भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं आई

बाल मुकुन्द ओझा

संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन ने कोरोना महासंकट के दौरान गरीब और विकासशील देशों में लोगों के समक्ष गहराए खाद्य संकट पर बेहद चौंका देने वाली रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट को माने तो वैश्विक आबादी के 12 प्रतिशत लोगों को गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना करना पड़ा है। इन स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड 2021 शीर्षक से हालिया जारी रिपोर्ट में बताया गया की 2020 में, 2.37 बिलियन लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल सका। रिपोर्ट के अनुसार आय में कमी के कारण स्वस्थ भोजन की सामर्थ्य में उल्लेखनीय कमी आई है। कोरोना महामारी के कारण अतिरिक्त 141 मिलियन लोग आय की हानि और खाद्य कीमतों में वृद्धि के कारण स्वस्थ आहार का खर्च उठाने में असमर्थ हो गए। 2020 के समाप्त होते ही वैश्विक उपभोक्ता खाद्य कीमतें छह वर्षों में सबसे अधिक थीं जो 2021 के पहले चार महीनों में बढ़ती रहीं। रिपोर्ट के अनुसार 2019 के मुकाबले में इस आँकड़े में 320 मिलियन लोगों की वृद्धि हुई है। 2020 में दुनिया भर में तीन में से एक व्यक्ति को पर्याप्त भोजन नहीं मिल सका।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन की इस रिपोर्ट की विशद विवेचना करें तो पाएंगे भूख और कुपोषण से निपटने के लिए वैश्विक प्रयास सफल नहीं हुए। कोरोना महामारी ने इन प्रयासों को पलीता लगा दिया। वैश्विक अर्थव्यवस्था की तबाही ने भी आग में घी का काम किया। भुखमरी से निपटने, और गरीब देशों को खाद्य सुरक्षा सुलभ करने के प्रयासों में तेजी लानी होंगी तभी हम यह लड़ाई जीत सकेंगे। दुनिया भर में भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। कोरोना महामारी के कारण यह संख्या तेजी से बढती जा रही है। विश्व में आज भी कई लोग ऐसे हैं, जो भूखमरी से जूझ रहे हैं। विश्व की आबादी वर्ष 2050 तक नौ अरब होने का अनुमान लगाया जा रहा है और इसमें करीब 80 फीसदी लोग विकासशील देशों में रहेंगे। एक ओर हमारे और आपके घर में रोज सुबह रात का बचा हुआ खाना बासी समझकर फेंक दिया जाता है तो वहीं दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें एक वक्त का खाना तक नसीब नहीं होता। कमोबेश हर विकसित और विकासशील देश की यही कहानी है।
विश्वभर में हर 8 में से 1 व्यक्ति भूख के साथ जी रहा है। भूख और कुपोषण की मार सबसे कमजोर पर भारी पड़ती हैं। दुनिया में 60 प्रतिशत महिलाएं भूख का शिकार हैं। गरीब देशों में 10 में से 4 बच्चे अपने शरीर और दिमाग से कुपोषित हैं। दुनिया में प्रतिदिन 24 हजार लोग किसी बीमारी से नहीं, बल्कि भूख से मरते हैं। इस संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत में आता है। भूख से मरने वाले इन 24 हजार में से 18 हजार बच्चे है और 18 हजार का एक तिहाई यानी 6 हजार बच्चे भारतीय है। एक तरफ देश में भुखमरी है वहीं हर साल सरकार की लापरवाही से लाखों टन अनाज बारिश की भेंट चढ़ रहा है। हर साल गेहूं सड़ने से करीब 450 करोड़ रूपए का नुकसान होता है।
भारत की आबादी में देश की आजादी के बाद बहुत विस्तार हुआ है। बढ़ती हुई आबादी के साथ रोजगार के साधनों के अभाव के फलस्वरूप देश को गरीबी, भुखमरी, अनपढ़ता और कुपोषण का सामना करना पड़ रहा है। भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सहायता कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद कुपोषण लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। अनुमान है कि दुनिया भर में कुपोषण के शिकार हर चार बच्चों में से एक भारत में रहता है। जनसंख्या वृद्धि के कारण खाद्यान्न समस्या का सबसे अधिक सामना विकासशील देश कर रहे हैं। सवा अरब आबादी वाले भारत जैसे देश में, जहां सरकारी आकलनों के अनुसार 32 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं, अत्यंत शोचनीय है।
मानव जीवन के लिए खाद्य पदार्थों की सुरक्षा अति महत्वपूर्ण है। लोगों को सुरक्षित और पौष्टिक भोजन का प्रकृति प्रदत अधिकार है। संयुक्त राष्ट्र ने विश्व स्वास्थ्य संगठन और खाद्य और कृषि संगठन को खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी दी है। कोरोना महामारी में लाखों लोग बेरोजगार होकर रोजी रोटी के लिए दर दर भटक रहे है। इस दौरान लाखों पुरुष, महिला और बच्चे भुखमरी का सामना कर रहे हैं।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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