इंटरनेट ने निगला बच्चों का बचपन

बाल मुकुन्द ओझा

हाथी मेरे साथी की बात अब सिनेमाई परदे तक सिमट कर रह गयी है। कोराना महामारी के दौरान बच्चों का सबसे प्रिय साथी मोबाइल बन गया है। पिछले डेढ़ साल से स्कूलों के ताला जड़ा है जिसके अभाव में पढ़ाई और खेलकूद बंद है। पढ़ाई के नाम पर ऑनलाइन शिक्षा का खेल चल रहा है। ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर बच्चों के हाथों में मोबाइल थमा दिया गया है। इसी के साथ बच्चे आभासी दुनिया में खो गए है। पढ़ाई का झुनझुना ख़त्म होते ही बच्चों के हाथ तरह-तरह के गेम लग गए है। अब ये गेम ही उनकी दीन दुनिया हो गयी है। ऑनलाइन गेम खेलने में व्यस्त बच्चे खाना-पीना तक भूलने लगे। इस कारण वे इंटरनेट गेमिंग एडिक्शन का शिकार हो रहे हैं। यह समस्या एक घर की नहीं अपितु घर घर की हो रही है। आज स्थिति यहाँ तक आन पड़ी है की बच्चों के हाथ से मोबाइल छीनते ही वे बेचैनी महसूस करते है। गुस्से से भर जाते है। चिड़चिड़े हो जाते है। घर के किसी काम में कोई रूचि नहीं लेते है। अभिभावकों के लाख टोकने और डांटने का भी उनपर कोई असर नहीं पड़ रहा है। गेमिंग का यह चक्रव्यूह बच्चों का भविष्य कहाँ लेकर जायेगा यह बताने की स्थिति में कोई नहीं है।
इंटरनेट क्रांति ने सूचना तकनीक के क्षेत्र में जहाँ नए आयाम स्थापित किये है वहां इसके दुष्परिणामों से भी दो दो हाथ करने पड़ रहे है। उनका बचपन और शैक्षिक जीवन इंटरनेट के जंगल में गुम हो रहा है। पिछले कई सालों से सूचना तकनीक ने जिस तरह से तरक्की की है उसने छात्रों की जीवनशैली को ही बदल डाला है। बच्चे और युवा एक पल भी स्मार्टफोन से खुद को अलग रखना गंवारा नहीं समझते। इनमें हर समय एक तरह का नशा सा सवार रहता है। मौजूदा दौर में बच्चों में खेलकूद और पढाई का स्थान इंटरनेट ने ले लिया है। इसका सीधा प्रभाव बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ा है। शहरों के साथ अब गांवों में भी मोबाइल की पहुँच होने से बच्चों में इंटरनेट की लत बढ़ गई है। इससे उनमें संवादहीनता का खतरा बढ़ रहा है। बच्चे के ऐसे व्यवहार को अनदेखा करने की जगह इस पर सजग और सावधान होने की जरूरत है। शहरों के साथ अब गांवों में भी मोबाइल की पहुँच होने से बच्चों में इंटरनेट की लत बढ़ गई है। इससे उनमें संवादहीनता का खतरा बढ़ रहा है।
एक अभिभावक का कहना है उसका बेटा मोबाइल और लैपटॉप पर अपने दोस्तों के साथ गेम खेलने में इतना खो जाता है की कई आवाज लगाने पर भी हिलता तक नहीं। बाहर घूमने की जगह उनका बेटा कंप्यूटर पर व्यस्त रहता है, लेकिन अब उसके व्यवहार पर चिंता होने लगी है। वह किसी से बात करना तक पसंद नहीं करता, ज्यादा कुछ बोलों तो चिढ़ जाता है या चिल्लाकर जवाब देता है। एक दूसरा अभिभावक अपनी बेटी के व्यवहार से चिंतित है। वह कहती हैं कि अभी आठवीं कक्षा में ही है, लेकिन उसके अंदर इस उम्र के बच्चों सी चपलता और चंचलता नहीं है। काफी कम बोलती है। इंटरनेट सर्फिग में उसका खाली समय बीतता है।
देश में इंटरनेट के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल में बचपन खोता जा रहा है जिसकी परवाह न सरकार को है और न ही समाज इससे चिंतित है। ऐसा लगता है जैसे गैर जरुरी मुद्दे हम पर हावी होते जारहे है और वास्तविक समस्याओं से हम अपना मुंह मोड़ रहे है। यदि यह यूँ ही चलता रहा तो हम बचपन को बर्बादी की कगार पर पहुंचा देंगे। देश के साथ यह एक बड़ी नाइंसाफी होगी जिसकी कल्पना भी हमें नहीं है। जब से इंटरनेट हमारे जीवन में आया है तबसे बच्चे आभासी दुनियां में खो गए है। बाजार ने इंटरनेट पर इतना कुछ दे दिया है कि वह पढ़ने के अलावा बहुत कुछ इंटरनेट पर करते रहे हैं। आजकल के बच्चे इंटरनेट लवर हो गए हैं। इनका बचपन रचनात्मक कार्यों की जगह डेटा के जंगल में गुम हो रहा है। पिछले कई सालों में सूचना तकनीक ने जिस तरह से तरक्की की है, इसने मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डाला है बल्कि एक तरह से इसने जीवनशैली को ही बदल डाला है। बच्चे और युवा एक पल भी स्मार्टफोन से खुद को अलग रखना गंवारा नहीं समझते। इनमें हर समय एक तरह का नशा सा सवार रहता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर कहा गया है। आवश्यकता इस बात की है की हम नए जमाने को अपनाने के साथ उसकी बुराइयों पर भी निगाह रखे ताकि बचपन को गुमराह होने से बचाया जा सके।

 (लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं।)

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