‘सीएए‘ बनेगा चुनावी हथियार ?

विष्णुगुप्त

नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए फिर से राजनीति के केन्द्र मे आ गयी है और राजनीति को उथल-पुथल कर रही है। पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों में एक मजबूत हथकंडा नागरिक संशोधन अधिनियम भी बनने जा रही है। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने घोषणा की है कि कोरोना के खिलाफ टिकाकरण पूरा होते ही सीएए को लागू कर दिया जायेगा, वंचितों को नागरिकता देने का कार्य पूरा होगा।
केन्द्र की सत्ता पर राज करने वाली भाजपा पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों में सीएए को लेकर उथल-पुथल मचाने और मतदाताओं को आकर्षित करने की राजनीतिक योजना पर न केवल कार्य कर रही है बल्कि सीएए को अपनी चुनावी राजनीति का प्रमुख हथियार भी बना रही है। भाजपा को यह उम्मीद है कि पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों में नागरिकता संशोधन अधिनियम का उसका यह चुनावी हथियार मतदाताओं के सिर पर चढ कर बोलेगा और मतदाताओं को आकर्षित कर उसकी सत्ता किस्मत को चमकायेगी।
प्रतिकिया में विपक्ष भी सकिय है। विपक्षी भी सीएए को लेकर विरोध की आग को भड़काने में कहां पीछे रहने वाला है। खासकर कांग्रेस सीएए के विरोध में अपनी चुनावी गतिविधियां भी शुरू कर दी है। असम में राहुल गांधी ने सीएए विरोधी गमछा ओढ कर यह दर्शा दिया है कि भाजपा अगर समर्थन में मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने का खेल-खेल रही है तो फिर कांग्रेस भी इसके काट के लिए पीछे नहीं रहेगी और कांग्रेस भी सीएए के विरोध में मतदाताओं को आकर्षित कर अपनी चुनावी राजनीति को चमकाने की कोशिश करेगी। जबकि पश्चिम बंगाल और केरल में कम्युनिस्ट पार्टियां यह पहले ही जाहिर कर चुकी हैं कि किसी भी राजनीतिक परिस्थति में सीएए को लागू नहीं होने देगी। केरल के कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने साफ कहा है कि भाजपा को सीएए का लाभ नहीं लेने दिया जायेगा, सीएए के खिलाफ मे भाजपा की पूरी घेराबंदी होगी, विजयन का यह भी कहना है कि धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियों के सामने भाजपा का यह सीएए का दांव बेमौत मरेगा। उपर्युक्त चुनावी राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह मानना ही होगा कि सीएए अब चुनावी शक्ति हासिल करने का हथियार बन गया है।
सीएए को भाजपा क्यों चुनावी राजनीतिक हथियार बना रही है? इसमें भाजपा को कौन सी मजबूरी है? क्या भाजपा के सामने अन्य सभी चुनावी हथियार चूक गये हैं? निश्चित तौर पर भाजपा के सामने यह एक मजबूरी भी है। भाजपा के पास जो स्थायी चुनावी हथियार होते थे वे सभी चुनावी हथियार अब असरदार नहीं रहे, सामयिक नहीं रहे, कारगर नहीं रहे, इन हथियारों का एक्सपायरी देट समाप्त हो चुके हैं। जैसे कश्मीर और धारा 370 तथा रामजन्म भूमि मंदिर निर्माण का चुनावी हथियार। भाजपा ने अपनी कश्मीर समस्या का समाधान कर चुकी है और अपने चुनावी वायदे धारा 370 को भी समाप्त कर पूरा कर चुकी है। रामजन्म भूमि मंदिर निर्माण का राजनीतिक एजेंडा पूरा हो चुका है, रामजन्म भूमि मंदिर निर्माण की सभी न्यायिक प्रक्रियाएं पूरी हो गयी हैं और कुछ सालों में ही अयोध्या में भव्य रामजन्म भूमि मंदिर का निर्माण होना निश्चित है। इसलिए इन प्रश्नों और हथियारों की एक्सपायरी देट समाप्त हो चुके हैं। भाजपा अपने इन पुराने चुनावी हथियारों को लेकर अपनी चुनावी किस्मत नहीं