तापमान में वृद्धि मानवता के लिए खतरा

बाल मुकुन्द ओझा

पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट में दुनिया को साफ तौर पर चेताया गया है और कहा गया है हम ग्लोबल वार्मिंग पर अभी भी नहीं सम्भले तो यह खतरा बढ़ता ही जायेगा जिसके परिणाम खतरनाक होंगे। संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि ग्लोबल वार्मिंग तेज हो रही है और इसके लिए साफ़ तौर पर मानव जाति ही ज़िम्मेदार है। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पृथ्वी की औसत सतह का तापमान साल 2030 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा। रिपोर्ट में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि तापमान में वृद्धि की वजह इन्सान द्वारा उत्सर्जन ही है। हालाँकि पेरिस जलवायु समझौते में विश्व के नेताओं ने इस बात पर सहमति व्यक्त की थी कि वैश्विक तापमान में वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस से कम रखना है। इस लिहाज से यह ताज़ा रिपोर्ट बेहद चिंतनीय है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने कहा यह रिपोर्ट मानवता के लिए बेहद खतरनाक है। खतरे की घंटी बज रही है, और सबूत अकाट्य है। जीवाश्म ईंधन जलने और वनों की कटाई से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन हमारे ग्रह को घोंट रहा है और अरबों लोगों को तत्काल खतरे में डाल रहा है।
जलवायु परिवर्तन पर इन्टर-गवर्मेन्टल पैनल (आईपीसीसी) मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार कर हर वर्ष जारी करता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा 1988 में आईपीसीसी को स्थापित किया गया था। इस रिपोर्ट को पृथ्वी की जलवायु की स्थिति का सबसे व्यापक वैज्ञानिक मूल्यांकन के रूप में जाना जाता है। दुनियाभर के नेताओं और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस रिपोर्ट पर चिंता व्यक्त की है और इस बात पर सहमति भी, कि बड़ा संकट टालने के लिए फौरन कदम उठाए जाने की जरूरत है।
प्रकृति व पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। प्राकृतिक संपदाओं के महत्व को समझना, उनका किफायती उपयोग करना, उनके संरक्षण को प्राथमिकता देना हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। जल, जंगल और जमीन प्रकृति के तीन प्रमुख तत्व हैं जिनके बगैर हमारी प्रकृति अधूरी है। प्रकृति के इन तीनों तत्वों का इस कदर दोहन किया जा रहा है कि इसका सन्तुलन डगमगाने लगा है। प्रकृति के साथ हम बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ कर रहे हैं, यह उसी का नतीजा है कि पिछले कुछ समय से भयानक तूफानों, बाढ़, सूखा, भूकम्प जैसी आपदाओं का सिलसिला तेजी से बढ़ा है। हम प्रकृति की चिंता नहीं करते और यही वजह है कि प्रकृति ने भी अब हमारी चिंता छोड़ दी है। हमनें बिना सोचे समझे संसाधनों का दोहन किया है। यही वजह है कि अब पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया है और बाढ़, सूखा, सुनामी जैसी आपदाएं आ रही हैं। बरसों से पर्यावरण को हम इंसानों ने बहुत नुकसान पहुंचाया है। प्रकृति से साथ इंसान का लगातार खिलवाड़ एक भयानक विनाश को आमंत्रण दे रहा है, जहां किसी को बचने की जगह नहीं मिलेगी।
प्राचीन काल में हमारा पर्यावरण बहुत साफ और शुध्द था। उस समय मानव और प्रकृति का अद्भुत सम्बन्ध था मगर जैसे जैसे मनुष्य ने प्रगति और विकासः के मार्ग पर अपने पैर रखे वैसे वैसे उसने पर्यावरण का साथ छोड़ दिया और पर्यावरण को प्रदूषित होने दिया। आबादी के विस्फोट ने आग में घी का काम किया और पर्यावरण तेजी से बिगड़ता चला गया। इस कारण हमारा सांस लेना भी मुश्किल हो गया। आज पृथ्वी वायु जल धवनि सभी प्रदूषित हो रहे है और मानव जीवन संकट में फँस गया है। विज्ञानं की तरक्की पेड़ों की अंधाधुंध कटाई शोर आदि सभी ने मिलकर पर्यावरण को भारी हानि पहुंचाई है। आज हर वस्तु प्रदूषित हो रही है। विश्व ने जैसे-जैसे विकास और प्रगति हासिल की है वैसे-वैसे पर्यावरण असंतुलित होता गया है। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, कल-कारखाने, उससे निकलते धुंए, वाहनों से निकलने वाले धुएं, वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, नदी और तालाबों का प्रदूषित होना आदि घटनाएं पर्यावरण के साथ खिलवाड़ है।
पर्यावरण और अकाल का भी चोली-दामन का साथ है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, वायु और जल प्रदूषण, से हमने अकाल को न्यौता दिया है। इन सब कारणों से हमारी खेती योग्य 18 लाख हैक्टेयर भूमि क्षेत्र बंजर और बेकार होकर रह गया है। देश में हर साल 15 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में वन नष्ट हो रहे हैं। मानव जीवन के लिये पर्यावरण का अनुकूल और संतुलित होना बहुत जरूरी है। देश के प्राकृतिक संसाधनों, जैसे-झील और नदियां, इसकी जैव-विविधता, वन्य और जीवन, जानवरों के संरक्षण को सुनिश्चित कर हम पर्यावरण को सुरक्षित रख सकते है। यह प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने आस-पड़ौस के पर्यावरण को साफ सुथरा रखकर पर्यावरण को संरक्षित करे तभी हमारे सुखमय जीवन को भी संरक्षित रखा जा सकता है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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