तालिबान के लिए दहशतगर्द ही होंगे भस्मासुर

विष्णुगुप्त

दुनिया की समझ है कि तालिबान के पास कोई एक लाख से अधिक दहशतगर्द हैं। तालिबान अपनी दहशतगर्दो के बल पर ही अफगानिस्तान पर कब्जा करने में सफलता पायी है। अब अफगानिस्तान पर तालिबान का राज होगा, तालिबान अपना इस्लामिक एजेंडा लागू करेगा। तालिबान ने अपना इस्लामिक एजेंडा लागू करना भी शुरू कर दिया है। दुनिया भर में तालिबान का शासन कैसा होगा, उसमें महिलओं की आजादी कितनी होगी, पढने लिखने की आजादी कितनी होगी, अन्य धर्म के लोगों के लिए आजादी कितनी होगी? इस पर बहुत बहस हो रही है। पर एक ऐसा विषय भी है जिस पर दुनिया अभी तक सोचना भी शुरू नहीं किया है? वह विषय तालिबान के दहशतगर्दो से जुड़ा हुआ है। एक लाख से अधिक तालिबानी दहशतगर्दो का भविष्य क्या होगा, उन्हें किस प्रकार से नियत्रित किया जायेगा, क्या तालिबान अपने एक लाख से अधिक दहशतगर्दो को नियंत्रित में करने में सफल होगा? क्या दहशतगर्द अपनी हिंसक और लूटेरी मानसिकता को इतना जल्दी छोड़ देंगे, क्या दहशतगर्द अपनी महिला विरोधी मानसिकता का त्याग कर देगे? क्या दहशतगर्द अपनी लूट, मार, काट वाली आदतें छोड़ देंगे? क्या दहशतगर्द अपने हाथों की बन्दूकें फेंक देने के लिए तैयार होंगे? क्या दहशतगर्द शांति पूर्ण काल के सहचर बनने के लिए तैयार होंगे? क्या दहशतगर्द अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार मानवाधिकार का पालन करने के लिए तैयार हो जायेंगे? क्या दहशतगर्द अपने फिरकों की सर्वश्रेष्ठता की हिंसक और घृणित मानसिकता को त्यागने के लिए प्रेरित होंगे? दुनिया को अब इस विषय पर सोचना ही पडेगा। इसी विषय पर अफगानिस्तान और तालिबान राज का भविष्य टिका हुआ है। जाहिर तौर पर तालिबान अभी इस विषय पर कुछ सोचा भी नहीं होगा, तालिबान अभी सिर्फ और सिर्फ खुशी मना रहा है। खुशी मनाने के लिए तालिबान के पास तर्क और अवसर भी हैं। उसने फिर से अफगानिस्तान पर कब्जा जो कर लिया है।
तालिबान के एक लाख से अधिक दहशतगर्द कौन हैं? इन दहशतगर्दो की शिक्षा-दिक्षा कैसी है? इनकी मानवाधिकार समझ कैसी है? इनकी इस्लाम की परिधि से बाहर की समक्ष कैसी है? इनकी बिना बन्दूक-गोली और बिना बम की समझ कैसी है? यह भी जानना जरूरी है। तालिबान आम तौर पर सुन्नी मुस्लिम दहशतगर्द गिरोह है जो कट्टपंथ का आग्रही है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि तालिबान अपने सुन्नी पंथ को सर्वश्रेष्ठ मानता है। इस्लाम के अन्य पंथों जैसे शिया, अहमदिया और ताजिक तंत्र को घृणा की दृष्टि से देखता है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि तालिबान अपनी सत्ता के दौरान इस्लम के अन्य पंथों के खिलाफ भी अनुदार था। जहां तक तालिबान के दहशतगर्दो की पहचान और उनकी मानसिकता का प्रश्न है तो फिर ये सभी सुन्नी सर्वश्रेष्ठता की घृणिम मानसिकता से ही ग्रसित हैं और सुन्नी सर्वश्रेष्ठता की मानसिकता का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। इनकी शिक्षा-दीक्षा भी लगभग नगन्य है। इनकी