एक साल से घर पर बैठे हैं नौनिहाल

बाल मुकुन्द ओझा

कोरोना महामारी में लगभग एक साल के इंतजार के बाद देश के कई राज्यों में स्कूल खुले। नौनिहाल स्कूलों में पहुंचे तो उनके चेहरों पर डर का भाव न होकर अपने सहपाठियों से मिलने और घरों के बाहर स्कूल के माहौल में फिर से पहुंचने का उत्साह था। मगर यह उत्साह ज्यादा देर नहीं देखा गया क्योंकि कोरोना की आशंका में स्कूल में फिर ताले लग गए। राजस्थान की बात करें तो कक्षा एक से पांच तक स्कूल खुले ही नहीं। कक्षा छ से आठ तक जो स्कूल खुले वे भी हाजिरी के आभाव में फिर बंद हो गए। नौनिहाल अभी अपने घरों पर डटे हैं और ऑनलाइन पढाई में जुटे है। ग्रामीण अंचलों की हालत तो बदतर है। वहां ऑनलाइन की सुविधा उपलब्ध नहीं है और वे खेलकूद में अपना समय व्यतीत कर रहे है। कुल मिलकर नौनिहाल एक साल से घर बैठे है। अभिभावक दिनभर बच्चों की चिंता दुबले होते जा रहे है। करें तो क्या करें ,कुछ समझ में नहीं आरहा है। घर पर बैठे बच्चे चिड़चिड़े हो रहे है। उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने ओर है और यहीं चिंता और फिक्र अभिभावकों की नींद उड़ाये हुए है।
कोरोना महामारी ने देश की शिक्षा का न केवल एक साल बर्बाद किया अपितु 1.5 लाख स्कूलों के बंद होने से प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के 24.7 करोड़ बच्चों की शिक्षा पर बहुत बुरा असर पड़ा है। यूनिसेफ के अनुसार कोरोना संक्रमण के कारण स्कूलों के बंद होने का शिक्षा पर प्रतिकूल असर पड़ा है। देश में लगभग एक साल तक स्कूल बंद रहे। इसका असर बच्चों के सीखने की क्षमता पर पड़ा है। ऐसा यूनिसेफ का मानना है। संस्था ने भारत सरकार से अपील की है कि प्राथमिकता के आधार पर तत्काल स्कूलों को खोला जाना चाहिए। अब तक केवल 11 राज्यों में छोटे बच्चों के स्कूल खुले। मौजूदा समय में सिर्फ आठ राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में कक्षा एक से 12 तक के स्कूल खोले गये हैं, जबकि 11 राज्यों में कक्षा 6-12 और 15 राज्यों में 9-12 तक की कक्षा शुरू हुई है। स्कूल बंद होने से बच्चे मूलभूत बातें सीखने से वंचित हो रहे हैं और ऑनलाइन शिक्षा कभी स्कूली शिक्षा का पूर्ण विकल्प नहीं हो सकता है। हाल फिलहाल स्कूल खुले ही थे की कोरोना की एक नयी लहर के प्रादुर्भाव से अभिभावक सहम गए है और अपने बच्चों को स्कूल भेजने से कतराने लगे है। अभिभावक चाहते है की स्कूल ओफलाइन के स्थान पर ऑनलाइन परीक्षा लें ताकि कोरोना की नई लहर से बच्चों को बचाया जा सके।
स्कूल बंद होने का सबसे अधिक असर गरीब परिवार के बच्चों पर पड़ा है। इससे एक बार फिर स्कूल से बाहर रहनेवाले बच्चों की संख्या के बढ़ने का डर है। भारत में यूनिसेफ की प्रतिनिधि यास्मीन अली हक का कहना है कि एक साल से स्कूल बंद होने से बच्चों के दैनिक क्रियाकलाप पर असर पड़ा है। लंबे समय से स्कूल से बाहर रहने से बच्चों में स्कूल नहीं जाने की प्रवृत्ति घर कर जाती है। बच्चों की मानसिक स्थिति पर भी असर पड़ा है। यह चिंता का विषय है। ऐसे में सरकार को बच्चों के हित देखते हुए स्कूल खोलने का निर्णय करना चाहिए। साथ ही शिक्षकों को छूटे हुए पाठ्यक्रम को पूरा करने पर विशेष ध्यान देना होगा। रिपोर्ट के मुताबिक, ऑनलाइन शिक्षा सभी के लिए एक विकल्प नहीं है, क्योंकि चार में से एक बच्चे के पास ही डिजिटल उपकरण और इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है। कोविड काल से पहले भारत में करीब 24 फीसदी घरों में ही इंटरनेट की पहुंच थी और इसमें भी ग्रामीण-शहरी एवं लैंगिक विभाजन था। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी ने एक बयान में कहा कि कोरोना वायरस के कारण 2020 में लागू लॉकडाउन के चलते 15 लाख स्कूलों को बंद करने से भारत में प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में पढ़ने वाले 24.7 करोड़ बच्चे प्रभावित हुए। इसके अतिरिक्त कोविड-19 महामारी की शुरुआत से पहले भी 60 लाख से अधिक लड़के-लड़कियां स्कूल नहीं जा पा रहे थे।
आज सम्पूर्ण शिक्षा जगत में यह बहस हो रही है कि ऑनलाइन शिक्षा पद्धति ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्तरीय शिक्षा मुहैया करा पाने की संभावना देगा। यह प्रणाली लागु करने से पहले इसके गुण दोषों पर गहन जाँच पड़ताल की जरुरत है अन्यथा अधकचरा ज्ञान बच्चों का भविष्य खराब कर सकता है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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