अयोध्या और बामियान को एक ही चश्मे से देखने वाले कौन

आर.के. सिन्हा

अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के ढांचे को तोड़े जाने और अफगानिस्तान के शहर बामियान में भगवान बुद्ध की मूर्तियों को करीब दो दशक पहले ध्वस्त करने की घटना को एक ही चश्मे से देखने वाले अब खुलकर सामने आने लगे हैं। अफगानिस्तान में अराजकता, लूटपाट और कत्लेआम के बाद यह सब कुछ भी हो रहा है। ये वही लोग हैं जो भारत में लोकतंत्र को मजबूत करने की वकालत करते हैं और अफगानिस्तान में तालिबान के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। इन्हें सुप्रीम कोर्ट के राम मंदिर विवाद पर आए ऐतिहासिक फैसले पर भी आपत्ति है। मतलब साफ है कि अगर कोई फैसला इनके मुताबिक नहीं होता तो ये तुरंत ही विरोध में खड़े हो जाते हैं।

याद रखिए कि 1526 में बाबरी मस्जिद के निर्माण के बाद से ही जो रामलला विवाद का मामला फंसा हुआ था, उस पर सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक बेंच अपना अंतिम फैसला सुना चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा था कि बाबर के समय में मीर बाकी ने उस जगह मस्जिद बनवाई थी, जहां पर राम लला का जन्म स्थान था।

दरअसल उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की मृत्यु के बाद कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवी तो यहां तक कह रहे हैं कि देश उस इंसान को सम्मानित कर रहा है जिसके मुख्यमंत्रित्व काल में बाबरी मस्जिद के ढांचे को तोड़ा गया। क्या उस ढांचे को वहीं पर रहना चाहिए था? ये परम ज्ञानी आगे यह भी कह रहे हैं कि जब कल्याण सिंह को महान बताया जा रहा है तो बामियान में बुद्ध की मूर्ति तोड़ने वाले खलनायक कैसे हो सकते हैं? जरा इस तुलना पर गौर करें। ये परोक्ष रूप से बाबर जैसे आक्रामणकारी की तुलना शांति दूत भगवान बुद्ध से कर रहे हैं। इन्हें चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए।

अब एक बात सब को पता है ही कि भारत के तो कण-कण में राम समाए हुए हैं। इस देश की राम के बिना तो कल्पना करना भी असंभव है। सारे भारत का जनमानस ही राम को अपना अराध्य और पूजनीय मानता है। भारत के तीन सबसे बड़े पौराणिक और पूजनीय नाम – राम, कृष्ण और शिव ही हैं। उनके काम के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी प्राय: सभी भारतीय को तो होगी ही। उनके विचार व कर्म, या उन्होंने कौन-से शब्द कब कहे, उसे विस्तारपूर्वक दस में एक भारतीय तो जानता ही होगा। कभी सोचिए कि एक दिन में भारत में कितनी बार यहां की जनता प्रभु राम का नाम लेती है। ये आंकड़ा तो अरबों – खरबों में पहुंच जाएगा। भारत राम का नाम तो सदैव लेता ही रहेगा। उसी राम लला के जन्म स्थान पर बर्बरतापूर्वक जबरदस्ती मस्जिद का निर्माण कैसे सही माना जा सकता है।

भारत के पुरातत्व विभाग ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था बाबरी मस्जिद जहां पर थी वहां पर पहले मंदिर था। इसके अकाट्य साक्ष्य विद्यमान है I हिंदुओं का विश्वास है कि उसी स्थान पर भगवान राम पैदा हुए थे, इस विश्वास पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। हिंदुओं का मानना है कि गुंबदों के नीचे के स्थल पर ही भगवान राम का जन्म हुआ था। यह एक आस्था और विश्वास का मामला है। इसी आधार पर विवादित स्थल को राम जन्मभूमि न्यास को सौंपने का फैसला हुआ था। भगवान बुद्ध भारत,जापान, दक्षिण कोरिया, उत्तर कोरिया, चीन, वियतनाम, ताइवान, थाईलैंड, कंबोडिया, हांगकांग, मंगोलिया, तिब्बत, भूटान, मकाऊ, बर्मा, लागोस और श्रीलंका में आराध्य हैं। उन्हें नेपाल, मलेशिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मन, बांग्लादेश, पाकिस्तान, कनाडा, सिंगापुर, फिलीपींस में आदर के भाव से देखा जाता है। उनकी मूर्ति को बर्बरतापूर्ण ढंग से बारूद लगाकर तोड़ने वाले महान बताया जा रहा है। इससे दुखद कुछ नहीं हो सकता।

