प्रायश्चित

लघुकथा

बनवारी खामोश चूरुवी

बैंक में लगी लम्बी लाईन को लगभग चीरते हुए एक नवयुवक सीधा भुगतान खिडकी पर पहुंचा और बोला… मेरे पापा अस्पताल में भर्ती हैं। उनका आपरेशन होना है। कृपया मुझे पहले भुगतान कर दीजिए।
बैंक बाबू ने एक नजर उसको देखा और अपने काम में लग गया। लाईन में खड़े एक वृद्ध सज्जन ने युवक की ओर देखा और कहा-बेटे, तुम मेरे स्थान पर आ जाओ। मैं पीछे चला जाता हूँ।
थोड़ी देर में ही भुगतान प्राप्त कर लौटते हुए युवक ने कतार में काफी पीछे खड़े वृद्ध सज्जन से कहा- थैंक्यू अंकल !
मैं तुम्हें जानता हूँ, तुम सुदर्शन जी के बेटे हो न ?
जी,हाँ
आज आफिस जाते हुए तुम्हारे पापा ही मुझे बैंक शाखा में छोड़ कर गये थे।
युवक को काटो तो खून नहीं। उसका झूठ उजागर हो चुका था। वह गर्दन झुका चुपचाप चल दिया।

घण्टे भर बाद जब बाहर आये तो देखा, युवक वहीं खड़ा था। वह सीधा उनके पास आया।
अंकल, आप कहाँ जायेंगे ?
सुभाष चौक, अपने घर
मुझे भी उधर ही जाना है। आपको आपत्ति न हो, तो मैं आपको ले चलूं?
वृद्ध सज्जन ने युवक की आँखों में झांका,वहां अनुनय-विनय के साथ पश्चाताप के भाव अधिक थे।
बाईक पर पीछे बैठते हुए उन्होंने युवक के पीठ को हल्के से थपथपाया।
बैंक के मुख्य द्वार पर वेगुनबैलिया के फूल मुस्कुरा रहे थे।

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