मातृभाषा आदमी के संस्कारों की संवाहक है

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस - 21 फरवरी

– बाल मुकुन्द ओझा

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी को हर साल मनाया जा रहा है। यूनेस्को द्वारा दुनिया भर के विभिन्न देशों में उपयोग की जाने वाली (पढ़ी, लिखी और बोली जाने वाली) 7000 से अधिक भाषाओं की पहचान की गई है। इसी बहुभाषीवाद को मनाने के लिए 21 फरवरी का दिन चुना गया है। विश्व में भाषाई, सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता व बहुभाषिता को प्रोत्साहन देने के साथ मातृभाषाओं से जुड़ी जागरुकता फैलाने के उद्देश्य से यह दिवस मनाया जाता है। यूनेस्को के मुताबिक दुनियाभर में 6000 भाषाएं बोली जाती हैं। भारत की बात करें तो यहां 1652 भाषाएं बोली जाती हैं। इनमें से 42.2 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिंदी है। भारत में 29 भाषाएं ऐसी हैं उनको बोलने वालों की संख्या 10 लाख से ज्यादा है। भारत में 7 भाषाएंसी बोली जाती है, जिनको बोलने वालों की संख्या एक लाख से ज्यादा है। भारतीय संविधान निर्माताओं की आकांक्षा थी कि स्वतंत्रता के बाद भारत का शासन अपनी भाषाओं में चले ताकि आम जनता शासन से जुड़ी रहे और समाज में एक सामंजस्य स्थापित हो और सबकी प्रगति हो सके। मातृभाषा आदमी के संस्कारों की संवाहक है। मातृभाषा के बिना, किसी भी देश की संस्कृति की कल्पना बेमानी है। मातृभाषा हमें राष्ट्रीयता से जोड़ती है और देश प्रेम की भावना उत्पन्न करती है। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस प्रत्येक भाषा की गरिमा को स्वीकार करने के लिए मनाया जाता है। यह दिवस हमको इस बात का ध्यान दिलाता है कि भाषा अभिव्यक्ति का साधन मात्र नहीं है यह सांस्कृतिक सेतु भी बनाती है।
यह सही है की भाषाओँ की दृष्टि से भारत एक समृद्ध देश है। उत्तर भारत के राज्यों को छोड़कर देश में जितने भी राज्य है वहां की मातृ भाषा हिंदी नहीं है हालाँकि हिंदी को हमने राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकारा है। बंगाल में बंगला, असम में असमी, कर्णाटक में कन्नड़, तमिलनाडु में तमिल ,केरल में मलयालम आंध्र में तेलगु और उड़ीसा में उड़िया का बोलबाला है। कुछ अन्य राज्यों की भाषा भी वहां की स्थानीय भाषा है और वहां हिंदी नहीं बोली जाती। कहने का तात्पर्य है देश में कहीं भी एक मातृ भाषा नहीं है। इसके बावजूद राष्ट्रभाषा के रूप में हमने हिंदी को स्वीकारा है। हिंदी हमारी पहचान बन चुकी है। आजादी से पूर्व अंग्रेजी भाषा हम पर थोपी गई। आजादी के बाद भी हमने विदेशी भाषा का परित्याग नहीं किया जिसके कारण देश के अहिन्दी भाषी राज्यों में अंग्रेजी ने अपना प्रभुत्व कायम कर लिया। आजादी के बाद यदि हमने अपनी निज भाषा के विकास पर ध्यान दिया होता तो आज हिंदी सम्पूर्ण देश में सर्वत्र मातृ भाषा के रूप में अपना स्थान बना लेती। हमारी गुलाम मानसिकता का ही यह परिणाम था की हिंदी मातृ भाषा का अपना दर्जा हासिल नहीं कर पाई। क्षेत्रीय भाषाओँ से हमारा कतई विरोध नहीं है .यदि देश के नागरिक अपनी स्थानीय भाषा को मातृ भाषा के रूप में स्वीकारते है तो यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। हमारा विरोध तो विदेशी भाषा से है जिसने हिंदी को आगे नहीं बढ़ने दिया। आज आवश्यकता इस बात की कि हम विश्व मातृ भाषा दिवस जरूर मनाएं लेकिन हिंदी को उसका हक अवश्य दिलाये। दक्षिण के प्रदेश अपनी निज बोली या भाषा को अपनाये इसमें किसी को आपत्ति नहीं है मगर राष्ट्रभाषा के स्थान पर अंग्रेजी को अपनाये यह हमे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं है। वे तमिल ,कनड या बंगला को अपनाये हमे खुशी होगी मगर हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी थोपे तो यह बर्दाश्त नहीं  करे।
सातवें दशक के आरंभ में तमिलनाडु में ‘हिंदी हटाओ’ का आंदोलन चल पड़ा जिसकी प्रतिक्रिया में हिंदी भाषी उत्तर भारत में भी ‘अंग्रेजी हटाओ’ का आंदोलन चला। स्वतंत्र भारत में साठ के दशक में अंग्रेजी हटाओं-हिन्दी लाओ के आंदोलन का सूत्रपात राममनोहर लोहिया ने किया था। समाजवादी पुरोधा डॉ॰ राममनोहर लोहिया के भाषा संबंधी चिंतन और आंदोलन का लक्ष्य भारतीय सार्वजनिक जीवन से अंगरेजी के वर्चस्व को हटाना था। लोहिया को अंगरेजी भाषा से कोई आपत्ति नहीं थी। अंगरेजी के साहित्य के भी वह विरोधी नहीं थे, बल्कि विचार और शोध की भाषा के रूप में वह अंगरेजी का सम्मान करते थे। लोहिया जब अंगरेजी हटाने की बात करते हैं, तो उसका मतलब हिंदी लाना नहीं है। बल्कि अंगरेजी हटाने के नारे के पीछे लोहिया की एक खास समझदारी है। लोहिया भारतीय जनता पर थोपी गई अंगरेजी के स्थान पर भारतीय भाषाओं को प्रतिष्ठा दिलाने के पक्षधर थे। 19 सितंबर 1962 को हैदराबाद में लोहिया ने कहा था अंगरेजी हटाओ का मतलब हिंदी लाओ नहीं होता। अंगरेजी हटाओ का मतलब होता है, तमिल या बांग्ला और इसी तरह अपनी-अपनी भाषाओं की प्रतिष्ठा ।
आज आवश्यकता इस बात की है की हम देश की मातृ और जन भाषा के रूप में हिंदी को अंगीकार करे। अपनी अपनी निज भाषा के साथ हिंदी को स्वीकार कर देश को प्रगति पथ और एक सूत्र में पिरोने के लिए अपने स्वार्थ त्यागे और देश के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा का परिचय दें। अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस की सार्थकता इसीमें है कि हम अपनी क्षेत्रीय भाषाओँ की अस्मिता को स्वीकार करने के साथ हिंदी को व्यापक स्वरुप प्रदान कर देश को एक नई पहचान दें। यह देश की सबसे बड़ी सेवा होगी।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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