विपक्ष की राजनीति

बी.एल. गौड़

आज विपक्ष का मतलब 14 पार्टियाँ, मतलब कांग्रेस, मतलब राहुल गांधी है। राहुल जी को नेता मानना अन्य पार्टियों की मजबूरी है क्योंकि राहुल जी जहाँ कांग्रेस पार्टी के सर्वे-सर्वा हैं और एक उच्चकोटि के कबड्डी खिलाड़ी हैं। अब इसे क्या कहेंगे- हाथरस काण्ड में राहुल गांधी का काफिला पीडि़ता और पीडि़ता के परिवारजनों के पास जाने में बिलकुल देर नहीं करता और उसी तरह से दिल्ली में एक 9 साल की बच्ची की बर्बरता से हत्या के बाद भी वे बिलकुल भी देरी नहीं करते हैं और पीडि़त बच्ची के पास जाकर वह जो कुछ भी कहते हैं, उसका मतलब कुछ नहीं होता। जैसे- बच्ची के माँ-बाप से कहते हैं, मैं इस केस में आखिर तक आपके साथ हूँ और आपकी नकदी सहायता के लिए मेरे पास कुछ नहीं है। क्योंकि नोटबंदी के समय भी आपने देखा था कि मेरे कुर्ते की जेब फटी हुई थी, वैसे मैं आपके साथ हूँ।
किसी ने पूछा कि फिर किस तरह आप इनके साथ रहेंगे ? तो उनके किसी सहयोगी ने कहा कि जैसे-जैसे कोर्ट में कार्यवाही चलेगी, वे बराबर ट्वीट-ट्वीट खेलते रहेंगे। इसके अतिरिक्त उन्होंने मृत बच्ची की पहचान भी उजागर कर दी, जो कि शायद उन्हें नहीं करनी चाहिए थी।
इसके विपरीत वे कभी राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ की रेप पीडि़ताओं के घर नहीं जाते। क्योंकि बकौल उनके वहाँ रेप का कोई मामला होता ही नहीं।
दूसरी बात आज बॉर्डर पर धरना दे रहे किसान अब अपना समानान्तर सत्र जंतर-मंतर पर लगा रहे हैं। उनकी राजनीति राहुल जी को बहुत भाती है। वे कन्टेनर में छुपाकर एक ट्रैक्टर अपने घर ले आते हैं और अपने साथियों के साथ ट्रैक्टर पर सवार होकर संसद सत्र में भाग लेने के लिए संसद पहुँच जाते हैं। इस तमाशे के बाद वह दूसरा तमाशा देश की जनता को दिखाते हैं- साइकल पर सवार होकर अपने समर्थकों के साथ जुुलूस निकालते हैं।
यह सब करते हैं श्री राहुल गांधी, लेकिन संसद में किसी मुद्दे पर बहस नहीं करते। अरे इतना ही कर लेते कि जिन विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने आपके साथ चाय पी थी, उन्हें समझा कर कहते कि भई आज सब संसद में घुसते ही हंगामा नहीं करेंगे। लेकिन संसद के शुरू होते ही सबसे पहले धरनारत किसानों की बात मोदी जी से करेंगे। लेकिन विपक्ष ऐसा काम करे ही क्यों, जिसमें उसे अपनी हार नजर आए।
उधर कृिष मंत्री आए दिन आवाज लगाते हैं कि किसान भाई आएं, हम हर मुद्दे पर बात करने के लिए तैयार हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि किसानों का तो एक ही मुद्दा है- तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने का। पहले सरकार तीनों कृषि कानूनों को रद्द करे तो फिर हम आपसे बात करने आएं। अपनी समझ में यह नहीं आता कि जब तीनों ही कृषि कानून रद्द हो जाएंगे तो फिर किस लिए किसान कृषि मंत्री से बात करने जाएंगे।
यह कबड्डी वाली राजनीति विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच यूँ ही चलती रहेगी। वर्षाकालीन संसद सत्र हर दिन स्थगित होते हुए अपने अंत तक पहुँचेगा। फिर सभी पार्टियाँ अपने-अपने मैदान में आकर डट जाएगी, 2020 और 2024 के चुनावों पर राजनीति करने के लिए।
देश की जनता सब कुछ देख रही है और सब कुछ जानती है। आने वाले चुनावों में अपने हिसाब से निबटेगी।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

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