दिव्यांगों के जीवन में उम्मीद की किरण

बाल मुकुन्द ओझा

मरू क्षेत्र में दशकों से सक्रिय स्वयंसेवी संस्था श्योर वैसे तो जीवन के विविध क्षेत्रों में सक्रिय है मगर दिव्यांगजनों के शैक्षिक सशक्तीकरण और उन्हें अधिकार संपन्न बनाने में संस्था का योगदान अनुपम है। संस्था द्वारा संचालित दिव्यांग अधिकारिता कार्यक्रम दिव्यांगों के लिए वरदान साबित हो रहा है। इससे न सिर्फ दिव्यांग बल्कि उनके परिजनों के जीवन में भी उम्मीद की नई किरण जगी है।
दिव्यांगता कोई अभिशाप नहीं है। शारीरिक अभावों को यदि प्रेरणा बना लिया जाये तो विकलांगता व्यक्तित्व विकास में सहायक हो जाती है। यदि सकारात्मक रहा जाये तो अभाव भी विशेषता बन जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शारीरिक रूप से अभावग्रस्त व्यक्ति को दिव्यांग कहकर उनका मान और सम्मान बढ़ाया है। समाज का भी यह कर्तव्य है की ऐसे लोगों की शिक्षा और रोजगार का समुचित प्रबंध कर हम जिम्मेदारी का निर्वहन करें। राजस्थान के सीमावर्ती बाड़मेर में ऐसी ही एक समाजसेवी संस्था ने अंध, मूक और विमंदित बालकों के रोजगार और पुनर्वास का बीड़ा उठाकर समाज सेवा की नायब पहल की। मरू क्षेत्र के गौरव पदमश्री मगराज जैन द्वारा स्थापित सोसायटी टू अपलिफ्ट रूरल इक्सोनोमी (श्योर) बाडमेर ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभागके सहयोग से ऐसे बच्चों के सर्वांगीण विकास का जिम्मा उठाया। संस्था ने 16 वर्ष पूर्व श्री सत्यसांई अंध एवं मूक बधिर विद्यालय, श्री सत्यसांई मानसिक विमंदित विद्यालय और श्री सत्यसाई मानसिक विमंदित पुनर्वास गृह का सञ्चालन शुरू किया।
संस्था द्वारा बाडमेर जिले में प्रथम विशेष विद्यालय का शुभांम्भ वर्ष 2005 में इस उद्देश्य के साथ प्रारम्भ किया गया कि जिले के सुदूर क्षेत्र में निवासरत दिव्यांगजन बालक – बालिकाएं शिक्षा की मुख्य धारा में सम्मिलित हो तथा समुदाय में इनके प्रति नजरिये में बदलाव आये, साथ ही समुदाय व दिव्यांगजनों में जागरूकता, शिक्षा कौशलता आये जिससे वे आगे चलकर समाज में सहभागिता बढायें व देश की आर्थिक उन्नति में भागीदार बनें। प्रारम्भिक वर्ष में इस विद्यालय में 22 बच्चों ने प्रवेश लिया। ये बच्चें संस्था द्वारा संचालित समुदाय आधारित पुनर्वास परियोजना चौहटन क्षेत्र से आये थे जो शिक्षा की महत्ता को समझने लगे थे। संस्था ने इनके घर घर जाकर पढ़ाने के साथ पुनर्वास के सभी पहलुआों पर समुदाय के साथ मिलकर कार्य किया था।
इस दौरान 16 वर्षों में काफी परिवर्तन आया है। वर्ष 2005 में किराये के भवन में संचालित हो कर यह भवन आज 2 करोड़ से अधिक की लागत का विशाल एवं भव्य आवासीय विद्यालय बन गया है। साथ ही 22 बच्चों से बढ़कर आज 110 बच्चों तक पहुच गया है। दिव्यांगजनों की बात करें तो इस विद्यालय में अध्ययन कर जाने वाले कई बच्चों ने शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त कर नौकरियों की दौड़ में शामिल हो गये है वही तीन बालक जो सुदूर क्षेत्र के अति पिछडे परिवारो से निकल कर सरकारी शिक्षक बनकर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे है। एक बालक बैक में अधिकारी पद पर सेवारत है ।
इस परियोजना के अच्छे परिणाम को देखते हुए संस्था ने चौहटन एवं सिणधरी ब्लॉक के साथ ही जेैसलमेर के सम ब्लॉक में इस परियोजना को प्रारम्भ कर समुदायिक कार्यकर्ता एंव 8 बच्चों पर एक विशेष अध्यापक को लगाकर इन बच्चों को शिक्षा से जोडने का प्रयास किया । इस कार्यक्रम में अंधता निवारण पमुख्य बिन्दु होने के कारण शिक्षा का कार्य बाधित होते देख संस्थान ने दोनों जिलों में समावेशित शिक्षा कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसके तहत दोनों जिलों का सर्वे किया जिसमें लगभग 350 दृष्टिबाधित बच्चों को चिन्हित कर 38 विशेष शिक्षकों को लगाया गया जो भ्रमणशील अध्यापक थे। बच्चा जिस गांव में रहता है उसी गांव के विद्यालय में उसे प्रवेश दिलाकर अध्ययन करवाया जाने लगा। वर्ष 2005 में जिले का प्रथम विशेष विद्यालय पदमश्री मगराज जैन के प्रयासों से प्रारम्भ हुआ जिसमें पढकर जाने वाले, पन्नाराम, नगाराम, अनोपसिंह ,मोहनलाल सरकारी अध्यापक बन अपनी सेवाए दे रहे हैं वही बाखासर निवासी सांवलाराम दिल्ली के हिन्दू कॉलेज में अध्ययन कर बैक अधिकारी पद पर कार्यरत है।
संस्था का प्रयास है मरुक्षेत्र के सभी दिव्यांगजनों को विकास की नयी रौशनी मिले। विकलांगो की शारीरिक स्थिति को नजर अन्दाज करते हुए उनके आत्मविश्वास एवं मनोबल को बढ़ाये और उनकी कार्य क्षमताओं को देखते हुए उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोडने का प्रसास करें। विकलांगों को समाज की मुख्यधारा में तभी शामिल किया जा सकता है जब समाज इन्हें अपना हिस्सा समझे, इसके लिए एक व्यापक जागरूकता अभियान की जरूरत है। दिव्यांगों को शिक्षा से जोड़ना जरूरी है। इस वर्ग के लिए, खासतौर पर, मूक-बधिरों के लिए विशेष स्कूलों का अभाव है जिसकी वजह से अधिकांश विकलांग ठीक से पढ़-लिखकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन पाते। हमें दिव्यांगों के जीवन में मुस्कराहट लाने के लिए अपना नजरिया बदलना होगा तभी हम अपनी जिम्मेदारी का सही निर्वहन कर सकेंगे।

 

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