भुखमरी के खिलाफ दुनिया को चेताया

बाल मुकुन्द ओझा

कोरोना महामारी ने न केवल पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बरबाद करके रख दिया है अपितु करोड़ों लोगों को भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया है। अमेरिकी कृषि विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक गरीब और अविकसित देशों के 1.2 अरब लोगों को इस साल खाने के लाले पड़ सकते हैं। यह संख्या पिछले साल के मुकाबले एक तिहाई अधिक है। महामारी के कारण लोगों के आय के स्रोत खत्म हो गए हैं और वे भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक इस साल भुखमरी की कगार पर पहुंचने वाले अधिकांश लोग एशिया देशों के हैं। खासकर बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान और इंडोनेशिया में ऐसे लोगों की संख्या काफी तेजी से बढ़ेगी जिनके पास खाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। अमेरिकी कृषि विभाग के मुताबिक अगर किसी को दिन में कम से कम 2,100 कैलोरी की डाइट नहीं मिलती है तो उसे भुखमरी की श्रेणी में रखा जाता है। एक्टिव और हेल्दी रहने के लिए दिन में कम से कम इतनी कैलोरी लेना जरूरी है।
संयुक्त राष्ट्र सहित विभिन्न वैश्विक संस्थाओं ने दुनिया के देशों को कई बार भुखमरी के खिलाफ स्पष्ट रूप से चेताया है और कहा है कोरोना संक्रमण के वर्तमान रुख को देखते हुए भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं होंगी। इस बारे में भूख के खिलाफ लड़ने वाली संस्था विश्व खाद्य कार्यक्रम प्रमुख का कहना है कोविड-19 वायरस के कारण गरीब और मध्य आय वाले देशों की अर्थव्यवस्थाएं लगातार बिगड़ रही हैं।
दुनिया भर में भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। यह संख्या आज भी तेजी से बढती जा रही है। विश्व की आबादी वर्ष 2050 तक नौ अरब होने का अनुमान लगाया जा रहा है और इसमें करीब 80 फीसदी लोग विकासशील देशों में रहेंगे। एक ओर हमारे और आपके घर में रोज सुबह रात का बचा हुआ खाना बासी समझकर फेंक दिया जाता है तो वहीं दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें एक वक्त का खाना तक नसीब नहीं होता। कमोबेश हर विकसित और विकासशील देश की यही कहानी है।
दुनियां से जब तक अमीरी और गरीबी की खाई नहीं मिटेगी तब तक भूख के खिलाफ संघर्ष यूँ ही जारी रहेगा। चाहे जितना चेतना और जागरूकता के गीत गालों कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। अब तो यह मानने वालों की तादाद कम नहीं है कि जब तक धरती और आसमान रहेगा तब तक आदमजात अमीरी और गरीबी नामक दो वर्गों में बंटा रहेगा। शोषक और शोषित की परिभाषा समय के साथ बदलती रहेगी मगर भूख और गरीबी का तांडव कायम रहेगा। अमीरी और गरीबी का अंतर कम जरूर होसकता है मगर इसके लिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी पड़ेगी। प्रत्येक संपन्न देश और व्यक्ति को संकल्पबद्धता के साथ गरीब की रोजी और रोटी का माकूल प्रबंध करना होगा।
विश्वभर में हर 8 में से 1 व्यक्ति भूख के साथ जी रहा है। भूख और कुपोषण की मार सबसे कमजोर पर भारी पड़ती हैं । दुनिया में 60 प्रतिशत महिलाएं भूख का शिकार हैं। गरीब देशों में 10 में से 4 बच्चे अपने शरीर और दिमाग से कुपोषित हैं। दुनिया में प्रतिदिन 24 हजार लोग किसी बीमारी से नहीं, बल्कि भूख से मरते हैं। इस संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत में आता है। भूख से मरने वाले इन 24 हजार में से 18 हजार बच्चे है और 18 हजार का एक तिहाई यानी 6 हजार बच्चे भारतीय है। एक तरफ देश में भुखमरी है वहीं हर साल सरकार की लापरवाही से लाखों टन अनाज बारिश की भेंट चढ़ रहा है। हर साल गेहूं सड़ने से करीब 450 करोड़ रूपए का नुकसान होता है।
भारत की आबादी में देश की आजादी के बाद बहुत विस्तार हुआ है। बढ़ती हुई आबादी के साथ रोजगार के साधनों के अभाव के फलस्वरूप देश को गरीबी, भुखमरी, अनपढ़ता और कुपोषण का सामना करना पड़ रहा है। भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सहायता कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद कुपोषण लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। अनुमान है कि दुनिया भर में कुपोषण के शिकार हर चार बच्चों में से एक भारत में रहता है। जनसंख्या वृद्धि के कारण खाद्यान्न समस्या का सबसे अधिक सामना विकासशील देश कर रहे हैं। सवा अरब आबादी वाले भारत जैसे देश में, जहां सरकारी आकलनों के अनुसार 32 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं, अत्यंत शोचनीय है।
आज भारत विश्व भुखमरी सूचकांक में बेहद लज्जाजनक सोपान पर खड़ा है तो इसके पीछे भ्रष्टाचार, योजनाओं के क्रियान्वयन में खामियां और गरीबों के प्रति राज्यतंत्र की संवेदनहीनता जैसे कारण ही प्रमुख है। गरीबी भूख और कुपोषण से लड़ाई तब तक नहीं जीती जा सकती है, जब तक कि इसके अभियान की निरंतर निगरानी नहीं की जाएगी।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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