दावानल की ताप से धधके जंगल

बाल मुकुंद ओझा

ग्रीष्म ऋतु के आगमन के साथ ही जंगलों में आग लगने की घटना में भी तेजी से इजाफा होने लगा है। उत्तराखंड, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, हिमाचल सहित अनेक राज्यों में इन दिनों भीषण अग्निकांड हुए जिनमें करोड़ों अरबों की वन संपदा जंगलों में लगी आग से खाक हो गई है। पेड़ पौधों के साथ जंगली जानवर मौत के शिकार हुए वहां भूमि भी बंजर हो गयी। इन दिनों उत्तराखंड जंगलों में लगी आग से धधक रहा है। ऐसा पहली बार नहीं है जब प्रदेश के जंगल आग से खाक हो रहे हैं। हर बार गर्मी के दिनों में उत्तराखंड के जंगलों में अक्सर आग लग जाती है, और जिससे वनसंपदा और जानमाल का नुकसान होता है। उत्तराखंड में 12 हजार से अधिक वनकर्मी जंगलों की आग बुझाने में जुटे हुए हैं। अबतक 1400 हेक्टेयर से अधिक जंगल इस सीजन में आग की भेंट चढ़ चुका है। इस आपदा को देखते हुए केंद्र सरकार ने भारतीय वायुसेना के दो डप् 17 हेलीकॉप्टर को आग बुझाने के लिए उत्तराखंड भेजा है। बताया जा रहा है कि जंगलों में लगी आग बुझाने के लिए उत्तराखंड सरकार ने यह ऐलान किया है कि प्रत्येक डिवीजन की जो भी टीम सबसे पहले आग बुझाएगी। उसे एक लाख का इनाम दिया जाएगा।
जंगल में आग लगने के कई कारण होते हैं। इनमें ईंधन, ऑक्सीजन और गर्मी मुख्य है। अगर गर्मियों का मौसम है, तो सूखा पड़ने पर ट्रेन के पहिए से निकली एक चिंगारी भी आग लगा सकती है. इसके अलावा कभी-कभी आग प्राकृतिक रूप से भी लग जाती है. ये आग ज्यादा गर्मी की वजह से या फिर बिजली कड़कने से लगती है। जंगलों में आग लगने की ज्यादातर घटनाएं इंसानों के कारण होती हैं, जैसे आगजनी, कैम्पफायर, बिना बुझी सिगरेट फेंकना, जलता हुआ कचरा छोड़ना, माचिस या ज्वलनशील चीजों से खेलना आदि। जंगलों में आग लगने के मुख्य कारण बारिश का कम होना, सूखे की स्थिति, गर्म हवा, ज्यादा तापमान भी हो सकते हैं। इन सभी कारणों से जंगलों में आग लग सकती है।
दरअसल जंगलों की आग से न केवल प्रकृति झुलसती है, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारे व्यवहार पर भी सवाल खड़ा होता है। गर्मियों के मौसम में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के जंगलों में आग लगने की घटनाएं अक्सर प्रकाश में आती रहती हैं। जंगलों में लगी आग से जान-माल के साथ-साथ पर्यावरण को भारी नुकसान होता है। पेड़-पौधों के साथ-साथ जीव-जन्तुओं की विभिन्न प्रजातियां जलकर राख हो जाती हैं। जंगलों में विभिन्न पेड़-पौधे और जीव-जन्तु मिलकर समृद्ध जैवविविधता की रचना करते हैं। पहाड़ों की यह समृद्ध जैवविविधता ही मैदानों के मौसम पर अपना प्रभाव डालती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ऐसी घटनाओं के इतिहास को देखते हुए भी कोई ठोस योजना नहीं बनाई जाती है। एक अध्ययन के अनुसार, पूर्व एशिया, दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और समुद्र तटीय क्षेत्रों में जंगलों में आग लगने की समस्या बढ़ती जा रही हैं।
जंगलों में यदि आग विकराल रूप धारण कर लेती है, तो उसे बुझाना आसान नहीं होता है। कई बार जंगल की आग के प्रति स्थानीय लोग भी उदासीन रहते हैं। दरअसल हमारे देश में ऐसी आग बुझाने की न तो कोई उन्नत तकनीक है और न ही कोई स्पष्ट कार्ययोजना। विदेशों में जंगल की आग बुझाने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य होता है। पिछले दिनों नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जंगलों की आग पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि पर्यावरण मंत्रालय और अन्य प्राधिकरण वन क्षेत्र में आग लगने की घटना को हल्के में लेते हैं। जब भी ऐसी घटनाएं घटती हैं, तो किसी ठोस नीति की आवश्यकता महसूस की जाती है। लेकिन बाद में सब कुछ भुला दिया जाता है।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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