सचिन और वसुंधरा के दमखम का सियासी प्रदर्शन

बाल मुकुन्द ओझा

राजस्थान की सियासत में धड़ेबंदी का खेल कोई नया नहीं है। आजादी के बाद से ही कांग्रेस में दो धड़े नजर आते थे। कुम्भाराम आर्य और दौलत राम सारण की सुखाड़िया से कभी नहीं पट्टी। हरिदेव जोशी और शिवचरण माथुर ने भी एक दूसरे को पटकनी देने में गुरेज नहीं किया। बाद में गहलोत का मदेरणा के साथ नवल किशोर शर्मा से हुआ दंगल सब ने देखा। यही परिपाटी अब गहलोत और सचिन में चली आ रही है। भाजपा में हालाँकि भैंरोसिंह शेखावत की पहले सतीश अग्रवाल और फिर चतुर्वेदी और भाभड़ा से अदावत किसी से छुपी नहीं थी। अब वसुंधरा और पूनिया खेमा अलग अलग राह पर चल रहा है।
अपनी ही पार्टी में रहकर उसकी जड़ खोदने की परम्परा नयी नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों सियासी पार्टियां आज भी अपनी परिपाटी निभाती चली आ रही है। दोनों ही पार्टियों में एक दूसरे को पटकनी देने नायब खेल चल रहा है। राजस्थान में अपनी अपनी पार्टी से नाराज चल रहे नेताओं के सब्र का बांध अब टूटने लगा है। दोनों खेमों ने शक्ति प्रदर्शन की खुलेआम तैयारियां शुरू करदी है। कांग्रेस में पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलेट और भाजपा में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के समर्थकों की बड़ी तादाद है। दोनों ही धरती से जुड़े नेता है। सचिन किसान आंदोलन को अपनी नाराजगी का माध्यम बनाया है तो वसुंधरा समर्थक अपनी नेता के जन्मदिवस पर शक्ति प्रदर्शन दिखना चाहते है। सचिन पर प्रदेश में गहलोत सरकार गिराने का आरोप लग चुका है। सरकार गिराने के लिए समर्थक विधायकों की पूरी संख्या नहीं होने के कारण ऐसा नहीं हो सका। वहीँ वसुंधरा की नाराजगी जग जाहिर है। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष पद पर सतीश पूनिया की ताजपोशी से वसुंधरा काफी नाराज बताई जा रही है। एकओर नाराजगी की वजह घनश्याम तिवाड़ी की भाजपा में वापसी बताई जा रही है। हासिये पर चल रही वसुंधरा को हालाँकि भाजपा में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का दर्जा प्राप्त है मगर वह भाजपा सियासत में सक्रीय भूमिका नहीं निभा रही है। पूनिया ने पंचायत और नगर निकाय चुनाव में भाजपा की लुटिया नहीं डूबने दी। आधी से अधिक जिला परिषदों पर कब्जा कर पूनिया ने अपनी ताकत दिखाई। नगर निकाय चुनाव भी भाजपा ने पूनिया के नेतृत्व में पूरी दमखम से लड़ा।
कांग्रेस में गहलोत – सचिन का आपसी विवाद अभी थमा नहीं है। अहमद पटेल की मृत्यु के बाद अब विवाद के खत्म होने की आशा नहीं है। गहलोत किसी भी स्थिति में सचिन को पावर देने के सख्त खिलाफ है। वे ऊपर से भले ही कितना ही दिखावा करे मगर आस्तीन में सांप पालना नहीं चाहते। कांग्रेस प्रभारी अजय माकन भी इस स्थिति से भलीभांति परिचित है। वे चाहकर कुछ करने की हालत में नहीं है।
दोनों खेमों के बीच चल रहे सियासी संघर्ष में माकन की बिल्कुल नहीं चल पा रही है। माकन ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के साथ मिलकर मंत्रियों, राजनीतिक नियुक्तियों और जिला अध्यक्षों की सूची तैयार की थी, लेकिन इस सूची को गहलोत व पायलट दोनों ने ही मानने से इनकार कर दिया। दोनों ने एक-दूसरे द्वारा सुझाए गए नामों पर सहमति नहीं दी। अधिकांश विधायकों ने मंत्री बनने की इच्छा जताई है। कुछ विधायकों ने राजनीतिक नियुक्ति के माध्यम से सरकार में दखल रखने को लेकर अपनी बात आलाकमान तक पहुंचाई है। गहलोत व पायलट की सियासी जंग और विधायकों की इच्छा के चलते आलाकमान सत्ता व संगठन दोनों को लेकर कोई निर्णय नहीं कर पा रहा है। माकन जब मामले को सुलझाने में असहाय साबित होने लगे तो पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने दखल किया, लेकिन वे भी अब तक कुछ खास नहीं कर पाए। राहुल गाँधी और प्रियंका भी कुछ नहीं कर पा रहे है इससे कांग्रेस में निराशा का माहौल है। दूसरी तरफ समूची स्थिति भांपकर सचिन ने किसान आंदोलन का डंका बजा कर अपना असंतोष जाता दिया है। बताते है अब गेंद आलाकमान के पाले में है।
भाजपा में भी सब कुछ सहज नहीं चल रहा है। हाल ही वसुंधरा राजे ने गृह मंत्री अमित शाह सहित अनेक भाजपा नेताओं से मुलाकात कर अपनी कथा – व्यथा से अवगत करा दिया है। यदि शीघ्र मामला नहीं सुलझा तो भाजपा में दबी चिनगारी कभी भी सुलग सकती है।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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