दिव्यांगों के जीवन में भरे प्यार का उजियारा

बाल मुकुन्द ओझा

कोरोना संक्रमण विकलांगों के जीवन पर कहर बनकर टूटा है। कोरोना महामारी के दौरान विभिन्न प्रदेशों में लॉकडाउन लगाने से दिव्यांगों के लिए आर्थिक समस्या और परेशानी बढ़ गयी है। समाज का यह महत्वपूर्ण अंग इस दौरान रोजी रोटी के लिए तरस गया। पढ़ने वाले बच्चों का स्कूल छुट गया, कमाने वाले विकलांग बेरोजगार हो गए। विकलांगों का बड़ा तबका आज भी सड़क और चौराहों पर भीख मांगकर अपना पेट भरता है। लोक डाउन के दौरान ये लोग न जाने कितने दिन भूखे सोये है। जाहिर है एक बड़ी आबादी संक्रमण के खतरे और लॉकडाउन की परेशानियों से आज भी लगातार जूझ रही है। आजादी के सात दशक बाद भी विकलांग समुदाय का आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा होना हमारे लिए शर्मनाक है। कोरोना जैसी महामारी ने इस तबके पर दोहरी मार की है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के 100 करोड़ लोग विकलांग की श्रेणी में आते हैं। यह दुनिया की सम्पूर्ण जनसंख्या का 9 प्रतिशत है। भारतीय सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा जुलाई, 2018 में कराये गए एक सर्वे के मुताबिक भारत में लगभग 2.2 करोड़ लोग विकलांग हैं। इनमें से करीब 70 फीसदी आबादी गांवों में रहती है। सरकार और समाज की उपेक्षा और प्रताड़ना के शिकार विकलांग सम्मान के साथ अपना जीवन यापन करना चाहते है मगर अत्यावश्यक जीवनोपयोगी सुविधाओं के अभाव ने इनका जीवन उजाड़ कर रख दिया है। हालाँकि सरकार ने विकलांगों के लिए पेंशन, शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था की है जो नाकाफी है। सच तो यह है विकलांगता या अपंगता एक ऐसी अवस्था होती है जिसमें मनुष्य जीते हुए भी मरता रहता है। सरकार ने विकलांग व्यक्ति अधिनियम में व्यापक परिवर्तन भी किए है ताकि इसे और अधिक व्यापक और अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुरूप बनाया जा सके। सरकार विकलांग व्यक्तियों को सहायक उपकरण, छात्रवृत्तियों, पुरस्कार और आर्थिक सहायता और शासकीय नौकरियों में आरक्षण की सुविधा प्रदान कर रही है वहीं निजी क्षेत्रों में विकलांग लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने हेतु उन्हें अवसर उपलब्ध कराने वाले नियोक्ताओं को प्रोत्साहित करने जैसी अनेक योजनाओं के माध्यम से सरकार विकलांग कल्याण के कामों में लगी हुई है।
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने विकलांग को दिव्यांग का सम्बोधन देकर निश्चय ही उनकी हौसला अफजाई की है। मगर केवल हौसला अफजाई काफी नहीं है। सरकार को अपने स्तर पर इस वर्ग को हर सुविधा सुलभ करनी चाहिए। चाहे शिक्षा की हो या रोजगार की। दुनिया में आज हजारों- लाखों व्यक्ति विकलांगता का शिकार है। विकलांगता अभिशाप नहीं है क्योंकि शारीरिक अभावों को यदि प्रेरणा बना लिया जाये तो विकलांगता व्यक्तित्व विकास में सहायक हो जाती है। यदि सकारात्मक रहा जाये तो अभाव भी विशेषता बन जाते हैं।
हमारा दायित्व हैं कि हम विकलांगो की शारीरिक स्थिति को नजर अन्दाज करते हुए उनके आत्मविश्वास एवं मनोबल को बढ़ाये और उनकी कार्य क्षमताओं को देखते हुए उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोडने का प्रसास करें। भारत का संविधान अपने सभी नागरिकों के लिए समानता, स्वतंत्रता, न्याय व गरिमा सुनिश्चित करता है और स्पष्ट रूप से यह विकलांग व्यक्तियों समेत एक संयुक्त समाज बनाने पर जोर डालता है। हाल के वर्षों में विकलांगों के प्रति समाज का नजरिया तेजी से बदला है। यह माना जाता है कि यदि विकलांग व्यक्तियों को समान अवसर तथा प्रभावी पुनर्वास की सुविधा मिले तो वे बेहतर गुणवत्तापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते हैं।
समाज में आज भी विकलांगों के प्रति सोच में कोई खास परिवर्तन नहीं ला पाया है। अधिकतर लोगों के मन में विकलांगों के प्रति तिरस्कार या दया भाव ही रहता है। यह दोनों भाव विकलांगों के स्वाभिमान पर चोट करते हैं। दिव्यांग कह भर देने से इनके जीवन में कोई बदलाव नहीं आएगा दिव्यांग लोगों के प्रति अपनी सोच और मानसिकता को बदलने का समय आ गया है। विकलांगों को समाज की मुख्यधारा में तभी शामिल किया जा सकता है जब समाज इन्हें अपना हिस्सा समझे, इसके लिए एक व्यापक जागरूकता अभियान की जरूरत है। विकलांगों को शिक्षा से जोड़ना जरूरी है। इस वर्ग के लिए, खासतौर पर, मूक-बधिरों के लिए विशेष स्कूलों का अभाव है जिसकी वजह से अधिकांश विकलांग ठीक से पढ़-लिखकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन पाते। हमें दिव्यांगों के जीवन में मुस्कराहट लाने के लिए अपना नजरिया बदलना होगा तभी हम अपनी जिम्मेदारी का सही निर्वहन कर सकेंगे।

 (लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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