बंगाल चुनाव में हिंदी भाषियों की निर्णायक भूमिका

बाल मुकुन्द ओझा

पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव होने जा रहे है। इन चुनावों में हिंदी भाषी मतदाताओं की भी प्रभावी भूमिका है। बंगाल की आबादी करीब 11 करोड़ के आसपास है और इसमें करीब डेढ़ करोड़ हिंदी भाषी हैं। जिनमें से करीब 72 लाख वोटर हैं। इस चुनाव में हर पार्टी हिंदी भाषियों को अपनी तरफ खींचने का प्रयास कर रही है। राजधानी कोलकाता के आज ज्यादातर बड़े उद्योगपति नॉन बंगाली ही हैं। ये राजस्थान-बिहार जैसे राज्यों से यहां आकर बसे हैं। राजधानी कोलकाता का ‘बड़ा बाजार’ का पूरा कंट्रोल इन्हीं हिंदी भाषी उद्योगपतियों के हाथ में रहता है। 2019 के चुनाव में हिंदी भाषी लोगों ने बड़े पैमाने पर बीजेपी का साथ दिया था, जिससे उसे यहां की कई सीटों पर जीत भी मिली थी।
पश्चिम बंगाल के चुनाव में हिंदी भाषा-भाषी फैक्टर अहम भूमिका निभाते हैं। लगभग 80 विधानसभा क्षेत्रों में हिंदी भाषियों की बड़ी जनसंख्या के मद्देनजर राजनीतिक दल इन वोटरों को लुभाने के लिए जी-जान से जुटे हुए हैं। पश्चिम बंगाल के एक दर्जन से अधिक जिलों में हिंदी भाषी वोटरों की बड़ी संख्या है, जो कि यहां चुनाव परिणामों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इन जिलों में उत्तर 24 परगना, सिलिगुड़ी, आसनसोल, दुर्गापुर समेत कई महत्वपूर्ण जिले हैं। प बंगाल में बहुत से ऐसे क्षेत्र है जहां बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के लोग है जो हार-जीत में अहम भूमिका निभाते हैं। इनमेें आसनसोल, बैरकपुर, श्रीरामपुर, उत्तर कोलकाता, हावड़ा, दमदम, कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्आर, दुर्गापुर-बर्दवान, जादवपुुर व दार्जिलिंग आदि प्रमुख क्षेत्र हैं। एक अनुमान के अनुसार हिंदी बहुल विधानसभा क्षेत्र में लगभग 35 प्रतिशत हिंदी भाषा-भाषी मतदाता हैं। चुनावी रणनीतिकार मानते हैं किबंगाल में कम से कम 80 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां के हिंदीभाषी वोटर किसी भी पार्टी का खेल बनाने और बिगाड़ने का माद्दा रखते हैं।
बंगाल और हिंदी का रिश्ता सदियों पुराना तो है ही, बहुत ही अटूट और नाजुक है। यहाँ हिंदी और हिंदी पत्रकारिता का जुड़ाव बहुत ही अद्भुत है और हिंदी के विकास में भी हिंदी पत्रकारिता का योगदान अनमोल है। हिंदी का पहला दैनिक उदंत मार्तंड 30 मई, 1826 को जुगल किशोर शुक्ल ने कोलकाता से ही शुरू किया था। अनेक पत्रिकाएं भी यहाँ से प्रकाशित हुई। इसलिए कहा जा सकता है हिंदी यहाँ के रग रग में रची और बसी है। प बंगाल में हिंदी भाषा-भाषियों की बड़ी जनसंख्या है, लेकिन जनसंख्या के अनुपात में उन्हें प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है हिंदी भाषी लोग जिनमें मारवाड़ियों की संख्या अधिक है यहाँ समृद्धशाली और उधमी भी है। इनके उधोग धंधों में हिंदी भाषी राज्यों के हजारों लोगों को रोजगार मिला है। बंगाल में लाखों राजस्थानी निवास करते है मगर सियासत में उनकी भूमिका नगण्य हो गयी है। कभी वहां मारवाड़ी नेताओं की तूती बोलती थी। बंगाल के व्यापार और उधम में मारवाड़ियों दबदबा था और आज भी है। बिड़ला, कोठरी, सरावगी, रुईका, पोद्दार, बजाज, सेकसरिया और न जाने कितने उधोगपतियों का डंका बंगाल में बजता था। बंगाल की राजनीति में राजस्थानियों का भी बोलबाला रहा है। राम कृष्ण सरावगी से लेकर आनंदी लाल पोद्दार और विजय सिंह नाहर सरीखे सियासतदानों ने बंगाल की राजनीति में प्रभावी भूमिका अदा की है। एक समय था जब राज्य विधानसभा में 16 हिन्दी भाषी विधायक हुआ करते थे। ईश्वरदास जालान राज्य विधानसभा के अध्यक्ष बने थे। विजय सिंह नाहर को उपमुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल हुआ था। रामकृष्ण सरावगी मंत्री पद पर सुशोभित हुए थे। कांग्रेस सहित भाजपा और वामपंथी दलों में राजस्थानी नेताओं की सक्रीय भागीदारी रही है। 1977 तक हिंदी भाषियों ने सियासत पर अपनी मजबूत पकड़ रखी मगर धीरे धीरे उनका असर और रूचि समाप्त होती गई। यहां की कुल आबादी में से 1.5 करोड़ हिंदीभाषी हैं कुल विधानसभा सीटों में 70-80 सीट हैं जहां ये हिंदी भाषी निर्णायक भूमिका में हैं। कोलकाता और बड़े शहरों में राजस्थान के मारवाड़ी बड़ी संख्या में हैं। ये व्यापार में हैं, इसलिए काफी समृद्ध भी हैं। हिंदी भाषियों ने ब्रिटिश राज की शुरुआत से ही रोजगार की तलाश में बंगाल जाना शुरू किया और वहीं बस गए। लेकिन इनका संपर्क अपने मूल राज्य से खत्म नहीं हुआ। इसलिए जब इनके मूल निवास वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार वगैरह में बीजेपी का दबदबा बढ़ा तो इनका लगाव भी बीजेपी की तरफ बढ़ा। मारवाड़ियों की बात करें तो राजस्थान के लोग रोजगार की तलाश में बंगाल आये। उस दौरान धोती लोटा इनकी पहचान थी। धीरे धीरे अपनी कर्मठता के बूते उन्होंने यहाँ उधोग धंधे स्थापित किये। राजनीति में भी अपनी पहचान बनायी। कांग्रेस उस दौरान उनका प्रिय राजनैतिक दल था। बाद में अन्य दलों की तरफ भी उनका झुकाव देखा गया। साम्यवादी शासन के दौरान मारवाड़ी नेताओं का वर्चस्व कम होता गया। विधानसभा में भी उनका प्रतिनिधित्व कम हुआ और वे 16 से जीरो पर आ गए। अब एक बार फिर विधान सभा के चुनाव होने जा रहे है। विभिन्न राजनैतिक दलों ने मारवाड़ी वोटों को लुभाने के लिए कई मारवाड़ियों को अपनी टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा है। राजस्थान से अनेक नेता और विधायक अपनी अपनी पार्टियों के चुनाव प्रचार के लिए बंगाल जा रहे है और यह तो भविष्य ही बताएगा की मारवाड़ी इन चुनावों में होनी खोई प्रतिष्ठा हासिल करेंगे या नहीं। बहरहाल वे अपना भाग्य इन चुनावों में जोर शोर से आजमा रहे है।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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