चीन-भारत सीमा विवाद और दलाई लामा

आर.के. सिन्हा

सन 1962 से ही भारत के लाखों वर्ग किलोमीटर के बहुत बड़े जमीन के हिस्से को कब्जा कर बैठे धूर्त चीन ने भारत से लगती लाइन ऑफ ऐक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर फिर अतिक्रमण करने की चेष्टा की है। भारत ने तत्काल ही बिना समय गंवाये उसकी हरकतों का मुंहतोड़ जवाब भी दिया है। इसलिए अब चीन सीमा विवाद को बातचीत से सुलझाने को तैयार भी हो गया है। चीन की हरकतों के बाद भारतीय सेना और वायुसेना  पूरी तरह से तैयार हालत में हैं। चीन से लगती सीमा पर भारतीय सेना मुस्तैदी से तैनात और तैयार है। दोनों देशों के बीच 4048 किलोमीटर में फैली लम्बी सीमा हैं। इसमें वेस्टर्न सेक्टर (लद्दाख),  मिडिल सेक्टर (उत्तराखंड, हिमाचल), और  ईस्टर्न सेक्टर (सिक्किम, अरुणाचल) शामिल हैं। अब भारत चीन से रणभूमि और कूटनीति दोनों स्तरों पर दो-दो हाथ करने के लिए तैयार है।

जरा चुप्पी देखो दलाई लामा की

पर आश्चर्य तब होता है कि चीन के आक्रमक रवैये पर तिब्बत के आध्यात्मिक नेता और तिब्बत के निष्कासित शासक दलाई लामा ने चुप्पी साधी हुई है। वे एक शब्द भी नहीं बोल रहे है । वैसे तो दलाई लामा हमेशा शांति और अमन पर प्रवचन देते ही रहते हैं। क्या उन्हें विश्व बिरादरी के बीच भारत का पक्ष नहीं रखना चाहिए? क्या उन्हें इस समय दुनिया को यह बताना नहीं चाहिए कि शांतिप्रिय देश भारत के साथ अकारण पंगा ले रहा है चीन? उन्हें विश्व को बताना चाहिए कि चीन किस घटियापन पर उतरा हुआ है। पर वो तो लगता है मानों अज्ञातवास में चले गए हैं। उनका कहीं कुछ पता नहीं चल रहा। भारत ने दलाई लामा को 1959 में नेहरु की सरकार ने उनके हजारों अनुयायियों के साथ शरण देकर एक तरह से चीन को नाराज कर दिया था। तबसे दलाई लामा को हम हर प्रकार की मदद करते चले आ रहे हैं । दलाई लामा को इस मौके पर चीन की विस्तारवादी नीतियों को दुनिया के सामने रखना चाहिए था। उनका इस मौके पर चुप रहना गलत है।  शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित दलाई लामा को सारी दुनिया सम्मान की नजरों से देखती है। उनका सारा भारत भी आदर करता है। पर उन्होंने इस बार भारत को निराश ही किया है।

तिब्बती कब घेरेंगे चीनी एंबेसी को

1962 के भारत-चीन युद्ध के पूर्व तक तिब्बत की राजधानी लाह्सा में भारत का दूतावास हुआ करता था । युद्ध के दौरान उस दूतावास को हमने अपनी ओर से बंद कर चीन को पूरे तिब्बत पर कब्ज़ा करने में एकतरह से मदद की। जैसा कि सारी दुनिया को पता है कि दलाई लामा के साथ हजारों तिब्बती भी भारत आए थे। अब उनकी तीसरी-चौथी पीढ़ियां भी जवान हो गई हैं। ये दिल्ली में भी बड़ी संख्या में रहते हैं। इसके अतिरिक्त देहरादून, धर्मशाला, सिक्किम में भी ये फैले हुये हैं । ये तिब्बती नौजवान दिल्ली स्थित चीन एंबेसी की  ऊंची- ऊंची दिवारों को लांघ कर अंदर घुसने की साल में कम से कम एक बार कोशिश भी तो करते ही हैं। जब चीन 1 अक्टूबर को अपना राष्ट्रीय दिवस मनाता है, तब तिब्बती युवक-युवतियां चीनी एंबेसी के बाहर विरोध प्रदर्शन अवश्य करते हैं। दिल्ली पुलिस के कड़े बंदोबस्त के बाद भी कुछ नौजवान चीनी एंबेसी की दीवारों पर चढ़ने की कोशिश तो करते ही हैं। ये चीन की सरकार से तिब्बत को खाली करने की मांग कर रहे होते हैं। चीन ने 10 मार्च 1959  को तिब्बत पर हमला कर दिया था। जिसके बाद हजारों तिब्बती दलाई लामा के नेतृत्व में भारत में शरणार्थी होकर आ गए थे।  क्या इन तिब्बतियों को अब चीनी हरकतों के विरोध में चीनी एंबेसी पर प्रदर्शन नहीं करना चाहिए? अब तो इन्हें भारत की नागरिकता भी मिल चुकी है। पर न तो दलाई लामा और न ही कोई तिब्बती अब चीनी एँबेसी को घेर रहा ।

