महान समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर

(29 जुलाई पुण्यतिथि)

देवानंद राय

भारत महापुरुषों की जन्मस्थली रहा है यहां पर समय-समय पर महान लोगों ने जन्म लिया और समाज को एक नई राह दिखाई ऐसे ही एक महान समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर की आज पुण्यतिथि है वह समाज सुधारक होने के साथ ही प्रसिद्ध विद्वान भी थे। उनके व्यक्तित्व में भारतीय एवं पाश्चात्य विचारों का सुंदर समन्वय था, वैसे नैतिक मूल्यों में विश्वास रखते थे जो मानवता के लिए समर्पित और गरीबों के उद्धार के लिए हो। ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म 26 सितंबर 1820 को बंगाल के मेदिनीपुर जिले के वीर सिंह गांव में हुआ था। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपना पूरा जीवन समाज को सुधारने में और उसकी सेवा में समर्पित किया भारत के पुरुष प्रधान समाज में विद्यासागर महिलाओं की आवाज बनकर उभरे।भारत के पुनर्जागरण के प्रमुख नेताओं में जिसमें राजा राममोहन राय जिन्हें भारतीय पुनर्जागरण का जनक और आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है उस समाज सुधार आंदोलन में देवेंद्र नाथ टैगोर ,केशव चंद्र सेन, दयानंद सरस्वती के बीच ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने महिलाओं खासकर विधवाओं के उत्थान और कल्याण के लिए जो काम किए वो उन्हें अन्य लोगों से अलग बनाते हैं। अपनी बहुमुखी प्रतिभा के लिए विश्व प्रसिद्ध ईश्वर चंद्र विद्यासागर संस्कृत के प्रकांड विद्वान भी थे, उनकी विशिष्ट प्रतिभा को देखते हुए अध्ययन काल में ही कोलकाता के संस्कृत कॉलेज ने उन्हें विद्यासागर की उपाधि दी। 1850 में वे संस्कृत कॉलेज के प्रधानाचार्य बने उन्होंने संस्कृत अध्ययन के लिए ब्राह्मणों के एकाधिकार को चुनौती दी और गैर ब्राम्हण जातियों को संस्कृत अध्ययन के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने संस्कृत शिक्षा के परंपरागत स्वरूप को समाप्त किया तथा संस्कृत कॉलेज में अंग्रेजी शिक्षा का प्रबंध किया जिससे कॉलेज में आधुनिक दृष्टिकोण का प्रसार हो।उन्होंने संस्कृत शिक्षा को नया रूप दिया और इसे पढ़ने के लिए नई तकनीक विकसित की बांग्ला भाषा के विकास के लिए उन्होंने काफी काम किया।उन्होंने संस्कृत पढ़ने के लिए बंगला भाषा में वर्णमाला भी लिखा। भारत का रूढ़िवादी समाज जब अंधविश्वासों और तरह-तरह के कर्मकांड में उलझा हुआ था उस वक्त उन्होंने नारी शिक्षा पर खास जोर दिया उस समय समाज में लड़कियों की शिक्षा को लेकर तरह-तरह की भ्रांतियां थी। इन भ्रांतियों को दूर करने के लिए ईश्वरचंद ने आंदोलन किया वह घर-घर घूमे तथा लोगों को बेटियों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया यह काम आसान नहीं था। उन्हें कदम कदम पर विरोध और तिरस्कार झेलना पड़ा लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की और अपने मिशन में समर्पित भाव से लगे रहे।लड़कियों की पढ़ाई के लिए उन्होंने नारी शिक्षा फंड भी बनायाा। ईश्वर चंद्र विद्यासागर कम से कम 35 बालिका विद्यालयों से जुड़े हुए थे।जिनमें से कई स्कूलों का संचालन वे स्वयं अपने खर्चे से करते थे।वे यहीं नहीं रुके उन्होंने आदिवासियों के लिए रात्रि पाठशाला भी खोली आदिवासी की लड़कियों के लिए उन्होंने देश का पहला स्कूल भी खोला था। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह के लिए एक जोरदार आंदोलन चलाया जिसके फलस्वरूप सरकार ने विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता दी। उन्होंने बहू पत्नी विवाह एवं बाल विवाह का कड़ा विरोध किया। 