जलवायु परिवर्तन से बचपन पर मंडराया खतरा

बाल मुकुन्द ओझा

बच्चे देश का भविष्य हैं जिन पर हमारी उमीदें टिकी हैं। आज उनका ही भविष्य सुरक्षित नहीं है। जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण और बढ़ते तापमान का सबसे अधिक असर बचपन पर देखा जा रहा है। कोरोना के कारण बच्चे पहले से अपने घरों में कैद है। यूनिसेफ की एक ताज़ा रिपोर्ट का अध्ययन करें तो पाएंगे जलवायु बदलाव और प्रदूषण का खतरा भी बच्चों पर लगातार मंडरा रहा है। यूनिसेफ की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में करीब 100 करोड़ बच्चों पर जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के प्रभाव का खतरा है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत समेत 33 देशों के बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा पर संकट मंडरा रहा है। इसके चलते दुनियाभर में बच्चे जलवायु परिवर्तन के किसी ने किसी प्रभाव से जूझ रहे हैं। यूनिसेफ ने इस स्थिति को भयानक बताया है। इस रिपोर्ट को जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण के प्रभाव, गरीबी, बच्चों को स्वच्छ पानी की पहुंच, स्वास्थ्य और शिक्षा की पहुंच को देखते हुए तैयार किया गया है। रिपोर्ट में पाया गया कि 92 करोड़ बच्चे पानी की कमी, 82 करोड़ हीटवेव और 60 करोड़ बच्चे वेक्टर जनित बीमारियों जैसे मलेरिया और डेंगू बुखार के संपर्क से जूझ रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में करीब 30 करोड़ बच्चे अत्यधिक वायु प्रदूषण वाले इलाकों में रहते हैं।
जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया की सबसे बड़ी समस्या बन गया है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ धरती का तापमान बढ़ने और कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा बढ़ने के कारण पराग कणों की मात्रा में इज़ाफा हो रहा है। इस वजह से बच्चों में अस्थमा यानी सांस की बीमारी के मामले बढ़ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर मेडिकल जर्नल लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि जलवायु परिवर्तन से खासतौर से बच्चों की सेहत के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। उत्सर्जन सीमित करने में नाकामी का परिणाम संक्रामक बीमारियों के रूप में सामने आएगा। वायु प्रदूषण की स्थिति गंभीर होती जाएगी, तापमान बढ़ेगा और कुपोषण की समस्या भी गंभीर होगी। जलवायु परिवर्तन और जीवाश्म ईधन से होने वाले वायु प्रदूषण के कारण मां के गर्भ से ही शिशु की सेहत को खतरा पैदा हो रहा है। जन्म के बाद भी यह खतरा बढ़ता जाता है।
बाल अधिकारों की वैश्विक संस्था सेव द चिल्ड्रेन की एक रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन का सर्वाधिक बुरा असर गरीब मुल्कों पर पड़ेगा-खासकर उपसहारीय अफ्रीकी देशों और दक्षिण एशिया के देश इसकी गंभीर चपेट में होंगे। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रति वर्ष 90 लाख बच्चे पाँच साल की उम्र पूरी करने से पहले मृत्यु का शिकार हो जाते हैं। इनमें से ज्यादातर मौतें (98 फीसदी) कम और मंझोली आमदनी वाले मुल्कों में होती हैं। एक तथ्य यह भी है कि सर्वाधिक गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदायों में पाँच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु की तादाद अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा है। ज्यादातर बच्चों की मौत गिनी-चुनी बीमारियों और स्थितियों मसलन-कुपोषण, न्यूमोनिया, खसरा, डायरिया, मलेरिया और प्रसव के तुरंत बाद होने वाली देखभाल के अभाव जैसी स्थितियों में होती है।’
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी चेतावनी दी थी की हर साल जलवायु परिवर्तन के चलते लाखों लोगों की जान जाएगी और इसमें इससे प्रभावित बच्चों की तादाद बेहद ज्यादा होगी। बीमारी, चोट और कुपोषण से ग्रसित बच्चे इसकी चपेट में सबसे ज्यादा आएंगे। दुनिया भर की आबादी का एक चौथाई हिस्सा 0-14 साल के बच्चों का है जो आबादी का सबसे बड़ा और जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित समहू है। कुपोषण, विद्यालयों का बंद होना, बाल मजदूरी में बढ़ोतरी और मनोवैज्ञानिक रोगों की चपेट बढ़ना इसके संभावित परिणाम हो सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन को लेकर संयुक्त राष्ट्र के अंतरसरकारी पैनल (आईपीसीसी) के हालिया विश्लेषण में कहा गया था की वैश्विक आबादी पर भूख, सूखे और बीमारियों का कहर आने वाले दशकों में और तेज होगा। 2021 में पैदा होने वाले बच्चों को कम से कम अगले 30 वर्षों तक इन खतरों को झेलना पड़ेगा। जलवायु बदलाव से धरती का वातावरण तेजी से बदल रहा है। उससे निपटने की दिशा में सार्थक और कठोर कदम उठाने की निहायत जरुरत है। बच्चों के स्वास्थ्य की दिशा में उठाया गया कदम आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सवांर सकता है।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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