ये जिहादी हिंसा दलित-मुस्लिम एकता की कब्र खोदती है

विष्णुगुप्त

दलितों पर टूटने वाली मुस्लिम हिंसा की कुछ नमूने यहां देखिये और फिर दलित-मुस्लिम एकता की राजनीति करने वालों का चाल चरित्र का अनुमान लगा लीजिये और यह भी पता कर लीजिये कि आखिर देश की राजनीति मे दलित-मुस्लिम एकता की राजनीति सिर चढ कर क्यों नहीं बोलती है, राजनीतिक पार्टियां दलित-मुस्लिम एकता की बात कर राजनीतिक उफान तो पैदा जरूर करती हैं पर खास कर दलित जनता इस तथाकथित एकता के खिलाफ ही अपना समर्थन व्यक्त करती हैं। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि दलितों पर मुस्लिम जिहाद की हिंसा किस प्रकार से टूटती है, दलितों पर मुस्लिम किस प्रकार से उत्पीड़न और अपमानित करने के जिहाद में सक्रिय हैं? यहां पर कुछ इसके राजनीतिक और गैर राजनीतिक उदाहरण उपस्थित है। पहला उदाहरण बहुत ही खतरनाक है, लोमहर्षक, डरावना है, राजनीति की जिहाद समर्थक प्रवृति को उजागर करती है, यह उदाहरण बिहार के पूर्णियां जिले के मझुआ गांव का है जहां पर महादलितों की बस्ती पर सैकड़ों की संख्या में मुस्लिम जिहादियों की भीड़ हमला करती है और महादलितों की पूरी बस्ती को आग लगा कर स्वाहा कर देती है, महादलितों को कोई एक नहीं बल्कि पचास से अधिक घर जला कर राख कर दिये गये, एक महादलित को पीट-पीट कर हत्या कर डाली, दलित महिलाओं की इज्जत पर हाथ डाला गया। इस लोमहर्षक हत्या और आगजनी की घटना पर दलित मुस्लिम एकता की बात करने वाली कोई पार्टियां और कोई नेता नोटिस तक नहीं लिया। दूसरी घटना उत्तर प्रदेश की है। उत्तर प्रदेश के नूरपुर गांव मंें दलितों के दो-दो बरातों पर मुस्लिमों की जिहादी भीड हमला करती है, दूल्हें सहित पूरी बारात को पीटा जाता है, बारात वापस लौटने के लिए मजबूर किया जाता है, बारात नहीं लौटाने पर पूरी बारात को काट कर फेंकने की धमकी दी जाती है, डर कर दोनों बारातें लौट गयी। अभी-अभी तीसरा उदाहरण भी सामने आया है। यह उदाहरण राजस्थान से जुड़ा हुआ है। राजस्थान के झाडवाला में कृष्ण नाम के एक बाल्मिकी युवक को मुस्लिमों की जिहादी टोली ने पीट पीट कर मार डाला। चैथा उदाहरण उत्तर प्रदेश के मुजफफरपुर के कैथोड़ा गांव की है जहां पर दलितों की जमीन पर मुसलमानों की भीड़ ने कब्र खोद दी और उसे बलपूर्वक कब्रिस्तान बना दिया। पाचवां उदाहरण देश की राजधानी दिल्ली से जुडा हुआ है ,जहां पर एक दलित युवक का एक मुस्लिम युवती के साथ प्रेम हो जाता है, दोनों अपनी मर्जी से शादी करते हैं और साथ-साथ रहने की कोशिश करते हैं। यह जिहादी मुसलमानों को स्वीकार नहीं होता है, एक बाल्मिकी युवक द्वारा मुस्लिम युवक की शादी पर जिहादी मुसलमान बर्बर हो जाते हैं, जिहादी मुसलमानों की गोलबंदी हो जाती है, हथियारों से लैस होकर जिहादी मुस्लिम भीड़ बाल्मिकी युवक के टोले पर हमला कर देती है, बाल्मिकियों के पूरे टोले में हिंसा को अंजाम देती हैं, बाल्मिकियों को बुरी तरह पीटा जाता है, उनके घरों में तोड फोड होता है, बाल्मिकी औरते की इज्जत पर हाथ डाला जाता है। पाचवां उदाहरण उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिलें का है जहां पर दलितों के घरों को मुसलमानों ने आग लगा दी थी। छठा उदाहरण बेंगलुरू का है। बेंगलुरू की मुस्ल्मि हिंसा को कौन भूल सकता है। एक दलित कांग्रेसी विधायक के भतीजे ने सोशल मीडिया पर कुछ बातें लिख देता है फिर मुस्लिम जिहादियों की हिंसा कैसी बरपी थी, यह भी जगजाहिर है। कई सरकारी प्रतिष्ठानों को आग के हवाले कर दिया गया था। उस दलित युवक की जान लेने की पूरी कोशिश हुई थी।
