महिला सशक्तिकरण की प्रतीक सरोजिनी नायडू

बाल मुकुन्द ओझा

देश की आजादी में महिलाओं का योगदान किसी से कम नहीं है। कई महिलाओं ने अंग्रेजी दस्ता का डटकर मुकाबला किया था। इन्हीं में से एक थीं भारत कोकिला सरोजनी नायडू थी। सरोजिनी नायडू को नाइटेंगल ऑफ इंडिया के नाम से जाना जाता है। सरोजिनी ने महिलाओं के अधिकारों के लिए भी खूब संघर्ष किया।
दो मार्च भारत कोकिला सरोजनी नायडू के स्मृति दिवस के रूप में जाना जाता है। उनकी मृत्यु 2 मार्च 1949 को दिल का दौरा पड़ने से लखनऊ में हुई। महिला सशक्तिकरण की पहचान के लिए भी हम सरोजनी नायडू को जानते है। सरोजिनी नायडू उन महिलाओं में शामिल हैं जिन्होंने भारत को आजादी दिलाने के लिए कड़ा संघर्ष किया था। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा दिया। वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के दौरान वो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हुईं। इस आंदोलन के दौरान वो गोपाल कृष्ण गोखले, रवींद्रनाथ टैगोर, मोहम्मद अली जिन्ना, एनी बेसेंट, सीपी रामा स्वामी अय्यर, गांधीजी और जवाहर लाल नेहरू से मिलीं। 1930 में गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया जिसमें सरोजिनी ने हिस्सा लिया और गांधी जी के साथ जेल गईं।
उन्होंने राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ का प्रथम बार सस्वर गायन भी कांग्रेस के अधिवेशन में किया था। इसीलिए उनको देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा श्श्भारत कोकिलाश्श् के सम्मान से नवाजा गया था। नायडू पहली बार 1914 में महात्मा गांधी से मिली और तभी से देश के लिए मर मिटने को तैयार हो गईं। 1925 में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। 1928 में उन्हें केसर-ए-हिंद से सम्मानित किया गया। उन्होंने भारतीय समाज में फैली कुरीतियों के लिए भारतीय महिलाओं को जागृत किया।
भारत में महिला सशक्तिकरण और महिला अधिकार के लिए भी उन्होंने आवाज उठायी। उन्होंने राज्य स्तर से लेकर छोटे शहरों तक हर जगह महिलाओं को जागरूक किया। स्वतंत्रता सेनानी, कवयित्री और देश की पहली महिला गवर्नर सरोजिनी नायडू ने बचपन में ही अपने हुनर का परिचय दे दिया था। 12 साल की उम्र में सरोजिनी नायडू ने बड़े अखबारों में आर्टिकल और कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। नायडू कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष और किसी राज्य की पहली गवर्नर भी थी। उन्होंने उत्तर प्रदेश के गवर्नर का पद भार संभाला था। सरोजिनी नायडू ने गांधीजी के अनेक सत्याग्रहों में भाग लिया और भारत छोड़ो आंदोलन में वे जेल भी गईं। 1925 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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