरपुर में रहे थे।
* उदयविलास महल-

लुभावना स्थापत्य शिल्प एवं आकर्षक उदयविलास महल शिवबाग परिसर में आकर्षण का केन्द्र है। इस महल का निर्माण महारावल उदयसिंह द्वितीय ने 1883-1887 ई. के मध्य करवाया था। भव्य आलीशान महल में उदयविलास, रनिवास एवं कृष्ण प्रकाश (एक थंबिया महल) आकर्षण के केन्द्र हैं। अप्रतिम सौन्दर्य एवं चित्रकारी युक्त महल का एक हिस्से मे हेरिटेज होटल संचालित किया जा रहा है। उदयविलास में स्थित एक थंबिया महल सौन्दर्य एवं शिल्प कला का उच्चतम प्रतिमान है। गुलाबी पत्थर से जड़े स्मचौरस चौंक के मध्य चतुर्मुख कुंड के बीच बनी यह कृति अद्वितीय एवं अद्भुत शिल्प का नमूना है। संगमरमर, हरे-नीले पारेवा पत्थर, काँच और मूल्यवान पत्थर एवं स्वर्ण कलश को शिल्पियों ने अपनी अनूठी कल्पना से साकार किया है। *संग्रहालय- डूंगरपुर में स्थित राजामाता देवेन्द्र कुँवर राजकीय संग्रहालय जिले की संस्कृति का दर्पण है। प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति का दर्शन कराने वाले संग्रहालय में कलात्मक मूतियां, कलाकृतियां, पुरा महत्व की सामग्री, दर्शनीय हैं। यहाँ 6 टीं शताब्दी से वर्तमान समय तक की देव प्रतिमाएं, शिलालेख, धातु प्रतिमाएं, लघु चित्र, सिक्के आदि संजोये गये हैं। तांत्रिक गणेश, वीनाधारी शिव, मृग चर्म धारण किये ब्राहमी, हरिहर प्रतिमा, गरूडासन वैष्ण्वी, कुवर, पद्मपानी यक्ष एवं वराहं प्रतिमाएं संग्रहालय की अमूल्य निधी हैं। अधिकांश मूर्तियां गुप्त काल से सोलहवीं शताब्दी की हैं जो गलियाकोट, आंतरी बड़ोदा एवं आमझरा नामक स्थानों से लाई गई हैं। इस संग्रहालय को 1988 ई. में आम जनता के लिए खोल गया।* जूना महल डूंगपुर शहर में धनमाता पहाड़ी की ढलान पर बना जूना महल तकरीबन 750 वर्ष पुराना है। इसे ’पुराना महल’, ’बड़ा महल’ या ’ओल्ड पैलेस’ भी कहा जाता है। रावल वीरसिंह देव ने इस महल की नींव विक्रम संवत् 1339 में कार्तिक शुक्ल एकादशी को रखी थी। सात मंजिले इस महल में रहने की माकूल सुविधा के साथ-साथ आक्रमणकारियों से सुरक्षा का भी समुचित प्रबंध था। इस महल ने 13वीं से 18वीं शताब्दी तक कई उतार-चढ़ाव देखे। महल के चौकोर खंभे, सुंदर पच्चीकारी के तोड़े, छज्जे, झरोखे तथा सुंदर जालियां राजपूती स्थापत्य कला का सुंदर नमूने हैं। यहां की सभी दीवारें भित्तिचित्रों से अलंकृत हैं। इन पर कांच की बेजोड़ कारीगरी की गई है। महल का प्रवेश द्वार रामपोल एवं कलात्मक त्रिपोलिया द्वार भी आकर्षक हैं।
वेणेश्वरधाम
राज्य के डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा जिलों की सीमा पर डूंगरपुर से करीब 70 किमी दूर सोम, माही एवं जाखम तीन नदियों के संगम पर स्थित वेणेश्वर धाम विभिन्न संस्कृतियों का संगम स्थल राजस्थान का एक महत्वपूर्ण आस्था धाम है। नदियों के संगम पर वेणेश्वर शिवालय, राधाकृष्ण मंदिर के साथ-साथ सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्मा, वाल्मीकि, हनुमान एवं वेदमाता के पावन देवालय स्थित है। इन मंदिरों के चारों ओर जिधर भी नजर जाती है पावन सरिताओं की जल राशि का दृश्य मनमोहक प्रतीत होता है। वेणेश्वर धाम पर माघ की पूर्णिमा से लगने वाले जनजातियों के विशाल मेले में पहले दिन ही करीब 5 लाख श्रद्धालु अपने परिजानों के साथ सामूहिक स्नान कर देव दर्शन कर पूजा-अर्चना करते है। मेले में राजस्थान के साथ-साथ गुजरात और मध्य प्रदेश के आदिवासी तथा विदेशी पर्यटक बड़ी संख्या में भाग लेते हैं। इस मेले को वांगड प्रयाग या वांगड वृन्दावन भी कहा जाता है और यह आदिवासियों का देश का सबसे बड़ा जमघट माना जाता है। मेले के दौरान भगवान एवं महन्त की शोभा यात्रा मावजी की जन्मस्थली साबला के हरि मंदिर से मनोहारी दृश्यों के साथ निकाली जाती है। रात्रि में यहां बने मुक्ताकाशीय रंगमंच पर विभिन्न राज्यों के आदिवासी कलाकारों के नृत्य और संगीत की छंटा देखते ही बनती है। पूरे समय भजनों से वातावरण धार्मिक रहता है। परम्परागत खेलों की प्रतियोगिताएं आकर्षण का केन्द्र होती है। इस स्थल को राजा बलि की यज्ञ स्थली तथा भविष्य वक्ता संत मावजी की लीला स्थली भी कहा जाता है। लोग मावजी को कृष्ण का अवतार मानकर श्रद्धा से पूजा-अर्चना करते हैं।
