चीन के आगोश में जाने पर ही नेपाल की आखें खुलेंगी

विष्णुगुप्त 

चीन का मोहरा नेपाल किस तरह बना हुआ है, चीन के आगे नेपाल किस तरह से झुकने के लिए तैयार रहता है, चीन के खिलाफ बोलने से नेपाल किस तरह डरता है और भयभीत रहता है, उसका उदाहरण मुझे दस साल पूर्व काठमांडू में देखने को मिला था। भारत-नेपाल मैंत्री पर आधारित एक सेमिनार में हिस्सा लेने में काठमांडू गया था। सेमिनार में भारत को एक खूंखांर, सामंती और उपनिवेशिक मानसिकता का देश बताने की कोई कोशिश नहीं छोड़ी गयी थी, नेपाली प्रतिनिधि भारत के खिलाफ अपमानजनक और लूटेरी मानसिकता जैसे अस्वीकार आरोप लगा रहे हैं, सेमिनार में भारत के कम्युनिस्ट और तथाकथित उदारवादी भी नेपाली प्रतिनिधियों की हां में हा मिला रहे थे। जबकि नेपाल में भारत की सहायता और नेपाल के नदियों से बिहार और उत्तर प्रदेश आदि में आने वाली बाढ़ की तबाही का कोई चर्चा तक नहीं हो रही थी। ऐसे में भारतीय प्रतिनिधि मिस्टर सहगल जो सेना के अवकाश प्राप्त अधिकारी थे ने चीन को लेकर प्रश्न दाग दिया, मिस्टर सहगल ने कहा कि जिस तरह से भारत ने नेपाल को सहयोग दिया है, जिस तरह से भारत ने नेपाल के अंदर जीवन रक्षक वस्तुओं की आपूर्ति करने की जिम्मेदारी उठा रखी है और सुविधा उपलब्ध करा रखी है उस तरह की सुविधा और जिम्मेदारी क्या चीन उठा सकता है, जिस तरह से भारत ने बिना बीजा के लाखों नेपालियों को भारत में रोजगार के साधन उपलब्ध करा रखें हैं और नेपालियों को भारत में सम्मान पूर्वक रहने और एक नागरिक की सभी सुविधाओं का उपभोग करने की छूट दे रखी है उस तरह की छूट चीन कभी दे सकता है क्या? भारत अगर इतना बड़ा ही खूंखांर, सामंती और लूटेरी मानसिकता का देश है तो फिर ऐसी संधि नेपाल चीन के साथ क्यों नहीं करता है, क्या नेपाल भारत के हितों की उपेक्षा कर चीन को खुश नहीं रख्ता है? मिस्टर सहगल और मैं खुद ने उस सेमिनार में चीन की लूटेरी मानसिकता और नेपाल में भारत विरोधी गतिविधियों और कूटनीति को चर्चा में शामिल करने की मांग कर डाली। चीन विरोधी तिब्बत शरणार्थियों पर नेपाल के अंदर मानवाधिकार का भी प्रश्न उठा दिया। पूरा सेमिनार हॉल में सन्नाटा पसर गया, नेपाल के आयोजक संस्थान ने सेमिनार के उस सत्र को बीच में स्थगित कर दिया। नेपाल को यह डर था कि अगर सेमिनार में चीन का विषय भी शामिल हो जायेगा तो फिर चीन की नाराजगी झेलनी पड़ेगी।
नेपाल की राजधानी काठमांडू या फिर अन्य कहीं भी चले जाइये, भारत के खिलाफ आग उगलते हुए नेपाल के राजनीतिक कार्यकर्ता मिल जायेंगे। पर जैसे ही आप चीन का प्रश्न छेड़ दीजिये, पाकिस्तान परस्ती का प्रश्न छेड़ दीजिये, नेपाल के अंदर चीन समर्थक माओवादियों और कम्युनिस्ट पार्टियों के क्रियाकलाप को छेड़ दीजिये वैसे ही या तो ये फिर आक्रोशित हो जायेंगे या फिर इनके मुंह पर पट्टी लग जायेगी। भारत की सहायता और नेपाल की उन्नति में भारत के योगदानों को कभी स्वीकार नहीं किया गया, भारत की सहायता को नेपाल की राजनीति तो अपना जन्म सिद्ध अधिकार जैसे ही मानते हैं, उनकी समझ यही है कि नेपाल की सहायता करना भारत की मजबूरी है। भारत कोई इच्छा से नहीं