1840 एवं 1850 में स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में चलाए गए उनके सशक्त आंदोलन के फलस्वरुप ही कोलकाता में बेथुन स्कूल की स्थापना हुई और 1849 में वे इसके सचिव भी बने और भारत में स्त्रियों के लिए उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए। विद्यासागर बाल विवाह के भी खिलाफ रहे। भारत में बाल विवाह की समस्या प्रारंभ से रही है विद्यासागर ने इसके लिए भी आंदोलन चलाया और उनके दबाव के कारण 1860 में लड़की की विवाह की न्यूनतम आयु 10 वर्ष कर दी गई इससे कम आयु में विवाह को अपराध घोषित किया गया, बाद में ब्रिटिश सरकार ने बाल विवाह को प्रतिबंधित करने के लिए तीन अधिनियम भी पारित किया जिसमें पहला सिविल मैरिज एक्ट या नेटिव मैरिज एक्ट 1972 के नाम से जाना जाता है जिसमें बालिका के विवाह की न्यूनतम आयु 14 वर्ष तथा लड़कों की 18 वर्ष की गई दूसरा अधिनियम सम्मति आयु अधिनियम 1891 के नाम से जाना जाता है। जिसमें लड़कियों की विवाह की न्यूनतम आयु 12 वर्ष कर दी गई जिसका बाल गंगाधर तिलक ने विरोध किया था अंत में बाल विवाह निरोधक अधिनियम 1929 जिसे सामान्य तौर पर शारदा एक्ट के नाम से जाना जाता है जो प्रसिद्ध प्रसिद्ध शिक्षाविद् डॉ हरविलास शारदा के प्रयत्न से बना था। इस अधिनियम द्वारा विवाह की न्यूनतम आयु लड़कियों की 14 तथा लड़कों की 18 वर्ष की गई। आजादी के बाद 1978 में बाल विवाह निरोधक अधिनियम को संशोधित किया गया और बालक के विवाह की आयु 18 से बढ़ाकर 21 की गई तथा बालिका की विवाह बढ़ाकर 14 वर्ष निर्धारित की गई और बाल विवाह का समर्थन करने वाले लोगों के लिए दंड का प्रावधान भी किया गया। 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम को पारित कराने में ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मुख्य भूमिका रही,इस अधिनियम के तहत विधवाओं के पुनर विवाह को कानूनी मान्यता प्रदान की गई भारत के अंतिम गवर्नर जनरल और भारत के प्रथम वायसराय लॉर्ड कैनिंग के समय यह विधेयक यह अधिनियम पारित हुआ था। 1856 में पारित इस कानून से पहले देश में विधवा महिलाओं की जिंदगी आसान नहीं थी। बाल विवाह जैसी कुप्रथा वाले दौर में कम उम्र में विधवा हो चुकी लड़कियों की संख्या देश में काफी कि ईश्वर चंद्र विद्यासागर के दयालु हृदय में इस दर्द को करीब से महसूस किया और उन्होंने इस सामाजिक बुराई को दूर करने का प्रयास किया जिसमें वे सफल भी हुए साथ ही उन्होंने अपने कलावती बेटे की शादी भी विधवा से करा कर समाज के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण दिया। जिस प्रकार राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध अभियान छेड़ कर पूरे देश में समाज सुधार की एक लहर चला दी ठीक वैसे ही ईश्वर चंद्र विद्यासागर भी उनके पथ पर चलते हुए विधवा पुनर्विवाह जैसी सामाजिक बुराई को दूर करने के लिए राममोहन राय के द्वारा बनाई गई रणनीति पर चलें वह रणनीति यह थी कि जब भी किसी हानिकारक प्रथा को चुनौती देना होता था तो राजा राममोहन राय अक्सर प्राचीन धार्मिक ग्रंथों से ऐसे श्लोक की या वाक्य ढूंढने का प्रयास जो उस सोच का समर्थन करते हो इसके बाद वे दलील देते कि यह पुरानी परंपरा वर्तमान समय में फिट नहीं बैठ रही है। प्रसिद्ध समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने भी विधवा विवाह के पक्ष में प्राचीन ग्रंथों का ही हवाला दिया था, अंग्रेज सरकार ने उनके सुझाव मान लिया और 1856 में विधवा विवाह के पक्ष में कानून भी पारित किया। समाज के लिए इतनी महान काम करने वाले ईश्वर चंद्र विद्यासागर को अपने समाज सुधार कार्योंं के प्रशंसा मिली उतना ही तिरस्कृत भी किया गया उन्हें समाज से बहिष्कृत भी किया गया परंतु वह अपने समाज सुधार आंदोलन और अपने कामों से अलग नहीं हुए। इसी कारण वे आज भी पूरे भारत में याद किए जाते हैं देश में जब जब महिला सुधारों की बात चलेगी तब तब ईश्वर चंद्र विद्यासागर का नाम सर्वोच्च स्थान पर होगा।

 

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