शिक्षा-दीक्षा मदरसा की परिधि में कैद रही है। कहने का अर्थ है कि इनकी शिक्षा-दीक्षा मदरसा छाप है। मदरसा छाप का सीधा अर्थ आज दुनिया में आतंकवाद, हिंसा और कबीला मानसिकता का परिचायक या प्रतीक माना जाता है। इस्लामिक आंतकवाद की जड़ में मदरसा छाप शिक्षा-दीक्षा को ही माना जाता है। दुनिया के अंदर में यह भी एक बात बैठी है कि अगर आतंकवाद को समाप्त करना है, आतंकवाद के मूल पर प्रहार करना है तो मदरसा छाप शिक्षा-दीक्षा पर प्र्रहार करना होगा, चोट करनी होगी, मदरसा छाप शिक्षा-दीक्षा के प्रचार-प्रसार पर रोक लगानी ही होगी। इस्लामिक देशों में भी अब मदरसा को लेकर चिंताएं पसरी है और मदरसा शिक्षा-दीक्षा मेें सुधार लाने की बात मजबूती के साथ हो रही है।
अगर तालिबान दहशतगर्द सिर्फ और सिर्फ मदरसा छाप शिक्षा-दीक्षा की परिधि कैद है तो फिर उनके सामने या तालिबान के सामने कौन-कौन सी समस्याएं सामने आयेंगी। सबसे पहली बात तो यह है कि हिंसा और लूटरी मानसिकता की लत छोड़ाना बहुत ही मुश्किल काम होगा। यह माना जाता है कि जिस मानव व्यवस्था मे विज्ञान और समाज शास्त्र की व्यवस्था का कोई स्थान नहीं होता, कोई सक्रियता नहीं होगी उस मानव व्यवस्था में सामाजिक और वैज्ञानिक आधार को खोजना मूर्खता है। जब तालिबानी दहशतगर्द समाज शास्त्र और विज्ञान से परिचित ही नही है, इतना ही नहीं बल्कि समाज शास्त्र और विज्ञान का घोर विरोधी हैं तो फिर सामाजिक और अर्थशाास्त्रीय कसौटी पर चलने के लिए उन्हे कैसे प्रेरित-प्रोत्साहित किया जायेगा? सबसे बडी बात यह है कि आधुनिक शिक्षा-दीक्षा ही मनुष्य के अंदर में मनुष्यता को गढती है। अफगानिस्तान के अंदर में घोर इस्लामिक व्यवस्था रही है जो आधुनिक शिक्षा-दीक्षा की विरोधी रही है, आधुनिक शिक्षा-दीक्षा के सभी प्रतीकों को बन्दूकों और बमों से जमींददोज कर दिया गया था। आधुनिक शिक्षा-दीक्षा को इस्लाम विरोधी घोषित कर दिया गया था। इस कारण अफगानिस्तान के अंदर में कभी भी आधुनिक शिक्षा-दीक्षा का प्रोत्साहन ही नहीं मिला। फिर तालिबान दहशतगर्द वर्तमान की आधुनिक शिक्षा-दीक्षा से कैसे परिचित और सहचर होते?
तालिबान को अपने दहशतगर्दो को नियंत्रित करने और उन्हें शासन-प्रशासन के लिए प्रेरित करने में सबसे बडी समस्याएं पैसे की होगी, संसाधनों की होगी, उनकी भोग वाली मानसिकतओं को संतुष्ट करने की होगी। अगर तालिबान ने अपने सभी एक लाख से अधिक दहशतगर्दो को अपनी सेना मान लिया तो फिर सेना की जरूरी अहर्ताएं पूरी करनी होगी। जब तालिबान की सरकार होगी तो फिर तालिबानी सरकार की सेना भी होनी चाहिए। सेना के बिना सरकार का कोई महत्व नहीं होता है। अमेरिका नियंत्रित अफगानिस्तान के पास अपनी सेना थी। हालांकि वह सेना ने तालिबान से लडे बिना समर्पण कर दिया। इस समर्पण के बाद यह तय हो गया कि उस अफगानिस्तान की सेना के पास वीरता का भाव या शक्ति नहीं थी। तालिबान अमेरिका नियंत्रित अफगानिस्तान की सेना को अपनी सेना मानने से इनकार करेगा, अमेरिका नियंत्रित अफगानिस्तान की सैनिक व्यवस्था को वह कभी भी स्वीकार नहीं करेगा। जब तालिबान अपनी सेना बनायेगी तो फिर उस सेना का पार्ट यही एक लाख से अधिक दहशतगर्द होंगे।
