तालिबान के सीने पर पंजशीर देश बनेगा

विष्णुगुप्त

कांटे से कांटा निकालने का सिद्धांत पुराना है, विरोधी के विरोधी को शक्ति और मदद देकर अपना मकसद साधना भी एक प्रचलित और एक कारगर नीति है। विष का इलाज भी विष से ही होता है। तालिबान पर यह नीति और सिद्धांत ठीक बैठता है। तालिबान जैसे जहर और खूनी हिंसक प्रजाति को नियंत्रित करना है तो फिर इस नीति और सिद्धांत को लागू करना ही होगा। सबसे पहले अफगानिस्तान में ही तालिबान के खिलाफ विद्रोही शक्तियां बनानी होगी, तालिबान विरोधी शक्तियों को हर तरह की मदद करनी होगी। खासकर नर्दान एलाइज की आग को भड़काना होगा, पंजशीर अलग देश की मांग की आग में घी डालकर उसे भड़काना होगा। उल्लेखनीय है कि नॉर्दन एलाइज अब अलग पंजशीर देश बनाने के लिए शस्त्र युद्ध भी छेड़ने वाला है।
अफगानिस्तान पर कब्जा कर खरबों डॉलर बहाने की नीति फेल हो गई है, दुनिया अब अफगानिस्तान में कब्जा कर, बैठ कर कोई उपलब्धि हासिल नहीं कर सकती है। आठ साल सोवियत संघ और 20 साल अमेरिका ने अफगानिस्तान में बैठकर अपनी अर्थवयवस्था का ही विध्वंस किया, अफगानिस्तान के लोगो को शान्ति और सद्भाव का पाठ पढ़ाया पर निष्कर्ष क्या निकला? सिर्फ और सिर्फ मूर्खता ही हासिल हुई है। इस्लाम की जनता अमेरिका, सोवियत संघ, भारत के पैसों पर खूब राज की है। हराम के पैसे खाना, मुफ्तखोरी करना उनकी आदत बन गई हैं, फिर तालिबानी बन जाना उनकी मानसिकता बन गई है।अफगानिस्तान की जनता इस्लामिक शरिया चाहती है, उसे इस्लामिक शरिया पसंद है, इस्लाम के नाम पर बर्बरता पसंद है, हिंसा पसंद है, महिलाओं का उत्पीड़न और संहार पसंद है। अगर ऐसा नहीं होता तो फिर तालिबान उनका पसंद क्यो होता, तालिबान को समर्थन कैसे मिलता, तालिबान के लिए लड़ने और मरने वाले दहशतगर्द कहा से आते। आखिर तालिबान के लोग भी उसी महिला के गर्भ से जन्म लेते हैं जिस महिला को तालिबान इस्लाम की संहिता के नाम पर हिंसा और बर्बरता का शिकार बनाते हैं, संहार करते है।
तालिबान और पाकिस्तान की बत्ती जल्द ही गुल होने वाली है, उनकी खुशी जल्द ही मातम में बदलने वाली है। उन्हें शेर पर सवा शेर मिलने वाला है। जैसे को तैसे में उत्तर मिलने वाला है। उसकी हिंसा और मानवता को शर्मसार करने वाली नीति को जैसे को तैसा के रूप में चुनौती मिलने वाली है। अफगानिस्तान में अभी भी कार्यवाहक राष्ट्रपति सलाह ही वैध शासक है। अफगानिस्तान की बनने वाली तालिबान सरकार अवैध ही होगी।
कार्यवाहक राष्ट्रपति सलाह ने देश नहीं छोडा है, तालिबान से डर कर भागे नहीं है। वह अफगानिस्तान में ही है और उन्होंने अपने आप को देश का वैध शासक घोषित किया है। संवैधानिक रूप से सलाह ही अभी तक कार्यवाहक राष्ट्रपति हैं। क्योंकि राष्ट्रपति के भागने की स्थिति में उप राष्टरपति ही शासक होता है। खासकर संयुक्त राष्ट्र संघ को सालेह के इस प्रमाणिक दावे और स्थिति का सम्मान करना चाहिए। तालिबान तो डाकू और लठैत है जो बल पर अफगानिस्तान पर कब्जा कर बैठा है। संयुक्त राष्ट्र संघ को तालिबान को मान्यता देने से बचना चाहिए।
सालेह ने पाकिस्तान और तालिबान को चुनौती दी है, आलोचना की है और उनके अफगानिस्तान पर कब्जा करने की हिंसक कार्रवाई को असंवैधानिक अमाननीय और अफगानिस्तान के नागरिकों की संभावनाओं पर बुलडोजर चलाने के जैसा बताया है। खासकर तालिबान को उन्होंने ललकारा है और कहा है कि तालिबान के मंसूबे कभी भी पूरे नहीं होंगे, तालिबान की सरकार स्थिर रहने वाली नहीं है, बहुत देर तक चलने वाली नहीं है, अफगानिस्तान के लोग आताताई, मानवखोर और मनुष्यता का दुश्मन तालिबान को स्वीकार नहीं करने वाले हैं। तालिबान के खिलाफ लोग खड़े