बल्कि अनिइच्छा से सहायता करता है, नेपाल के अंदर चीन और पाकिस्तान जैसे देशों को नियंत्रित करने के लिए भारत सहायता करता है। सबसे बड़ी बात यह है कि जैसे पाकिस्तान दुनिया को मुस्लिम आतंकवाद का भय-डर को दिखा कर अरबों-खरबों डॉलर वसूल करता था और अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखता था, इतना ही नहीं बल्कि अरबों-खरबों डॉलर वसूलने के बाद भी मुस्लिम आतंकवाद को न तो नियंत्रित करता था और न ही उनके प्रचार-प्रसार को रोकता था। ठीक इसी प्रकार अब नेपाल की जो सरकार होती है वह चीन और पाकिस्तान का भय दिखा कर भारत का दोहन करती हैं और भारत सरकारें भी अभी तक नेपाल की इस ब्लैकमैंलिंग के सामने समर्पण करती रही हैं। नेपाल के अंदर में पाकिस्तान की खतरनाक उपस्थिति है, पाकिस्तान नेपाल के रास्ते से ही आतंकवादियों की घुसपैठ कराता है और जाली भारतीय नोट का धंधा कराता है। जब पिछले बार नेपाल में भयानक भुकंप आया था और बहुत बडी तबाही मची थी तब भारत ही था जो अरबों डॉलर की सहायता दी थी और नरेन्द्र मोदी ने हजारों नये घर बना कर नेपाली लोगों को सौंपे थे। उस भुकम्प तबाही काल में चीन ने नेपाल की कौन सी सहायता की थी?
ठीक ऐसे समय में जब हमारा चीन के साथ सीमा विवाद हिंसक रूप से जारी है और चीन हमारी सीमा भूमि पर कब्जा कर बैठ गया है तब नेपाल का सीमा पर हिंसक रवैया अपनाने का औचित्य क्या हो सकता है? औचित्य को समझना आसान है। औचित्य सिर्फ चीन को खुश करना है, चीन के कहने पर नेपाल की यह करतूत जारी है। नेपाल ने जिन क्षेत्रों का अपना बता रहा है वह निश्चित तौर पर भारतीय क्षेत्र है। लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी भारतीय क्षेत्र के हिस्सा है। ये तीनों क्षेत्र भारत-नेपाल संधि के समय से भी पूर्व में भारत के हिस्से हैं। नेपाल की ईमानदारी होती और नेपाल चीन का मोहरा नहीं होता तो निश्चित तौर पर लिपुलेख, लिम्पियधुरा और कालापानी जैसे प्रश्न पर आक्रामक रवैया नहीं अपनाता और न ही चीन का मोहरा बनने के लिए तैयार होता बल्कि भारत के साथ सहानुभूति पूर्वक विचार-विमर्श किया होता। एका-एक अपने नक्शे में सुधार करना, अपने नक्शे में लिपुलेख, लिम्पियुधरा और कालापानी शामिल कर लेना सीधे तौर पर उकसाने जैसी कूटनीतिक करतूत है और यह करतूत भारत की संप्रभुत्ता को भी चुनौती देती है। ये तीनों क्षेत्रों तक ही नेपाल की हिंसक करतूत सीमित नहीं है बल्कि बिहार से लगी सीमा पर भी नेपाल की पुलिस और सेना आक्रामक होकर गोलियां बरसा रही हैं। नेपाल की पुलिस और सेना की गोलियों से एक भारतीय की मौत हो चुकी है जबकि दो अन्य भारतीय घायल भी हुए हैं।
वास्तव  में नेपाल के अंदर राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई मे भारतीय हित और भारत की संप्रभुत्ता लहूलुहान हो रही है। नेपाल की खासकर दो राजनीतिज्ञों के बीच वर्चस्व की लडाई चरम पर है। