राम भरोसे

व्यंग

बाल मुकुंद ओझा

कहते है राम शब्द की महिमा अपरम्पार है। यह किसी की नैय्या पार लगा देता है तो किसी को डुबोते देर नहीं करता। हाथ पर हाथ धरे बैठे लोग राम का सुमिरन अधिक करते है। खुद कुछ करते धरते नहीं और आखिर समय में राम पर भरोसा कर अपनी गाड़ी पार करना चाहते है। रामभरोसे शब्द की उत्पति ऐसे ही लोगों की देन है।
रामभरोसे शब्द आजकल काफी लोकप्रिय हो रहा है। जिसे देखों रामभरोसे का जप करता मिल जायेगा। विरोधी सत्ता पक्ष पर रामभरोसे सरकार का तंज कसते है। कहते है सरकार रामभरोसे चल रही है। अस्पताल की व्यवस्था देखने आये नेताजी ने यह कहते देर नहीं की की अस्पताल रामभरोसे चल रहा है। वर्षा नहीं हुई तो खेती राम भरोसे। घर में दो जून खाना नहीं है तो पेटभरायी राम भरोसे। पूरी दुनिया ही रामभरोसे चल रही है।
साधारण बोल चाल में जब कोई काम अपने आप ही अच्छा हो जाए तो हम लोग कहते है की ये तो राम भरोसे ही हो गया। मतलब अपने आप ही हो गया। आखिर यह रामभरोसे है क्या जिसको इतनी अधिक चर्चा होती है। कहने का तात्पर्य है जब किसी व्यवस्था में ढिलाई की बात करते हैं तो रामभरोसे याद आ ही जाते है। राम भरोसे का मतलब ये नहीं की आप सिर्फ बैठे रहो जो होना है अपने आप हो जायेगा बल्कि कुछ न कुछ करते रहो, पर वो कुछ क्या है इसमें ही छुपा है राम भरोसे रहने का मर्म।
तुलसीदास के शब्दों में कहे तो
तुलसी विरवा बाग के सींचत में मुरझाय ।
राम भरोसे जे रहें, पर्वत पे हू हरियांय ।।
तुलसीदास जी कहते हैं कि कुछ ऐसे पौधे होते हैं जो बगीचे में रहकर नित्य पानी की सिंचाई होने के बाद भी मुरझा जाते हैं, जबकि राम जी के भरोसे रहने वाले पर्वतों पर उगने वाले पौधे जिनकी देख रेख और सिंचाई करने वाला कोई नहीं है वे हमेशा हरे भरे बने रहते हैं ।
मालवी जबान में एक कहावत है, “भरोसे की भैंस, पाड़ो ब्यावै” अर्थात गाभन भैंस से अगर मादाशिशु की उम्मीद रखेंगे तो वह नरशिशु को जन्म देती है। यानी भैंस का काम ‘रामभरोसे’ चलता है।

 

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