चमका सकती है, मतदाताओं को लुभाने का कार्य नहीं कर सकती है। भाजपा को नये राजनीतिक हथियार की जरूरत थी, नये हथियार से ही वह अपनी विरोधी राजनीतिक पार्टियों का शिकार कर सकती है। नये राजनीतिक हथियारों की खोज सीएए तक पहुंच कर ही समाप्त होती है। सीएए से बड़ा राजनीतिक चुनावी हथियार भाजपा के पास और कोई हो ही नहीं सकता है। यह एक ऐसा राजनीतिक हथियार है जिसकी चर्चा मात्र से ही समर्थन और विरोध की राजनीतिक गोलबंदी शुरू हो जाती है, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि राजनीतिक सवर्ग को उथल-पुथल मचा देने की शक्ति रखता है।
सीएए को लेकर भारतीय राजनीति अभिशप्त रही है। भारतीय राजनीति में सीएए ने किस प्रकार से उथल-पुथल मचाया, किस प्रकार से विश्वास और घृणा दोनों प्रकार की राजनीतिक संवेदनाएं उत्पन्न की है,यह भी जगजाहिर है। जब पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थी अपने बच्चों के जन्म पर उनका नामंांकरण ‘नागरिक ‘ के तौर पर करता है, यानी अपने बच्चे का नाम नागरिक रखता है तब यह जाहिर होता है कि सीएए को लेकर विश्वास भी है, समर्थन भी है, आशा भी है और संवेदनाएं भी हैं। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि सीएए को लेकर समर्थन, संवेदनाएं और विश्वास क्यों हैं? समर्थन, संवेदनाएं और विश्वास इसलिए है कि 1947 के बाद ऐसे कई समूह और वर्ग हैं जो मजहबी आधार पर पीड़ित होकर, उत्पीड़ित होकर अपने जीवन को बचाने के लिए भारत में शरणार्थी बनना स्वीकार किया था और भारत सरकार ने जिन्हें शरणार्थी के रूप में स्वीकार किया था को आज तक भारत की नागरिकता नहीं मिली। ऐसे संवर्ग के जिन समूहों के नाम सबसे आगे हैं उनमें कश्मीर में पाकिस्तान से पीड़ित होकर आने वाले शरणार्थी, असम में बांग्लादेश से आये शरणार्थी और पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से आये शरणार्थी शामिल हैं और अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर आदि प्रदेशों में चकमा आदिवासी समूह हैं। इसके अलावा इधर पाकिस्तान से मजहबी आधार पर पीडित होकर आये हिन्दू समूह भी हैं। इन सभी समूहों को सीएए के माध्यम से नागरिकता मिलने की उम्मीद है।
सीएए का विरोध घृणा, हिंसा और प्रतिहिंसा में तब्दील हुआ है। विरोध में खडी शाहिन बाग की धारा भी उल्लेखनीय है। शाहीन बाग की विरोध धारा ने देश के अंदर में कैसी राजनीतिक संकट उत्पन्न की थी, यह भी जगजाहिर है। महीनों तक शाहीन बाग की विरोध धारा जलती रही। देश-विदेश तक शाहीन बाग विरोध की धारा की आग पहुंचती रही। धीरे-धीरे शाहीन बाग विरोध धारा की आग पूरे देश में फैल गयी। जगह-जगह पर शाहीन बाग बन गये। देश की राजधानी दिल्ली तो दंगों की भेंट भी चढ गयी। जैसे ही शाहीन बाग की विरोध धारा दिल्ली के अन्य जगहों पर फैली वैसी इसके विरोध की राजनीतिक प्रकियाएं भी तेज हुई। फलस्वरूप राजनीतिक टकराहट का जन्म हुआ। राजनीतिक टकराहट कभी-कभी हिंसक रूप धारण कर लेता है। दिल्ली में सीएए का विरोध और समर्थन का खेल राजनीतिक हिंसा में बदल गया। दिल्ली में भयानक दंगे हुए। इन दंगों में हिन्दुओं को बडा नुकसान पहुंचाया गया। दंगों में मारे जाने वाले सबसे ज्यादा हिन्दू थे। नरेन्द्र मोदी की सरकार पर यह प्रश्न खड़ा हुआ था कि दिल्ली दंगों में हिन्दुओं की जानमाल की सुरक्षा क्यों नहीं कर पायी? दिल्ली दंगों के कारण शाहिन बाग की विरोध धारा कमजोर हुई, शक्तिहीन हुई। कोरोना शुरू होने के साथ ही साथ शाहीन बाग की विरोध धारा को भी समाप्त होना पड़ा।
