कोरोना से ज्यादा भयावह है सड़क हादसों में मौतों का आंकड़ा

बाल मुकुन्द ओझा

संसद में पेश की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पिछले साल कोरोना से 1.49 लाख लोगों की मौत हुई थी, जबकि देश में हर साल सड़क हादसों से 1.50 लाख से ज्यादा लोगों की जान जाती है। रिपोर्ट से यह जाहिर होता है की भारत में सड़कों पर चलना कोरोना के संक्रमण से भी ज्यादा खतरनाक है।
केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने माना है कि देश में सड़क हादसों में रोजाना 415 लोगों की जान जाती है। गडकरी के मुताबिक देश में हर साल 4.50 करोड़ सड़क हादसे होते हैं। इनमें डेढ़ लाख लोगों की मौत हो जाती है और साढ़े चार लाख लोग घायल होते हैं। जानकारों का कहना है सड़क हादसों में होने वाली मौतों की तादाद सरकारी आंकड़ों के मुकाबले कहीं ज्यादा है। दूर-दराज के इलाकों में होने वाले हादसों की अक्सर खबर ही नहीं मिलती। देश में लॉकडाउन के दौरान सड़क हादसों में रिकॉर्ड कमी दर्ज की गई थी, पर अनलॉक के बाद से दोबारा सड़क हादसों में तेजी आ गई है। पिछले साल के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक लॉकडाउन के चलते सड़क हादसों में कमी आई और करीब बीस हजार लोगों की जान बची है।
दुनिया के सिर्फ 3 प्रतिशत वाहन भारत में हैं, पर सड़क हादसों में 12.06 प्रतिशत जान यहां जाती है। अंतरराष्ट्रीय सड़क संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 12.5 लाख लोगों की हर साल सड़क हादसों में जान जाती है। सरकार देश के हाइवे नेटवर्क पर 5000 से ज्यादा ऐसी जगहों की शिनाख्त कर रही है जो हादसों के लिहाज से सबसे संवेदनशील हैं।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के सड़क हादसों के आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे देश में लोग जान हथेली पर लेकर चलते है। देश में सड़कों और हाईवे की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। इसी के साथ हादसों की रफ्तार भी थमने का नाम नहीं ले रही। एक सर्वे रिपोर्ट की माने तो चीन के बाद भारत में सड़क हादसों में जान गंवाने वाले लोगों का आंकड़ा सबसे ज्यादा है इसका सबसे बड़ा कारण है कि गाड़ियों की स्पीड लिमिट पर निगरानी का कोई ठोस तंत्र विकसित नहीं होना है। भारत में कोई दिन नहीं ऐसा नहीं जाता जब देश के किसी भाग में सड़क हादसा न होता हो। ऐसा लगता है जैसे सड़के आतंकी हो गयी है और हादसे थमने के नाम नहीं ले रहे है। देश में मोटर वाहन कानून 2019 लागू होने के बाद भले ही सरकार के राजस्व में वृद्धि हुई हो मगर दुर्घटनाओं में जान गंवाने वालों की संख्या में कमी नहीं आयी। विडंबना यह है की लोग अभी भी जान हथेली पर रखकर चल रहे है। सख्त कानून का उनपर कोई असर नहीं हुआ है। अब तो भारत सरकार ने भी मान लिए है की सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है। सड़क दुर्घटनाओं में पैदल चलने वाले लोग भी सुरक्षित नहीं है। इन सभी दुर्घटनाओं के पीछे शराब मादक पदार्थों का इस्तेमाल, वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करना, वाहनों में जरुरत से अधिक भीड़ होना, वैध गति से अधिक तेज गाड़ी चलाना और थकान आदि होना है। महानगरों और नगरों में किसी चौराहे पर लाल बत्ती को धता बताकर रोड पार कर जाना, गलत तरीके से ओवरटेकिंग, बेवजह हार्न बजाना, निर्धारित लेन में न चलना और तेज गति से गाड़ी चलाकर ट्रैफिक कानूनों की अवहेलना आज के युवकों का प्रमुख शगल बन गया है। कहने का तात्पर्य है विकास के साथ साथ जिस सड़क संस्कृति की जरूरत होती है वह हमारे देश में अभी तक नहीं बन पाई है। सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण यही है।
सड़क सुरक्षा एक महत्वपूर्ण विषय है, आम जनता में खासतौर से नये आयु वर्ग के लोगों में अधिक जागरुकता लाने के लिये इसे शिक्षा, सामाजिक जागरुकता आदि जैसे विभिन्न क्षेत्रों से जोड़ा गया है। सड़क दुर्घटना, चोट और मृत्यु आज के दिनों में बहुत आम हो चला है। सड़क पर ऐसी दुर्घटनाओं की मुख्य वजह लोगों द्वारा सड़क यातायात नियमों और सड़क सुरक्षा उपायों की अनदेखी है। गलत दिशा में गाड़ी चलाना, सड़क सुरक्षा नियमों और उपायों में कमी, तेज गति, नशे में गाड़ी चलाने आदि । सड़क हादसों की संख्या को घटाने के लिये उनकी सुरक्षा के लिये सभी सड़क का इस्तेमाल करने वालों के लिये सरकार ने विभिन्न प्रकार के सड़क यातायात और सड़क सुरक्षा नियम बनाये हैं। हमें उन सभी नियमों और नियंत्रकों का पालन करना चाहिये जैसे रक्षात्मक चालन की क्रिया, सुरक्षा उपायों का इस्तेमाल, गति सीमा को ठीक बनायें रखना, सड़क पर बने निशानों को समझना आदि।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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