मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा

पंकज यादव, बदायूँ

नब्बे के दशक में टेलीविजन पर दूरदर्शन के दर्शक रहे लोगों को याद होगा कि उस दौर में लोकसेवा संचार परिषद द्वारा राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय एकीकरण के विचार को केंद्र में रखते हुए “मिले सुर” नामक एक विचार विकसित किया गया था, जिसको उस दौर के इकलौते टेलीविजन ब्रॉडकास्टर दूरदर्शन और केंद्रीय सूचना मंत्रालय द्वारा प्रोत्साहित करते हुए दूरदर्शन पर “मिले सुर मेरा तुम्हारा” नामक एक वीडियो गीत प्रसारित करने का निर्णय लिया गया था। 15 अगस्त 1988 को लालकिले से प्रधानमंत्री राजीव गांधी के अभिभाषण के तुरंत बाद इस वीडियो गीत का प्रसारण टेलीविजन पर किया गया। सुना है कि राष्ट्रीय एकता और विभिन्नता में एकता के विचार को एक गीत के रूप में ढालने की योजना राजीव गाँधी और जयदीप समर्थ जोकि अभिनेत्री तनुजा के भाई थे और विज्ञापन निर्माता कम्पनी ओगिल्वी एन्ड माथर में सीनियर एक्जीक्यूटिव थे, के बीच मन्त्रणा के दौरान बनी थी। जयदीप समर्थ ने जब इस योजना के विषय में ओगिल्वी एन्ड माथर के ही सुरेश मलिक को बताया तो सुरेश मलिक और निर्देशक कैलाश सुरेंद्र नाथ ने इस परियोजना को धरातल पर उतारने का निर्णय लिया। निर्देशक कैलाश सुरेंद्र नाथ के निर्देशन में गीत के फिल्मांकन के लिए विभिन्न क्षेत्र की जानी मानी हस्तियों को साथ लिया गया।
राजस्थानी गीतकार पीयूष पांडेय द्वारा गढ़े गए शब्दों को बंगाली संगीतकार लुईस बैंक ने मराठी संगीतकार अशोक पटकी के साथ मिलकर इस प्रकार अपनी कर्णप्रिय धुनों पर व्यवस्थित किया कि गीत की धुनें आज भी बजते ही राष्ट्रीय एकता के भाव को चरम पर स्थापित करने का प्रयास करती प्रतीत होती हैं। हिंदी समेत असमिया, बांग्ला, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मराठी, उड़िया, पंजाबी, सिंधी, तमिल, तेलगू और उर्दू मिलाकर कुल 14 भाषाओं के इस गीत का फिल्मांकन पंडित भीमसेन जोशी, लता मंगेश्कर, एम.बाला मुरलीकृष्ण, कविता कृष्णमूर्ति, शुभांगी बोस, सुचित्रा मित्रा, आर. ए. राममनी, आनन्द शंकर जैसे गायकों और सँगीतज्ञों, नीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती, सुनील गंगोपाध्याय और जावेद अख्तर जैसे कवियों, अमिताभ बच्चन, जितेंद्र, मिथुन चक्रवर्ती, शर्मिला टैगोर, हेमा मालिनी, तनुजा, कमल हासन, मीनाक्षी शेषाद्री, रेवती, के आर विजया, वहीदा रहमान, शबाना आज़मी, दीपा साही, ओमपुरी, भीषम साहनी, अमरीश पुरी, दीना पाठक, हरीश पटेल, वीरेन्द्र सक्सेना, सुहासिनी, उत्तम मोहन्थी, प्रताप पोथेन और गीतांजलि जैसे बॉलीवुड और क्षेत्रीय भाषाओं के अभिनेता-अभिनेत्रियों, प्रकाश पादुकोण, अरुण लाल, रामनाथन कृष्णन, एस वेंकटराघवन, चूनी गोस्वामी, पी के बनर्जी, गुरबक्श सिंह, नरेन्द्र हिरवानी, डायना एडुलजी और इरापल्ली प्रसन्ना जैसी खेल हस्तियों और नृत्यांगना मल्लिका साराभाई, कार्टूनिस्ट मारियो मिरांडा और फिल्मकार मृणाल सेन समेत देशभर के तमाम जाने अनजाने चेहरों को शामिल करते हुए किया गया था। उस दौर के टेलीविजन प्रेमियों के स्मृति पटल पर अब भी वह स्मृतियां शेष होंगीं कि किस तरह यह गीत टेलीविजन पर आते ही बच्चों से लेकर बड़ों और बूढ़ों तक सबको प्रफुल्लित कर देता था, गीत को अंत तक देखने की उत्सुकता ऐसी होती थी कि घरों में लोग इसको देखने के लिए बाकी कार्यों को थोड़ी देर रोक दिया करते थे।