ये तो मुस्लिम जिहादी हिंसा के उदाहरण है। दलितों के साथ राजनीतिक तौर पर मुस्लिमों द्वारा होती ज्यादतियों का भी उदाहरण देख लीजिये। बार-बार यह बात उठती है कि मुस्लिम शिक्षण संस्थानों में दलितों के प्रवेश या अन्य जगहों पर आरक्षण क्यों नहीं मिलता है। देश भर में जामिया इस्लामियां यूिनर्वर्सिटी और अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी सहित दर्जनो अन्य शिक्षण संस्थानें भी हैं। पर इन सभी शिक्षण संस्थानों में दलितों को किसी प्रकार से आरक्षण नहीं मिलता है। जब कभी भी मुस्लिम शिक्षण संस्थानों में दलितों के आरक्षण की बात उठती है तब मुसलमान अपनी जिहादी भूमिका में खडे हो जाते हैं और कहते हैं कि यह हमारा धार्मिक प्रसंग है, इस प्रसंग में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। मायावती, रामराज और रावन जैसे जितने भी दलितों के तथाकथित ठग और पैरवीकार है ये कभी भी मुस्लिम शिक्षण संस्थानों में दलितों के आरक्षण पर मुसलमानों की घेराबंदी नहीं करते हैं। सबसे बडी बात यह है कि दलितों के साथ लव जिहाद की घटनाएं भी खूब हो रही है। जो दलित लडकियां सरकारी सेवा में आ गयी है वैसी लड़कियों पर लव जिहाद के हमले खूब होते हैं। दलितों की जमीन हथियाने और आरक्षित सीटों पर चुनाव लडा कर राजनीतिक शक्ति हासिल करने के लिए लव जिहाद जारी है।
आजादी के आंदोलन के दौरान भी दलित मुस्लिम एकता की बात और हथकंडा चलाने की कोशिश हुई थी। पर दलितों के पास उस समय भविष्य की दृष्टिवाली राजनीतिक विरासत उपस्थित थी। डाॅ भीभराव अबंडेकर इस्लाम और मुसलमानों की पैंतरेबाजी को जानते थे, उसके एजेंडे को जानते थे और यह मानते थे कि जिहादी इस्लाम और जिहादी इस्लाम से प्रेरित मुसलमान अवसर पाते ही दलितों को हलाल कर देंगे। इसीलिए उन्होंने दलित और मुसलमानों की एकता की बात को ठुकरा दिया था। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि डाॅ भीभराव अंबेडकर ने इस्लाम को भी खारिज कर दिया था। डाॅ भीम राव अंबेडकर पर इस्लाम स्वीकार करने का बहुत दबाव था, लालच था। पर उन्होंने इस्लाम स्वीकार नहीं किया था और न ही दलितों को मुसलमानों के साथ किसी भी प्रकार के गंठबंधन के लिए प्रेरित किया था। पर जोगेन्द्र मंडल मुसलमानों के इस फेर में जरूर पडे थे और अपना सर्वनाश कराया था। अंबेडकर की तरह ही जोगेन्द्र नाथ मंडल की हैसियत थीे। जोगेन्द्र नाथ मंडल ने पाकिस्तान के साथ जाने और दलित मुस्लिम एकता पर आधारित पाकिस्तान की कल्पना की थी। जोगेन्द्रनाथ मंडल को पाकिस्तान का अंबेडकर भी कहा जाता था। पर पाकिस्तान में जिस प्रकार से दलितो पर हमले और हिंसा शुरू हो गयी थी, दलितों को मुसलमान बनाने के लिए जिहाद शुरू हुआ था ,उससे जोगेन्द्र नाथ मंडल इतनेे आहत और असुरक्षित हुए कि उनकी राजनीतिक मौत हो गयी और डर कर पाकिस्तान से भाग कर भारत आ गये। भारत में ही जोगेन्द्र नाथ मंडल की गुमनामी में मौत हुई थी।