देवसोमनाथ
डूंगरपुर से 24 किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित देवसोमनाथ सोम नदी किनारे निर्मित एक प्राचीन शिव मंदिर है। मंदिर का निर्माण विक्रम संवत 12वीं शताब्दी के आस-पास होना माना जाता है। तीन मंजिले भव्य मंदिर की इमारत पत्थर के 150 स्तंभों पर खडी है। प्रत्येक स्तंभ विशिष्ट शैली में निर्मित है। सभा मण्डप के खंभे भी आकर्षक रूप से बने हैं। मंदिर के पूर्व, उत्तर और दक्षिण तीन प्रवेश द्वार हैं। मंदिर में बने खिड़की, झरोखे, नर्तकों की मूर्तियां, अन्य विविध मूर्तियां, मेहराब व प्रवेश द्वार सभी कुछ दर्शनीय हैं। मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर का शिवलिंग केन्द्र में विराजित हैै। गर्भगृह का द्वार निर्माण शैली व पत्थर की कारीगरी का सुन्दर नमूना है। मंदिर के पीछे की ओर एक पत्थर नहर के माध्यम से गर्भगृह से जुड़ी है जहां हनुमान जी की एक प्रतिमा स्थापित की गई है। यह मंदिर राजस्थान और गुजरात राज्य की सीमा पर स्थित है।
गलियाकोट
डूंगरपुर से दक्षिण-पूर्व की ओर 60 किलोमीटर दूर माही नदी के किनारे स्थित है गलियाकोट में एक ऐसे पीर की मजार है जिसने अपना पूरा जीवन इंसानियत की खिदमत में लगा दिया। बाबा फखरूद्दीन की मजार पर देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां आकर इस फरिश्ते की अकीदत में सिर झुकाते हैं। कहा जाता है कि 900 वर्ष पूर्व यहां तारकमल और भारमल नामक दो भाई मौलिया संप्रदाय में शामिल हो गए। धर्म का प्रचार करने के लिए भारमल के पुत्र याकूब को गुजरात तथा तारकमल के पुत्र फखरूद्दीन को वांगड़ प्रदेश में भेजा गया। फखरूद्दीन बचपन से ही संत जैसी प्रवृत्ति के थे। उन्होंने धर्म की पूरी तालीम लेकर छोटी उम्र में वली बन गए। धर्म के मसीहा बनकर वे सागवाड़ा में रहते थे। कहा जाता है कि मगरे की नमाज के समय जब वे खुदा की इबादत में लीन थे, उसी समय कुछ डाकुओं ने उन पर हमला कर दिया और उन्हें मार दिया। वे उसी दिन दुनिया से रूखसत हो गए। लोगों ने उसी दिन उन्हें गलियाकोट में दफनाया और यहां उनका मजार बना दिया।
यह मजार सफेद संगमरमर पत्थर से निर्मित है। मजार की दीवारों पर कुरान की शिक्षाएं स्वर्ण पत्र में अंकित हैं। मजार के मकबरे के ऊपर चारों कोनों पर मीनारें तथा मध्य में गुंबद बना है। यहां मजार की अंदर की दीवारों, जाली, खिड़की, झरोखों, खम्बों एवं छतों पर मार्बल में नक्काशी का बारिक सुंदर कार्य नजर आता है। मकबरे का सम्पूर्ण स्थापत्य शिल्प दर्शनीय है। यहां प्रतिवर्ष दाऊदी बोहरा समुदाय के लोग अपनी श्रद्धा अर्पित करने के लिए आते हैं। इस स्थान पर मोर्हरम के 27वें दिन सालाना जलसा आयोजित किया जाता है, जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। यहां सभी धर्मों के लोगों के आने से यह स्थल आपसी भाईचारा और सद्भाव बढ़ाने का संदेश देता है।
साबला
डूंगरपुर से 55 किमी. दूर साबला ग्राम में भविष्य वाणियों एवं भजनों के लिए प्रसिद्ध संत मावजी महाराज का मंदिर दर्शनीय है। मंदिर की स्थापत्य कला आकर्षक हैं। आवागम की दृष्टि से डूंगरपुर सड़क एवं रेल मार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा है। उदयपुर-हिम्मतनगर रेलवे मार्ग पर स्थित है डूंगरपुर रेलवे स्टेशन। राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-8 (दिल्ली-मुंबई) डूंगरजिले से होकर गुजरता है। डूंगरपुर से 16 किमी. पर स्थित दोवड़ा गांव में हवाई पट्टी है। निकटम एयर पोर्ट 110 किमी. दूर उदयपुर में स्थित है।

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