अभी तक तो तालिबान अपने दहशतगर्दो को खुला छोड़ रखा था, इन दहशतगर्दों पर तालिबान का कोई खास बंदिश नहीं थी। बंदिश होती तो फिर इतनी बडी संख्या में दहशतगर्द तालिबान की ओर से लडने के लिए तैयार ही नहीं होेते। जाहिर तौर पर इन दहशतगर्दो को लूट, मार, काट करने और महिलाओं की आजादी के साथ खिलवाड करने की पूरी छूट थी, अराजकता थी। पर जब तालिबान अपनी सेना का रूप देगा तो फिर सेना के लिए जरूरी व्यवस्थाएं भी करनी होगी और सबसे बडी बात यह है कि जिम्मेदारियां भी तय करनी होगी। कोई एक नहीं बल्कि अनेक सैनिक छावनियों का निमार्ण करना होगा। अब तक तो ये दहशतगर्द खूले आकाश और जगलों तथा पहाडों के बीच रहने के आदी रहे हैं। उन्हें सैनिक छावनियों की परिधि में रखना ही होगा। सैनिक छावनियों में भोजन और मनारंजन की व्यवस्थाएं भी करनी होगी। इसके साथ ही साथ इनके लिए मासिक वेतन की व्यवस्था करनी होगी। जब दहशतगर्द शांति काल में सैनिक की भूमिका में होगे तो फिर ये अपने परिवार की जरूरतों के प्रति भी जवाबदेह होंगे।
तालिबान अपने दहशतगर्दो को सैनिक व्यवस्था में ढालने के लिए पैसे कहां से लायेगा, जरूरी संसाधन कहां से लायेगा? अमेंरिका ने कोई एक दो करोड नहीं बल्कि 90 हजार खरब डॉलर खर्च अफगानिस्तान में सैनिक व्यवस्था खडी की थी। अफगानिस्तान की अमेरिका नियंत्रित सरकार का खर्चा अमेरिका, यूरोप, जापान और भारत के सहयोग से चल रहा था। तालिबान की इस्लामिक रूख के कारण अमरिका,यूरोप, जापान और भारत जैसे देश तालिबान को आर्थिक मदद देने वाले नहीं है। तालिबान के पास इतनी शक्ति और दक्षता नहीं है कि वह अपने बल पर अपनी अर्थव्यवस्था का विकास कर सके और संसाधनों का विकास कर सके। तालिबान टैक्स भी किससे वसूलेगा? अमेरिका नियंत्रण के दौरान जो व्यापार पनपे थे जो अर्थव्यवस्था सक्रिय हुई थी वह तालिबान आने साथ ही साथ चौपट हो गयी। व्यापारी अपने व्यापार बंद कर अफगानिस्तान से भाग रहे हैं। खेती पर भी हिंसा का प्रभाव पडा है। जब बाजार ही चौपट रहेगा, लोगों की आय ही नहीं बढेगी तो फिर तालिबान को टैक्स कहां से मिलेगा? तालिबान पर हाथ रखने वाला पाकिस्तान खुद कंगाल है। एक कंगाल, दूसरे कंगाल की आर्थिक मदद कैसे कर सकता है?
निष्कर्ष यह है कि तालिबान के लिए उनके अपने ही एक लाख से अधिक दहशतगर्द सिर दर्द साबित होंगे, भस्मासुर होंगे। दहशतगर्दो को सुख, सुविधाएं और उपभोग की मानिसकताएं तुष्ट नहीं हुई तो फिर वे तालिबान के खिलाफ बन्दूक उठा सकते हैं, जंगलों और पहाडों के बीच फिर से एक नया इस्लामिक जिहाद की शुरूआत कर सकते हैं। अफगानिस्तान की जनता ही इसमें मारी जायेगी। तालिबान के खिलाफ भी कई अन्य इस्लामिक समूह खडा होगर हिंसा की नयी इस्लामिक राजनीति को जन्म दे सकते हैं। इस लिए तालिबान की खुशी भी जल्द समाप्त होने वाली है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

 

 

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