होंगे ,क्योंकि डर के आगे जीत है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया पूरा सच उगल नहीं रहा है , तालिबान के पक्ष में बहुत कुछ छुपा रहा है, बहुत झूठ दिख रहा है । सबसे पहली बात तो यह है कि पूरे अफगानिस्तान पर तालिबान का अभी भी कब्जा नहीं है। काबुल पर कब्जा होने का अर्थ यह नहीं है कि तालिबान को पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा हो गया। अफगानिस्तान में अभी भी एक ऐसा प्रदेश है जहां पर तालिबान की उपस्थिति नगण्य है, जहां पर तालिबान जाने से खुद डरता है, जहां पर तालिबान के लिए कोई जगह नहीं है। वह प्रदेश पंजशीर है। पंजशीर में अभी भी नार्दन एलाइंस की उपस्थिति है । नादान एलाइज सक्रिय रुप से शासन कर रहा है । अंतरराष्ट्रीय मीडिया या फिर मुस्लिम मीडिया इस बात को क्यों छुपा रहा है कि पंजशीर में नार्दन एलाइज का शासन है।
नॉर्दन नॉर्दन एलाइज को भूलना नहीं चाहिए। नॉर्दन एलाइज की वीरता और तालिबान के खिलाफ डटकर रहने के लिए प्रशंसा होनी चाहिए। अफगानिस्तान में सिर्फ और सिर्फ नार्दन एलाएज ही तालिबान और पाकिस्तान के खिलाफ लड़ने का काम किया था। जब तालिबान सत्ता में था तब नार्दन एलाइज के लोग ही लड़ रहे थे। अमेरिका, भारत, रूस जैसे देशों के लिए तब नॉर्दन एलाइज ही एक उम्मीद का किरण था। जब अमेरिका तालिबान के खिलाफ युद्ध के मैदान में आया ,तब भी नॉर्दन एलाइज ही अमेरिका के लिए वरदान साबित हुआ था। सबसे पहले काबुल में नॉर्दन एलाइज की ही सेना पहुंची थी। नॉर्दन एलाइज हमेशा अंतरराष्ट्रीय जगत को तालिबान के खिलाफ लड़ाई में मददगार रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय जगत की नासमझी,भूल और वायदा खिलाफी की सजा नार्दन एलाइज के लोग भुगत रहे हैं। तालिबान सत्ता की समाप्ति के बाद नार्दन एलाइज को सत्ता पर अधिकार होना चाहिए था । नार्दन एलाइज के नायकों को अफगानिस्तान की सत्ता की बागडोर मिलनी चाहिए थी। पर नार्दन एलाइज को हमेशा नजरअंदाज कर दिया गया। नार्दन एलाइज के लोग पश्तून नहीं है, पठान नहीं है, ताजिक मूल के हैं। जबकि अफगानिस्तान में पश्तून और पठान मूल के लोगों का ही वर्चस्व है ,जनसंख्या उन्हीं की ज्यादा है। पर एक गड़बड़झाला है। पश्तून और पठान तालिबान की वास्तविक शक्ति है। तालिबान की समर्थन देने वाले, तालिबान लिए लड़ने वाले पठान और पश्तून मूल के लोग ही हैं। हामिद करजई और अशरफ गनी पश्तून मूल के ही है जिन्हें अमेरिका ने राष्ट्रपति बनवाया था ।अगर अमेरिका ने हामिद करजई और अशरफ गनी की जगह किसी नार्दन इलायज के प्रतिनिधियों को राष्ट्रपति बनाया होता तो फिर सही अर्थों में तालिबान के खिलाफ अफगानिस्तान में लड़ाई होती, तालिबान को जमीन दोंज रखने की कार्रवाई तेज होती, तालिबान को उसके मांद में जाकर असली वार होता और तालिबान फिर से सत्ता लूटने की स्थिति में नहीं आते।
नॉर्दन एलाइज के संस्थापक अहमद शाह मसूद थे। अहमद शाह मसूद बड़े वीर और साहसी थे। उन्होंने तालिबान के खिलाफ पूरे अफगानिस्तान में वातावरण बनाया था ,तालिबान के खतरे को दिखाया था, तालिबान के खूंखार मजहबी राजनीति को उसने हानिकारक बताया था और यह स्थापित किया था कि तालिबान के नेतृत्व में अफगानिस्तान कभी भी फल फूल नहीं सकता है, हिंसा से मुक्त नहीं हो सकता ,मानवता का पालन नहीं हो सकता। पर पश्तून और पठान मूल के लोगों को यह बात पच्ची नहीं थी क्योंकि पश्तून और पठान मूल के लोगों पर तालिबान का भूत सवार था। तालिबान उनके लिए एक आइकन के समान था । लेकिन अफगानिस्तान के गैर पश्तून, गैर पठान लोगों को नॉर्टन एलाइज के संस्थापक अहमद शाह मसूद की बातें समझ में आई थी ,उनकी जागरूकता वाली बातें प्रभावित की थी और तालिबान को सिर्फ अफगानिस्तान ही नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए खतरे का आभास भी किया था । यही कारण था कि नार्दन एलाइज पंजशीर में न केवल अपनी दमदार उपस्थिति सुनिश्चित की थी बल्कि तालिबान के पहुंच को भी सीमित किया था, रोका था।