दलित पार्टियां और दलित नेताओं की राजनीतिक मंशा और उनके इस्लाम-मुसलमान प्रेम के साथ दलित जनता क्यों नहीं खडी होती है? सबसे बडी बात यह है कि दलित पार्टियां, दलित नेता और दलित जनता इस्लाम और मुसलमानों को लेकर अलग-अलग विचार रखती हैं, इनकी इस्लाम को लेकर मानसिकताएं भी अलग अलग हैं। दलित राजनीतिक पार्टियां और दलित नेता जहां मुसलमानांें के साथ राजनीतिक एकता की बात करते हैं, इसके लिए वे किसी भी हद तक जाने से भी परहेज नहीं करते हैं, मुस्लिम आतंकवाद तक का भी समर्थन कर देते हैं, मुसलमानों द्वारा दलितों पर होने वाली हिंसा और जिहाद के तथ्यों पर उदासीनता बरतते हैं, खामोशी व्यक्त करते हैं,ढकने-तोपने की राजनीतिक करते हैं। पर दलित जनता अभी भी मुसलमानों को अपने साथ एकता वाली बात को नहीं पचा पाती हैं, इस्लाम और मुसलमानों के प्रति वैसी ही धारणाएं रखती है जैसी धारणाएं शेष पूरी दुनिया की मुस्लिम और इस्लाम के प्रति धारणाएं हैं। मायावती ने उत्तर प्रदेश में मुस्लिम और दलित एकता की बात पक्की करने की पूरी कोशिश की थी। पर राजनीतिक मजबूरी में सिर्फ मायावती की अपनी जाति ही मजबूती के साथ खडी रही थी। अधिकतर दलित जनता मायावती के मुस्लिम प्रेम को खारिज करती रही हैं। अगर अधिकतर दलित जनता इस्लम और मुसलमानों के साथ राजनीतिक एकता की बात स्वीकार कर लेती तो फिर देश में मायावती जैसी राजनीतिज्ञ की कितनी राजनीतिक पौ बारह होती, यह समझा जा सकता है। मुसलमान उसी को वोट करते हैं या साथ देते हैं जो भाजपा को हराने के लिए सक्षम होते हैं। अगर भाजपा के सामने सपा और कांग्रेस ताकतवर हैं तो फिर मुसलमान सपा और कांग्रेस के साथ खडे होंगे, न कि मायावती के साथ। मुसलमानों की इस सच्चाई को दलित जनता अच्छी तरह से समझती हैं।
खासकर मायावती, रामलाल, रावन जैसे तथाकथित राजनीतिज्ञ अब दलित जातियों को मूर्ख नहीं बना सकते हैं, उन्हें मुसलमानों के साथ खड़ा होने, मुसलमानों के साथ राजनीतिक एकता प्रदर्शित करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते हैं। दलित जनता अब स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों के कारण मुसलमानों की नकरात्मक भूमिका, मुसलमानों की जिहादी हिंसा से मुंह नहीं मोड़ सकती हैं, नजरअंदाज नहीं कर सकती है। स्थानीय परिस्थितियों में उनकी सुरक्षा और विकास एक महत्वपूर्ण कसौटी है। सबसे बडी बात यह है कि जब मुस्लिम जिहादी हिंसा उनके उपर कहर बन कर टूटती है तो मायावती भी खामोश होती है, राम राज भी खामोश होते हैं, रावण भी खामोश होते हैं, कांग्रेस भी खामोश होती है, सपा भी खामोश होती है, कम्युनिस्ट भी खामोश होते हैं। ऐसी उदासीनता और खामोशी को सिर्फ भाजपा ही तोडती है। भाजपा ही मुस्लिम जिहादी हिंसा पर दलितों की सुरक्षा और न्याय के लिए आगे आती है। इसलिए दलितों के बीच में भाजपा की पैठ बनी है। इन परिस्थितियों को नजरअंदाज करना और मुस्लिम जिहादी हिंसा के प्रति हमेशा खामोश रहने की राजनीति अब दलित पार्टियो और दलित नेताओं पर ही भारी पडने वाली है।

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