आंचलिकता के महानायक फणीश्वरनाथ ‘रेणु’

फणीश्वर नाथ ‘रेणु’जयंती - 4 मार्च 1921

बाल मुकुन्द ओझा

फणीश्वर नाथ रेणु की जयंती 4 मार्च को है। अपने कालजयी उपन्यास मेला आँचल के जरिये समाज में अपनी पेठ जमाने वाले फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ प्रेमचंद के बाद के युग में आधुनिक हिंदी साहित्य के सबसे सफल और प्रभावशाली लेखकों में से एक थे। वे ‘मैला आंचल’ के लेखक है जिसे प्रेमचंद के ‘गोदान’ के बाद सबसे महत्वपूर्ण हिंदी उपन्यास माना जाता है। इस उपन्यास के लिए उन्हें पदम श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अपनी रचनाओं में रेणु ने समाज के दबे कुचले लोगों की आवाज मुखर की थी। गावं और गली के इर्द गिर्द उनकी कलम घूमती रही। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ बेबाकी से अपनी कलम चलाई थी और साहित्य के सहारे समाज की संवेदनशील जगाने की कोशिश की थी। वे समकालीन ग्रामीण भारत की आवाज और अग्रदूतों के बीच मुख्यधारा की हिंदी साहित्य में क्षेत्रीय आवाज लाने वाले लेखक थें।
फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के तत्कालीन अररिया जिले में फॉरबिसगंज के पास औराही हिंगना नामक गांव में हुआ था। रेणु’ का जीवन संघर्षों से ओतप्रोत था। उन्होंने अनेक राजनीतिक व सामाजिक आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई तथा 1950 में नेपाल के राणाशाही विरोधी आंदोलन में नेपाली जनता को दमन से मुक्ति दिलाने के लिए भी अपना योगदान दिया। वे राजनीति में प्रगतिशील विचारधारा के समर्थक थे। सन 1953 में वे साहित्य सृजन के क्षेत्र में आए और उन्होंने कहानी, उपन्यास और निबंध आदि विविध साहित्यक विधाओं में मौलिक रचनाएं प्रस्तुत की। उन्होंने परती परिकथा, जूलूस, कितने चौराहे, दीर्घतपा, पलटू बाबू रोड जैसे उपन्यासों और मारे गए गुलफाम (तीसरी कसम), पंचलाइट और संवदिया जैसी कहानियों की भी रचना की थी। ‘रेणु’ की भाषा आम बोल-चाल की खड़ी बोली है। उनकी रचनाओं में खड़ी बोली की कसक साफतौर पर झलकती थी।
‘रेणु’ ने जे० पी० आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी की और सत्ता द्वारा दमन के विरोध में पद्मश्री का त्याग कर दिया। फणीश्वरनाथ रेणु ने 1936 के आसपास से कहानी लेखन की शुरुआत की थी। उस समय कुछ कहानियाँ प्रकाशित भी हुई थीं, किंतु वे किशोर रेणु की अपरिपक्व कहानियाँ थी। 1942 के आंदोलन में गिरफ्तार होने के बाद जब वे 1944 में जेल से मुक्त हुए, तब घर लौटने पर उन्होंने बटबाबा नामक पहली परिपक्व कहानी लिखी। बटबाबा साप्ताहिक विश्वमित्र के 27 अगस्त 1944 के अंक में प्रकाशित हुई। रेणु की दूसरी कहानी पहलवान की ढोलक 11 दिसम्बर 1944 को साप्ताहिक विश्वमित्र में छ्पी। 1972 में रेणु ने अपनी अंतिम कहानी भित्तिचित्र की मयूरी लिखी। उनकी अब तक उपलब्ध कहानियों की संख्या 63 है। रेणु को जितनी प्रसिद्धि उपन्यासों से मिली, उतनी ही प्रसिद्धि उनको उनकी कहानियों से भी मिली। ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप, अच्छे आदमी, सम्पूर्ण कहानियां, आदि उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं।
हिन्दी में आंचलिक कथा की नीव रखने वाले फणीश्वरनाथ ‘रेणु‘ ही हैं। सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय उनके परम मित्र थे इनकी कई रचनाओं में कटिहार के रेलवे स्टेशन का उल्लेख मिलता है। ‘रेणु‘ का लेखन प्रेमचंद की सामाजिक यथार्थवादी परम्परा को आगे बढ़ाता है। इन्हें आजादी के बाद का प्रेमचंद की संज्ञा भी दी जाती है। सन् 1954 में ‘रेणु‘ जी का बहुचर्चित आंचलिक उपन्यास मैला आँचल प्रकाशित हुआ जिसने हिन्दी उपन्यास को एक नई दिशा दी। यह हिन्दी का श्रेष्ठ एवं सशक्त आंचलिक उपन्यास है हिन्दी जगत में आंचलिक उपन्यासों पर विमर्श ”मैला आँचल” से ही प्रारम्भ है । रेणु को जितनी ख्याति हिंदी साहित्य में अपने उपन्यास मैला आँचल से मिली, उसकी मिसाल मिलना दुर्लभ है। इस उपन्यास के प्रकाशन ने उन्हें रातो-रात हिंदी के एक बड़े कथाकार के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। आंचलिकता की इस अवधारणा ने उपन्यासों और कथा साहित्य में गाँव की भाषा-संस्कृति और वहाँ के लोक जीवन को केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया। लोकगीत, लोकोक्ति, लोक संस्कृति, लोकभाषा एवं लोकनायक की इस अवधारणा ने अंचल विशेष को ही नायक बना दिया।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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