पर्यावरण और पारिस्थितिकी सुरक्षा

5 जून - विश्व पर्यावरण दिवस

बाल मुकुन्द ओझा

देश और दुनिया 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मना रही है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरुकता फैलाना है। पृथ्वी पर हमारे चारो ओर पाए जाने वाला जल, वायु, भूमि, पेड़, पौधे व जीव जंतुओं का समूह ही पर्यावरण कहलाता है। विश्व पर्यावरण दिवस 2021 की थीम है पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली। पारिस्थितिक तंत्र की बहाली का अर्थ है क्षतिग्रस्त या नष्ट हो चुके पारिस्थितिक तंत्र को फिर से उसकी रिकवरी में सहायता करना। इसका मकसद पेड़-पौधे लगाना, बागों को तैयार करना, उनको संरक्षित करना और नदियों की सफाई करना आदि कार्यों को अमलीजामा पहनाना यानि पृथ्वी को एक बार फिर से अच्छी अवस्था में लाना। पर्यावरण में विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु, पौधों एवं मनुष्यों के मध्य संबंध को ही पारिस्थितिक संतुलन कहते हैं।
यह दिवस आत्म चिंतन का है। हमने पर्यावरण को सुरक्षित रखा है या हानि पहुंचाई है। इस समय देश और दुनिया कोरोना की दूसरी लहर और लोक डाउन की शिकार है। कोरोना महामारी ने मानव जीवन को त्रस्त कर रखा है मगर पर्यावरण को खिलने का अवसर दिया है। पहली लहर के दौरान जो काम बीते 50 वर्षों में नहीं हुआ वह चंद दिनों में हो गया। भारत में पिछले पांच दशकों में पहली बार सीओटू उत्सर्जन घटा है। कोरोना महामारी ने लाखों लोगों की जीवन लीला जरूर समाप्त कर दी मगर कुदरत को खिलखिला दिया। लोग सुबह-शाम की हवा में एक नयी ताजगी महसूस करने लगेैं। लॉकडाउन पर्यावरण के लिए निश्चय ही वरदान बनकर आया। मगर पहली लहर के बाद लोक डाउन खुलते ही हमने पर्यावरण को संरक्षित नहीं किया फलस्वरूप एक बार फिर पर्यावरण को क्षति पहुंचनी शुरू हो गयी।
प्रकृति व पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। प्राकृतिक संपदाओं के महत्व को समझना, उनका किफायती उपयोग करना, उनके संरक्षण को प्राथमिकता देना हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। जल, जंगल और जमीन प्रकृति के तीन प्रमुख तत्व हैं जिनके बगैर हमारी प्रकृति अधूरी है। प्रकृति के इन तीनों तत्वों का इस कदर दोहन किया जा रहा है कि इसका सन्तुलन डगमगाने लगा है। प्रकृति के साथ हम बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ कर रहे हैं, यह उसी का नतीजा है कि पिछले कुछ समय से भयानक तूफानों, बाढ़, सूखा, भूकम्प जैसी आपदाओं का सिलसिला तेजी से बढ़ा है। हम प्रकृति की चिंता नहीं करते और यही वजह है कि प्रकृति ने भी अब हमारी चिंता छोड़ दी है। हमनें बिना सोचे समझे संसाधनों का दोहन किया है। यही वजह है कि अब पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया है और बाढ़, सूखा, सुनामी जैसी आपदाएं आ रही हैं। बरसों से पर्यावरण को हम इंसानों ने बहुत नुकसान पहुंचाया है। प्रकृति से साथ इंसान का लगातार खिलवाड़ एक भयानक विनाश को आमंत्रण दे रहा है, जहां किसी को बचने की जगह नहीं मिलेगी।
प्राचीन काल में हमारा पर्यावरण बहुत साफ और शुध्द था। उस समय मानव और प्रकृति का अद्भुत सम्बन्ध था मगर जैसे जैसे मनुष्य ने प्रगति और विकासः के मार्ग पर अपने पैर रखे वैसे वैसे उसने पर्यावरण का साथ छोड़ दिया और पर्यावरण को प्रदूषित होने दिया। आबादी के विस्फोट ने आग में घी का काम किया और पर्यावरण तेजी से बिगड़ता चला गया। इस कारण हमारा सांस लेना भी मुश्किल हो गया। आज पृथ्वी वायु जल धवनि सभी प्रदूषित हो रहे है और मानव जीवन संकट में फँस गया है। विज्ञानं की तरक्की पेड़ों की अंधाधुंध कटाई शोर आदि सभी ने मिलकर पर्यावरण को भारी हानि पहुंचाई है। आज हर वस्तु प्रदूषित हो रही है। विश्व ने जैसे-जैसे विकास और प्रगति हासिल की है वैसे-वैसे पर्यावरण असंतुलित होता गया है। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, कल-कारखाने, उससे निकलते धुंए, वाहनों से निकलने वाले धुएं, वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, नदी और तालाबों का प्रदूषित होना आदि घटनाएं पर्यावरण के साथ खिलवाड़ है।
पर्यावरण और अकाल का भी चोली-दामन का साथ है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, वायु और जल प्रदूषण, से हमने अकाल को न्यौता दिया है। इन सब कारणों से हमारी खेती योग्य 18 लाख हैक्टेयर भूमि क्षेत्र बंजर और बेकार होकर रह गया है। देश में हर साल 15 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में वन नष्ट हो रहे हैं। मानव जीवन के लिये पर्यावरण का अनुकूल और संतुलित होना बहुत जरूरी है। देश के प्राकृतिक संसाधनों, जैसे-झील और नदियां, इसकी जैव-विविधता, वन्य और जीवन, जानवरों के संरक्षण को सुनिश्चित कर हम पर्यावरण को सुरक्षित रख सकते है। यह प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने आस-पड़ौस के पर्यावरण को साफ सुथरा रखकर पर्यावरण को संरक्षित करे तभी हमारे सुखमय जीवन को भी संरक्षित रखा जा सकता है।

 (लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं) 

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