तकरीबन 6 मिनट के इस वीडियो गीत में शहर से लेकर गाँवों तक, शहरवासियों से लेकर आदिवासियों तक के जनजीवन, देश के तमाम राज्यों की जीवनशैलियों, उनकी संस्कृतियों, उनकी भाषाओं, उनके विचारों, उनके धर्मो और उनकी जातियों, देशभर की तमाम राष्ट्रीय धरोहरों और तमाम परिवेशों को एकसूत्र में पिरोने का प्रयास इस तरह किया गया था कि राष्ट्रीय एकता का भाव गीत से स्वतः ही परिलक्षित होता प्रतीत हो जाता था। गीत अप्रत्यक्ष रूप से सन्देश देता था कि भारत का विचार तब तक अधूरा है जब तक उसमें विभिन्न जाति-धर्म, विभिन्न विचार, विभिन्न संस्कृतियों, विभिन्न सांस्कृतिक धरोहरों, विभिन्न भाषाओं, विभिन्न जीवनशैलियों का समावेश न हो। विभिन्नता में एकता का भाव ही भारत की आत्मा है और राष्ट्रीय एकता के लिए इस विभिन्नता को स्वीकारना बेहद जरूरी है।

वक्त के साथ दौर बदला और निजी टेलीविजन चैनलों की भीड़ के बीच दूरदर्शन के साथ-साथ “मिले सुर मेरा तुम्हारा” भी कहीं गुम होता चला गया। बाद में 2010 में एक बार फिर जूम टीवी द्वारा इस गीत को पुनः नए रंग रूप में ढालकर नए सेलिब्रिटी चेहरों के साथ “फिर मिले सुर मेरा तुम्हारा” नाम से लाँच किया गया। लेकिन इस बार न तो यह गीत लोगों के बीच आकर्षण ही पैदा कर पाया और न ही लोगों के दिलों में अपने ओरिजिनल वर्जन की तरह रंग ही जमा पाया। सिंधी समुदाय द्वारा गीत पर उनके समुदाय की अवहेलना के आरोप लगाने के बाद कुछ विवाद की स्थितियां भी उतपन्न हुई थीं।

धीरे-धीरे वक्त गुजरा और 2014 में केंद्र में हिंदुत्व के चेहरे वाली भाजपा और उसके सहयोगी दलों की पूर्ण बहुमत वाली सरकार आई। इसके बाद से लगातार ही देश में तमाम ऐसे मौके आये जब कभी गौहत्या के नाम पर, कभी तिरंगा यात्रा निकालने के नाम पर, तो कभी बलात्कार की घटनाओं के नाम पर, कभी कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद के हालातों को लेकर, कभी सी ए ए जैसे कानून के नाम पर तो कभी जामिया और जेएनयू जैसे शिक्षण संस्थानों के छात्रों पर हमले के मामले को लेकर देशभर में जनता के बीच आपसी गतिरोध पैदा हुए और इन गतिरोधों ने देश की जनता को दो हिस्सों में बांट दिया। एक हिस्सा वो जो हर मामले में सरकार को कटघरे में खड़ा करने को तैयार खड़ा है, सरकार से उसकी जबावदेही से जुड़े सवाल पूछता है और दूसरा हिस्सा वो जो सरकार के पक्ष को सुरक्षित और सरंक्षित करने पर आमादा है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बात की जाए तो किसान बिल आने के बाद से ही देशभर में किसान आंदोलन चल रहे हैं और इस मुद्दे को लेकर फिर से देश की जनता दो हिस्सों में बंटकर आमने सामने है। गतिरोध भी इस स्तर का कि देश के नागरिक ही अपने देश के ही पृथक विचारधारा रखने वाले नागरिकों को आतंकी और गद्दार का तमगा देने को तैयार खड़े हैं। यह आपसी गतिरोध सोशल मीडिया पर खुलेआम ज़हर बनकर बिखर चुका है और स्थितियां लगातार ऐसी बन रही हैं कि अब यह गतिरोध सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों पर नागरिकों को आमने-सामने लाने की नौबत पैदा कर रहा है।
अब मेरे और तुम्हारे सुर मिलकर हमारे सुर बनते हुए नज़र नहीं आ रहे, ऐसा लगने लगा है कि सारे सुर ही बेसुध होकर अलग-थलग पड़े हों। नेताओं से लेकर सेलिब्रिटीज तक, खिलाड़ियों से लेकर व्यावसायियों तक, विद्यार्थियों से लेकर शिक्षकों तक सब दो हिस्सों में बंटकर एक दूसरे के सामने खड़े हैं। अपने चरम की ओर बढ़ती यह स्थितियां क्या देश को गृह युद्ध की ओर नहीं धकेल रहीं हैं? क्या ऐसी अशांति के बीच हम राष्ट्र के विकास की कल्पना कर सकते हैं? वक्त सरकार और नागरिकों के लिए मंथन का है कि कौन से ऐसे प्रयास किये जायें कि एक बार फिर “मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा”।

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