सर्वे भवन्तु सुखीन सर्वे भवन्तु निरामया

मंगल व्यास भारती

सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े। परम पिता परमेश्वर से यही प्रार्थना है कि वह वैभव, ऐश्वर्य, उन्नति, प्रगति, आदर्श, स्वास्थ्य, प्रसिद्धि और समृद्धि के साथ मानव मात्र को जीवन पथ पर गतिमान रखे। कोरोना संकट में इंसान लाचार हो कर मानसिक अवसाद झेल रहा है और चिड़चिड़ा सा गया है। अपने ही व्यवहार और ख्वाहिशों के जाल में इतना उलझा गया कि ये भूल गया कि इसके ऊपर कोई शक्ति जो पल पल खबर रखती हैं। पर इसे कहा चौन था अपनी मस्ती की गलियों में कभी नहीं जाना पहचाना कि उस दिव्य शक्ति की यह प्रकृति कभी अपने से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करती। समझो उसने इंसान को बनाने से पूर्व धरती पर अपने सृजन के सौंदर्य को बिना मांगे ही दें दिया लेकिन हमने नहीं प्रकृति के सौंदर्य को हर तरह से उजाड़ दिया बिखरा दिया। तभी शायद उस दिव्य शक्ति का क्रोध एक महामारी का रूप धारण कर हम इंसानों पर कहर बन छा रहा है। और दशों दिशाओं में कोहराम उठा है, और कोई बचने का मार्ग नजर नहीं आती हैं। गल्ती तो हम इंसान शायद करते है वो ये कि सुबह से शाम रात बीत चली जाती है,एक बार भी उस दिव्य शक्ति को नमन नहीं करते सिर्फ घर घरस्थीऔर भोग विलास की चिंता में ही उम्र गुजारते चले जाते हैं। कभी मन स्थिति में ये नहीं सोचते कि जल जो जीवन है उसका प्रयोग किस तरह करना कल ये जल नहीं होगा तब क्या जीवित रह पायेंगे और पेड़ पौधों की सुरक्षा नहीं कि और उन्हें काटा वायुमंडल को प्रदूषित किया कभी न सोचा कि कभी यही पेड़ पौधे हमें आक्सीजन देते हैं। इन्हीं की कृपा से जीवन चले धरती पर प्रकृति कभी उधार नहीं छोड़ती जो हम धरती की प्रकृति को दिया वही शायद प्रकृति हमें वापस लौटा देती हैं।
पर निराश होने की जरुरत नही जो दिव्य शक्ति विराज मान है उसे आओं हम मिलजुल कर उसकी प्रार्थना अर्चना करे जिससे वह जरूर किसी न किसी रूप में आकर मदद करेगा। सनातन संस्कृति के अनुसार अपने भारत का धर्म सिखाता है कि सर्वे भवन्तु सुखीन सर्वे भवन्तु निरामयाः। विश्व को यह संदेश दिया इंसानियत को अपना परिवार मानने वाला भारत सदा सर्वदा अपने यहां हवन यज्ञ आदि पौराणिक और वैदिक रीति से वातावरण की शुध्दि करता रहा।
मनुष्य मां धरती को सुबह प्रणाम करता था पर आज इस और ध्यान ही नहीं जाता हैं। तुलसी का सेवन करने से विटामिन सी कि पूर्ति होती थी, धरती को प्रणाम कर आभार चुकाएं उसको स्वच्छ रखे और पेड़ पौधों का संरक्षण कर ये अब दिनचर्या में शामिल करे जिससे जीवन बदल सके। इस कोरोना काल के बाद प्रत्येक व्यक्ति की दिनचर्या निश्चित रूप से बदली है, इस भीषण महामारी में जिन्होंने अपनों को खो कर देखा है अपनों को अपनों से दूर जाते देखा है जिसने इस बात को समझा कि धरती पर जीवन को सुरक्षित रखना है।अगर अपनों से मिलजुल कर रहे और अपनी दिनचर्या को बदले धरती पर पेड़ पौधे लगाये शुद्ध वायु ग्रहण करें तो रोगों से दूर रहेंगे और हमारा जीवन बचा रहेगा।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

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