आपको याद होगा कि अफगानितान के बामियान शहर में भगवान बुद्ध की चौथी और पांचवीं शताब्दी में बनी दो खड़ी मूर्तियां थी। बामियान शहर काबुल के उत्तर पश्चिम दिशा में करीब 230 किलोमीटर पर स्थित है। इनमें से छोटी मूर्ति सन् 507 में और बड़ी मूर्ति सन् 554 में निर्मित की गई थी। ये क्रमश: 35 मीटर और 53 मीटर की ऊंचाई की थी। पर अफ़ग़ानिस्तान के जिहादी संगठन तालिबान के नेता मुल्ला मोहम्मद उमर के कहने पर मार्च 2001 में इन्हें डाइनेमाइट से उड़ा दिया गया था।

अगर हम इतिहास के पन्नों को खंगाले तो मालूम चलेगा कि मुगल शासक औरंगज़ेब और फ़ारसी शासक नादिर शाह ने भी बामियान में बुद्ध की कई मूर्तियों पर हमला करके उन्हें क्षतिग्रस्त किया था। ये मूर्तियां कच्चे लाल रेत, मिट्टी, कंकड़, बलुआ पत्थर और चूना पत्थर जैसे समूह से बनीं थीं।

दरअसल अयोध्या में राम मंदिर बनने की प्रक्रिया शुरू क्या हो गई कि कुछ कठमुल्लों की छाती पर सांप लौटने लगा। ये कहने लगे हैं कि भारत में धर्मनिरपेक्षता खतरे में आ गई है। कुछ कठमुल्लों को तो मानों एक बड़ा मौका ही मिल गया है सीधे-साधे हिन्दुओं को उकसाने और कठमुल्ले मुसलमानों को भड़काने का। असदुद्दीन ओवैसी तथा आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने जिस बेशर्मी से राम मंदिर के भूमि पूजन पर अनाप-शनाप बोला उससे समाज तो बंटेगा ही। ओवैसी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तो कभी यह नहीं चाहते कि भारत विकसित हो और एक विश्व गुरु बने। इनके जैसे मुस्लिम नेता ही आतंकवादी तालिबान का भी समर्थन कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने अफगानिस्तान में तालिबान पर कब्जे की तुलना भारत में ब्रिटिश राज से कर दी। सपा सांसद ने कहा कि, हिंदुस्तान में जब अंग्रेजों का शासन था और उन्हें हटाने के लिए हमने संघर्ष किया, ठीक उसी तरह तालिबान ने भी अपने देश अफगानिस्तान को आजाद कर दिया । हैरानी इस बात की है कि समाजवादी पार्टी ने बर्क को उनके घटिया बयान के लिए कोसा तक नहीं। बर्क ने तालिबान की तारीफ करते हुए कहा कि, इसने रूस, अमेरिका जैसे ताकतवर मुल्कों को अपने देश में ठहरने तक नहीं दिया। अब आपको समझ आ गया होगा कि भारत में किस तरह की विघटनकारी शक्तियां पैर पसार रही हैं। अब इन पर कसकर चाबुक चलाने का समय आ गया है। इन्हें किसी भी सूरत में छोड़ा नहीं जाना चाहिए। अब भारत असदुद्दीन ओवैसी को करीब से जान चुका है। उसे पता है कि उनके पुरखे हैदराबाद के शासक का पाकिस्तान का साथ देते वक्त भी समर्थन कर रहे थे। ये बातें भी देश की आजादी के बाद की हैं। खैर, देश को इन दो कौड़ी के कठमुल्लों से डरना तो नहीं है, पर सदैव सजग तो रहना ही होगा।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद हैं)

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