सीएए का प्रश्न हिन्दू-मुस्लिम में विभाजन रेखा बनाता है। समर्थन में हिन्दू हैं और विरोध में मुसलमान हैं, ऐसा राजनीतिक संदेश दिया गया है और यह राजनीतिक संदेश गहरी पैठ बना चुका है। ऐसा संदेश भाजपा के लिए प्राण वायु होता है। ऐसी ही विभाजन रेखा भाजपा चाहती है। ऐसी ही विभाजन रेखा भाजपा की किस्मत चमकाती है। कश्मीर, धारा 370 और रामजन्म भूमि मंदिर के प्रश्न पर भी भाजपा ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच खाई उत्पन्न की थी, विभाजन रेखा बनायी थी और इसी विभाजन रेखा के माध्यम से भाजपा केन्द्रीय सत्ता तक भी पहुंची। सीएए के विरोध में अतिरंजित राजनीतिक प्रक्रियाएं जो अपनायी गयी उससे हिन्दू मतों में उफान पैदा हुआ है, कट्टर हिन्दुओं के बीच में अपनी अस्मिता लेकर चिंता पसरी है। कई जिहादी मुस्लिम संगठनों की सक्रियता भी जगजाहिर हुई। विदेशों से मिली सहायता भी एक चिंताजनक विषय वस्तु है। इसलिए भाजपा के पक्ष में सीएए का प्रश्न रहा है।
यक्ष प्रश्न यह है कि सीएए का हथियार भाजपा को कितना लाभ देगा? जिन पांच राज्यों में विधान सभा का चुनाव हैं उनमें सिर्फ असम में भी भाजपा सत्तासीन है जबकि पांडेचरी, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु में भाजपा विपक्ष में है। तमिलनाडु में भाजपा सहयोगी के रूप में चुनाव लडेगी। तमिलनाडु मे अनाद्रमुक भाजपा की बडी सहयोगी होगी। इसलिए तमिलनाडु में सीएए को लेकर भाजपा बहुत ज्यादा गंभीर नहीं होगी। पर दो राज्य ऐसे हैं जहां पर भाजपा सीएए के प्रश्न पर ही सत्ता हासिल करेगी। असम में भाजपा सीएए को लेकर विपक्ष का शिकार करेगी, सीएए को लेकर असम में तेज आंदोलन हुआ है। भाजपा को उम्मीद है कि सीएए को चुनावी हथियार बनाने से असम में उसकी सरकार फिर से बनेगी। सबसे बड़ा दांव तो भाजपा पश्चिम बंगाल में खेली है। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में साफ तौर पर घोषणा की है कि सीएए हर परिस्थिति में लागू होगा, कोई शक्ति सीएए को लागू करने से नहीं रोक सकती है। कोरोना के खिलाफ टिकाकरण पूरा होते ही सीएए को लागू कर दिया जायेगा। पश्चिम बंगाल में सीएए के प्रश्न पर ममता बनर्जी हलकान है, उसकी सत्ता पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। खास कर मतुआ समूह को लेकर ममता बनर्जी की चिंता बढी है। मतुआ समूह सीएए से आश लगाये बैठा हुआ है और उस समूह को भारत की नागरिकता मिलने की उम्मीद बनी है। जानना यह भी जरूरी है कि जिस प्रकार से बिहार और उत्तर प्रदेश में यादव अपनी संख्या बल पर सत्ता बनाने और गिराने का खेल खेलते हैं उसी प्रकार की राजनीतिक शक्ति पश्चिम बंगाल के अंदर में मतुआ जाति रखती है। मतुआ जाति दलित जाति है। पश्चिम बंगाल में मतुआ जाति की संख्या 17 प्रतिशत बतायी जाती है। पिछले लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल के अंदर में भाजपा की जीत और उपलब्धि के केन्द्र में मतुआ जाति का समर्थन ही माना जा रहा था। मतुआ जाति अभी भी भाजपा के पक्ष में खडी है। मतुआ जाति के लाखों की सभा को अमित शाह ने संबोधित कर उन्हें नागरिकता प्रदान करने का आश्वासन दिया है। केरल में भी सीएए के प्रश्न पर भाजपा हिन्दू मतों की गोलबंदी सुनिश्चित करेगी। हिन्दू मतों की गोलबंदी से नुकसान तो सीएए विरोधी कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को ही होगा।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

Post add

Leave A Reply

Your email address will not be published.