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी जिनके नेता हैं केपी ओली और माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी जिनके नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड हैं , के बीच वर्चस्व की लड़ाई जारी है। कभी नेपाल के अंदर राष्टवादी पार्टी नेपाल काग्रेस हुआ करती थी पर राजशाही पूरी तरह से समाप्त होने के बाद नेपाली कांग्रेस की स्थिति लगातार कमजोर होती चली गयी, इनका जनाधार भी नीचे की ओर सिखक गया। ऐसी स्थिति में नेपाली कांग्रेस पार्टी का कमजोर होना भी स्वाभाविक है। इसका लाभ नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी और नेपाल की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने उठाया है। नेपाल की माओवादी कम्युनस्टि पार्टी तो चीन की खड़ी की गयी पार्टी ही है। चीन ने नेपाल को अस्थिर करने के लिए और नेपाल को अपना मोहरा व उपनिवेश बनाने के लिए माओवाद को खड़ा किया था। माओवादियों का नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड हमेशा चीन के प्रवक्ता के तौर पर विराजमान रहे हैं। माओवादी भी नेपाल की सत्ता पर विराजमान रहे हैं। पर अभी नेपाल की सत्ता पर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का कब्जा है। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेता केपी ओली प्रधानमंत्री हैं। केपी ओली राष्टवादी बनने की कोशिश कर रहे हैं, उनकी मंशा नेपाल के अंदर राष्टवादी भावना भड़का कर माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीतिक शक्ति को कमजोर करना है। जब तक नेपाल के अंदर में माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी कमजोर नहीं होगी तब तक केपी ओली लंबे समय तक प्रधानमंत्री नहीं बने रह सकते हैं। इधर नेपाल कम्युनस्टि पार्टी और प्रधानमंत्री केपी ओली को कमजोर करने के लिए भी माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी और माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड ने भी भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने में लगे हुए हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि नेपाल ने अपनी मैत्री संधि खुद तोड डाली है। नेपाल-भारत मैत्री संधि के सिद्धांत से नेपाल कब का हट चुका है। भारत-नेपाल मैत्री संधि के तत्वों को नेपाल नहीं मानता है। जब यह प्रमाणित हो गया है कि नेपाल अब मैत्री संधि को नहीं मानता तो फिर भारत को मैत्री संधि को अपने सिर पर क्यों ढोते रहना चाहिए। भारत को भी मैत्री संधि के तत्वों से किनारा कर लेना चाहिए। जब नेपाल हमारी संप्रभुत्ता के लिए खतरा बन गया है तब भारत को भी नेपाल के अंदर अरबों-खरबों डॉलर की सहायता की जरूरत क्यों होनी चाहिए? भारत को अब दो कार्य करने की जरूरत है। पहला कार्य नेपाल से व्यापारिक संबंध तोड़ लेना चाहिए और नेपाल को आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति के लिए भारत का उपयोग करने से रोक देना चाहिए। दूसरा कार्य दोनों देशों के नागरिकों के आवागमन पर वीजा सिस्टम लागू कर देना चाहिए। नेपाल को पूरी तरह से चीन के आगोश में जाने देना चाहिए। फिर नेपाल की राजनीतिक धारा को चीन का क्रूर चेहरा सामने आयेगा, उन्हें चीन की लूटेरी मानसिकता का दर्शन होगा तथा भारत की जरूरत महसूस होगी।

 

 

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