भारत सरकार ने शरणार्थी तिब्बतियों के भारत में पुनर्वास के लिए हर तरह की पहल की। हिमाचल प्रदेश, उतराखंड, दिल्ली और देश के अनेक राज्यों में इनके रहने और कामकाज करने के लिए योजनाएं बनाई और उन्हें लागू किया। अगर बात राजधानी की करें तो इन तिब्बतियों के लिए मजनू का टीला में एक कॉलोनी भी बनाई गई। वहां पर हजारों तिब्बती रहते हैं। इसी तरह से दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस के जनपथ में एक तिब्बती मार्किट बनाई। तिब्बती मार्किट 1967 में बसाई गई ताकि तिब्बती अपना कोई काम-धंधा कर स्वावलंबी हो लें । इस मार्केट में तिब्बती मूर्तियों,  शालों,  पेंटिंग्स और  कलाकृतियों को बेचकर ये ठीक-ठाक कमाते हैं। क्या दलाई लामा को अपना मार्गदर्शक मानने वालों को चीन के खिलाफ किसी स्तर पर विरोध नहीं जताना चाहिए?

चीन की चालू हरकतों के आलोक में बात सिर्फ दलाई लामा और उनके समर्थकों  तक ही सीमित नहीं रखी जा सकती। बात ब्रिक्स की भूमिका की भी करनी होगी। ब्रिक्स में भारत, चीन, ब्राजील,  रूस और दक्षिण अफ्रीका हैं। दुनिया की 40 फीसद से अधिक आबादी ब्रिक्स देशों में रहती है। कहने  को तो ब्रिक्स देश वित्त,  व्यापार,  स्वास्थ्य,  विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी,  शिक्षा,  कृषि,  संचार, श्रम आदि  मसलों पर परस्पर सहयोग का वादा करते  हैं।  पर जमीनी हकीकत सबको पता चल चुकी है। अब ब्रिक्स समूह का एक देश अपने साथी देश पर दुश्मनों जैसा व्यवहार कर रहा है, तो शेष देश चुप क्यों है? सबसे ज्यादा हैरानी होती है रूस की चुप्पी पर। जिस रूस से भारत के पुराने और एतिहासिक संबंध है वह इस समय भी एक शब्द भी बोलने को तैयार नहीं है।  ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की भी बोलती बंद है। क्यों? भारत को इन देशों से सवाल पूछना चाहिए।

कहना न होगा कि रूस,ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका से तो बेहतर तो आज के दिन आस्ट्रेलिया साबित हो रहा है। आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्‍कॉट मॉरिसन ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ विगत दिनों चीन को सख्‍त संदेश दिया। दोनों देशों ने चीन से अन्य  देशों की संप्रभुता का पालन करने के लिए कहा। हिंद महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को खत्म करने के लिए  भारत और ऑस्‍ट्रेलिया ने एक-दूसरे के सैन्‍य अड्डों के इस्‍तेमाल का एक  समझौता भी किया है। दुनिया को कोरोना जैसी वैश्विक महामारी देने के कारण चीन से बेहद नाराज है आस्ट्रेलिया। दोनों ही देशों के बीच इन दिनों तलवारें खीचीं हुई हैं। स्थिति तो यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की बैठक के दौरान आस्ट्रेलिया ने यूरोपीय यूनियन के प्रस्ताव का समर्थन करके चीन को बहुत नाराज कर लिया। अब चीन ऑस्ट्रेलिया को बुरा-भला कह रहा है। पर ऑस्ट्रेलिया चीन के सामने नतमस्तक होने को तैयार नहीं है। काश, ऑस्ट्रेलिया से ही  ब्रिक्स के बाकी सदस्य देश कुछ सीख ले लेते।

अब लग तो यह रहा है कि भारत को दलाई लामा और ब्रिक्स को लेकर अपनी नीति पर फिर से विचार करना होगा। इस बीच, भारत देख रहा है कि चीन किसी नए इलाके पर अपना हक जताने की कोशिश न करे। उधर,लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश तक की दुर्गम सीमाओं पर भारतीय सैनिक तैयार हैं। भारत इस बार मौका मिलते ही चीन की गर्दन दबाने के लिए तैयार है।चीन को भी पता है कि अब भारत नेहरु का भारत नहीं रहा जो 83,000 किलोमीटर अक्साईचीन को जब चीन ने भारत से हथिया लिया तब संसद में यह कहते हुये चीन का बचाव किया था कि अक्साईचीन बंजर भूमि है वहां कुछ नहीं उगता। तब एक गंजे सांसद ने अपने सिर को सहलाते हुये और नेहरु के गंजे सिर की ओर इशारा करते हुये कहा था कि फिर तो सभी गंजों को सिर कटवा लेना चाहिए।लेकिन, अब 2020 में मोदी के भारत में यह नौवत नहीं आयेगी ।

 (लेखक वरिष्ठ संपादकस्तभकार और पूर्व सांसद हैं )

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