जबतक अहमद शाह मसूद जिंदा थे तब तक तालिबान कभी भी स्थिर नहीं रह सकते थे, अपराजित नहीं रह सकते थे, पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा नहीं कर सकते थे। तालिबान के सामने अहमद शाह मसूद पहाड़ के समान खड़े थे। तालिबान अपने विरोधियों के खिलाफ झूठ ,साजिश, फैरब के माध्यम से लड़ाई लड़ता है। अहमद शाह मसूद पर भी एक साजिश के तहत हमला कराया था। तालिबान ने मसूद को मरवाने के लिए मीडिया को हथकंडा बनाया था। एक अरब मीडिया के नाम पर समूह खड़ा किया गया था ।उसी मीडिया ने मसूद का साक्षात्कार लेने का समय मांगा था। मसूद तालिबान के इस साजिश को समझ नहीं पाए, आईएसआई की साजिश को समझ नहीं पाए और उन्होंने उस अरब मीडिया को साक्षात्कार देने का समय दे दिए। पत्रकार के भेष में तालिबान के आतंकवादियों ने मसूद की हत्या की थी । अगर धोखे से मसूद की हत्या नहीं होती तो फिर मसूद तालिबान के लिए काल बने हुए रहते । आज अफगानिस्तान में तालिबान फिर से सत्ता में उपस्थिति दर्ज कराने लायक शक्ति ही हासिल नहीं करता।
नॉर्दन एलाइज पंजशीर में मजबूती के साथ अभी भी खड़ा है । नार्दन एलाइज पूरी तरह से तालिबान के खिलाफ युद्ध की रणनीति ही नहीं बना रहा है बल्कि युद्ध की पूरी तैयारी के साथ खड़ा है । नॉर्दन एलाइज के साथ मोहम्मद शाह मसूद का लड़का भी खड़ा है। अहमद शाह मसूद के लड़के ने घोषणा की है कि वह तालिबान के खिलाफ अंतिम दम तक लड़ेंगे । इसके अलावा पंजशील को अफानिस्तान की नई राजधानी भी घोषित करने वाले हैं। इसके साथ ही साथ अफगानिस्तान को खंड खंड में विभाजित करने की राजनीति और कार्रवाई भी तेज होगी। पंजशील नाम का अलग देश के लिए अभियान भी तेज होगा । वर्तमान में अफगानिस्तान के कार्यवाहक राष्ट्रपति सालेह भी इसी ओर इंगित करते हैं । यह दावे के साथ कहां जा सकता है है कि नॉर्दन एलाइज अब अफगानिस्तान को खंड खंड कर पंज शीर नामक देश बनाने के लिए युद्ध करेगा।
पंजशीर अलग देश के अभियान को समर्थन भी मिलेगा । तालिबान से डरे, पीड़ित लोग भी इसके साथ खड़े होंगे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीति भी पंजशील के पक्ष में खड़ी होगी ।अगर तालिबान हिंसक राजनीति पर खड़ी रही तो दुनिया की कूटनीति दुनिया की तालिबान विरोधी नीति अफगानिस्तान को खंड खंड कर अलग पंचशील देश बनाने की ओर लगेगी। दुनिया की कूटनीति नॉर्दन एलाइज को इस निमित्त आर्थिक और सैनिक मदद भी करेगी।
तालिबान, चीन ,रूस, ईरान और पाकिस्तान का मोहरा बना रहेगा ,इनकी उंगलियों पर नाचते रहेगा। यह तय है। चीन और पाकिस्तान के निशाने पर अमेरिका और भारत जैसे देश है । अब अमेरिका और भारत को भी अपनी तालिबान विरोधी नीति को मजबूत करनी चाहिए। खासकर अमेरिका को तालिबान के वित्त पोषण पर अंकुश लगाना होगा। अमेरिका उन देशों पर भी कड़ी नजर रखे जो देश तालिबान कि हितैषी है और जो देश तालिबान का वित्त पोषण करेंगे। वित्त पोषण नहीं होगा तो फिर तालिबान खुद ही तड़पता रहेगा। फिर नॉर्दन एलाइज और अन्य तालिबान विरोधी शक्तिया मजबूत होंगी।
तालिबान विरोधी एक अलग पंजशीर देश भारत, अमेरिका की ही नहीं बल्कि मानवता में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए भी जरूरत है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

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