भारी पड़ेगी भूजल की अनदेखी

विश्व भूगर्भ जल दिवस-10 जून

बाल मुकुन्द ओझा

10 जून को विश्व भूगर्भ जल दिवस के रूप में मनाया जाता है। पेयजल का मुख्य स्रोत भूगर्भ जल ही है। भूजल वह जल होता है जो चट्टानों और मिट्टी से रिस जाता है और भूमि के नीचे जमा हो जाता है। जिन चट्टानों में भूजल जमा होता है, उन्हें जलभृत कहा जाता है। भारी वर्षा से जल स्तर बढ़ सकता है और इसके विपरीत, भूजल का लगातार दोहन करने से इसका स्तर गिर भी सकता है। एक सर्वेक्षण अनुसार धरती का तीन चौथाई हिस्सा पानी से ढका हुआ है अर्थात लगभग 71 प्रतिशत पानी धरती के ऊपर मौजूद है और 1.6 प्रतिशत पानी धरती के नीचे नीचे है। जो पानी धरती के ऊपर मौजूद है, वह पानी पीने लायक नहीं है। शेष 3 प्रतिशत पानी पीने लायक है, जिसमें से 2.4 प्रतिशत पानी उत्तरी और हिस्से और ग्लेशियर में बर्फ के रूप में जमा हुआ है। सिर्फ 0.6 प्रतिशत पानी ही है, जो नदी और तालाब में मौजूद है जो पीने लायक है। यही 0.6 प्रतिशत पानी बढ़ती हुई आबादी और प्रदूषण के कारण पर्याप्त नहीं है, इसलिए धरती के नीचे जो पानी मौजूद है, उस पानी की भी बहुत ज्यादा आवश्यकता है।
भूजल के अंधाधुंध दोहन से न सिर्फ भूमिगत जल के स्तर में लगातार गिरावट आ रही है अपितु जमीन भी धंसने लग जाती है। एक वैश्विक अध्ययन में इसके दुष्परिणाम के प्रति आगाह किया गया है। इसमें बताया गया है कि भूजल के अत्यधिक दोहन व अन्य कुदरती कारणों से भविष्य में धरती का एक बड़ा भाग धंस सकता है, जिससे लगभग 63 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित होंगे। इसका सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों में देखने को मिलेगा। अध्ययन के लेखकों कहा, हमारे निष्कर्ष विश्वभर के नीति-नियंताओं को भूजल दोहन के दुष्परिणामों से बचने के लिए नीतियां बनाने पर जोर देते हैं। इस अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता गेरार्डो हेरेरा गार्सिया उनकी टीम ने बड़े पैमाने पर लिट्रेचर रिव्यू कर यह पता लगाया कि पिछली शताब्दी के दौरान 34 देशों के 200 स्थानों पर भूजल की कमी के कारण जमीन धंसने की घटनाएं हुई थीं। लिट्रेचर रिव्यू से आशय किसी विषय पर विशेषज्ञों द्वारा किए गए अध्ययन की समीक्षा से है। शोधकर्ताओं ने चेताते हुए कहा कि यदि ऐसा हुआ तो अगले चार वर्षो में 9.78 ट्रिलियन (लाख करोड़) डॉलर की जीडीपी चौपट हो जाएगी। जर्नल साइंस में प्रकाशित इस अध्ययन में कहा गया है कि वर्ष 2024 तक विश्व की 19 फीसद आबादी (वैश्विक जीडीपी का 21 प्रतिशत) जमीन की सतह धंसने के लिए जिम्मेदार होगी।
इस रिपोर्ट के इतर देखें तो देश में भूजल का गिरता स्तर स्पष्ट संकेत देने लगा है कि भविष्य में हालात और भी ज्यादा गंभीर हो सकते हैं। आज जिस तरह से मानवीय जरूरतों की पूर्ति के लिए निरंतर व अनवरत भूगर्भ जल का दोहन किया जा रहा है, उससे साल दर साल भूगर्भ जल का स्तर गिरता जा रहा है। घटते भूगर्भ जल के लिए सबसे प्रमुख कारण तो उसका अनियंत्रित और अनवरत दोहन ही है। आज दुनिया अपनी जल जरूरतों की पूर्ति के लिए सर्वाधिक रूप से भूगर्भ जल पर ही निर्भर है। लिहाजा, अब एक तरफ तो भूगर्भ जल का अनवरत दोहन हो रहा है तो वहीं दूसरी ओर तेज औद्योगीकरण के चलते प्रकृति को हो रहे नुकसान और पेड़-पौधों के अनियंत्रित दोहन के कारण बरसात में भी काफी कमी आ गई है। तेजी से गिरता भूजल स्तर दुनियाभर के लिए चिंता का सबब बना हुआ है।
देश अनेक क्षेत्रों में भूजल की समस्या का हल लाने के लिए मोदी सरकार ने अटल भूजल योजना प्रारम्भ की है। इस योजना को तेजी से क्रियान्वित किया जा रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 6584 भूजल ब्लॉकों में से 1034 ब्लॉकों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया गया है। इन ब्लॉकों के भूजल का वार्षिक उपभोग इनके पुनर्भरण से ज्यादा रहा। इसे डार्क जोन कहा जाता है। इसके अलावा 934 ब्लॉक ऐसे हैं जिनमें पानी का स्तर कम हो रहा है, लेकिन उनका पुनर्भरण नहीं किया जा रहा। ऐसे ज्यादातर ब्लॉक पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में हैं। गौरतलब है देश के 256 जिलों के 1500 ब्लॉक को जलस्रोतों के जरूरत से ज्यादा दोहन या अन्य कारणों से जलसंकट के लिहाज से गंभीर श्रेणी में रखा गया है। इन जिलों में भूजल को रीचार्ज करने के लिये जलशक्ति अभियान शुरु किया गया है।
भूजल की वर्तमान स्थिति को सुधारने के लिये भूजल का स्तर और न गिरे इस दिशा में काम किए जाने के अलावा उचित उपायों से भूजल संवर्धन की व्यवस्था हमें करनी होगी। पानी की कमी के चलते निरन्तर खोदे जा रहे गहरे कुओं और ट्यूबवेलों द्वारा भूमिगत जल का अन्धाधुन्ध दोहन होने से भूजल का स्तर निरन्तर घटता जा रहा है। देश में जल संकट का एक बड़ा कारण यह है कि जैसे-जैसे सिंचित भूमि का क्षेत्रफल बढ़ता गया वैसे-वैसे भूगर्भ के जल के स्तर में गिरावट आई है। भूजल दोहन के अंधाधुंध दुरुपयोग को यदि समय रहते रोका नहीं गया, तो आने वाली पीढियों को इसके भयानक परिणाम भुगतने होंगे। सरकार को जनता में जागरूकता लाने के लिए विशेष प्रबन्ध और उपाय करने होंगे।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

 

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