लुप्त होती सांस्कृतिक विरासत को बचाने की दरकार

विश्व एथनिक दिवस 19 जून पर विशेष

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल, कोटा

विश्व के अलग-क्षेत्रों की एतिहासिक विरासत,सभ्यता,मानवजाति,विज्ञान,कला,संस्कृति के संरक्षण एवं शरजने के लिए प्रति वर्ष 19 जून को विश्व एथनिक दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2015 में हिंदी फिल्मों की विख्यात अभिनेत्री विद्या बालन को एथनिक उत्पादों की ओं लाइन कंपनी क्राफ्ट्सविला डॉट कॉम ने इस दिवस का ब्रांड एम्बेसडर बनाया। उस समय विद्या बालन ने कहा था इस दिवस के माध्यम से हमें अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ने का अवसर प्राप्त होता है। मै अपनी धूमिल होती हथकरघा की कला एवं कलाकारों के पलायन के दर्द को महसूस करती हूं। मुझे खुशी है कि इस क्षेत्र में जागरूकता फैलाने का अवसर मुझे मिला है।

जब हम विश्व की संस्कृति की चर्चा करते हैं तो एथनिक रूप से पुरातत्व स्मारक, भवन, महल,किले, हवेली,छतरियां।  वनक्षेत्र,मरुस्थल, झील, तालाब, वन्य जीव । समस्त प्रकार की कलाएं चित्रकला,संगीत कला, नृत्य कला, स्वांग कला,नाट्य कला, रंगमंचीय कलाएं, हस्तकला, दस्तकार । प्राचीन परंपरागत खेल, आदिवासी समाज और उनकी परंपराएँ जैसा कोई भी संस्कृति का प्रतीक एवं किसी भी जाति-धर्म से जुड़ी परंपराएं जो लुप्त होने के कगार पर हैं का संरक्षण करना और सहेज कर रखने के प्रति जागरूकता फैला कर अपनी जमीन और जड़ों से जुड़ने पर इस दिवस को मनाना सार्थक होगा। आज गिनती पर गिने जा सकते हैं जो शास्त्रीय संगीत और शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा ग्रहण करते हैं।

लुप्त होती पुरा सम्पदा को संरक्षित करने के लिए पुरातत्व एवं संरक्षण विभाग बनाया गया है।देखने में आता हैं कि पर्याप्त बजट के अभाव में हमारी विरासत दम तोड़ रही हैं। कहने को तो धरोहर को संरक्षण में लिया गया हैं परंतु ये धरोहर अपनी हालत पर आंसू बहाति नज़र आती हैं। इस संदर्भ में हम राजस्थान के हाड़ौती अंचल की  चर्चा करें तो 7वीं से 12 वीं शताब्दी मध्य की पुरा सम्पदाओं की भरमार हैं पर सभी की दशा सोचनीय हैं। यही स्थित कमोबेस भारत वर्ष की पुरा सम्पदाओं की हैं। देश की एतिहासिक , सांस्कृतिक ,प्राकृतिक 42 धरोहरों को यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया हैं।

 हमारा आदिवासी समाज आधुनिकीकरण की चकाचौंध में अपनी संस्कृति से दूर चला जा रहा है। मौलिक परम्पराएं कहीं खो सी रही हैं। इन समाजों पर मौलिकता बनाये रखने का संकट हैं। जिनके नृत्य,संगीत,वेशभूषा, रहन-सहन सभी अपनी मौलिकता खो रहे हैं। जिन्हें बचाने के लिए भारत के सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा विभिन्न सांस्कृतिक जोन्स के माध्यम से प्रयास किये जाते हैं, जिनको तीव्र करने की जरूरत हैं।

भारत की हस्तकलाएँ और दस्तकारी कला की अपनी पहचान हैं। बुनकरों द्वारा हथकरघे पर बनी साड़ियां, दरी, खेस,चद्दर आदि वस्त्रों को भी अभी तक समुचित संरक्षण नहीं मिल पाया हैं। मिट्टी के पात्रों की प्राचीन मृण कला, ऊंट की खाल पर बनाई जाने वाली उस्तकला, पीतल ,हाथी दांत एवं चंदन की लकड़ी की कलाएं ,बारामासी चित्रकला,पिछवाई,फड़ चित्रण एवं गायन जैसी अनेक कलाएं संकट में हैं। कभी प्रसिद्ध बनारसी साड़ी, पटोला साड़ी, कांजीवरम साड़ी, सिल्क की साड़ी धीरे-धीरे पसन्द से दूर हो रही हैं। केवल कुछ जगह विशेष तक सिमट कर रह गई हैं जबकि कभी पूरे देश में इनकी धूम थी। दस्तकारों एवं हस्तशिल्प को प्रोत्साहित करने के लिए जगह-जगह हस्तशिल्प मेलों का आयोजन भी किया जाता हैं। राजस्थान में हस्तकला का समृद्ध बाजार हैं।

हमारे परम्परागत खेल कबड्डी,कुश्ती,दडी मार,सितोलिया, दौड़,ऊंचा कूदना,लंबाई में कूदना जैसे खेलों का तो आज की नई पीढ़ी को पता तक नहीं हैं। राजस्थान सरकार ने राजस्थान दिवस पर इन परम्परागत खेलों के संरक्षण के लिये विगत कुछ वर्षों से प्रयास प्रारम्भ किये हैं, जिसमें अच्छा रुझान देखने में आया हैं। इस प्रकार के प्रयोग सभी राज्यों में किये जाने चाहिए जिससे हमारे परंपरागत खेलों का संरक्षण हो सके।

वन्य जीव संरक्षण की चर्चा करें तो चम्बल नदी में लुप्त होते घड़ियालों के लिए राष्ट्रीय घडियाल सेंक्चुरी बनाई गई। राजस्थान के राज्य पक्षी गोडावण के संरक्षण हेतु योजना बनाई गई। बाघ संरक्षण परियोजना संचालित हैं। कई राज्यों में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में कदम उठाए गए हैं।

कला,संस्कृति और सभ्यता के ऐसे और भी कई पक्ष या पहलू हो सकते हैं जो लुप्त होने को हैं उनके संरक्षण और सहेज ने की दिशा में सकारात्मक सोच और प्रयासों के लिए संकल्प ही ऐसे दिवसों की सार्थकता सिद्ध कर सकता है। सरकारी प्रयासों के साथ निजी भागीदारी आवश्यक हैं। 

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