इजराइल दूतावास पर धमाके के तार पाक में

आर.के सिन्हा

जिस दिन केन्द्रीय बजट लोक सभा में पेश किया जाना था उस दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बातचीत करना सामान्य शिष्टाचार वार्ता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। राजधानी दिल्ली में 29 जनवरी 2021 को इजराइली दूतावास के पास आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इजराइली प्रधानमत्री नेतन्याहू को आश्वासन दिया कि भारत के लिए इजराइल के राजनयिकों और उनके आवासीय परिसरों की सुरक्षा भारत सरकार के लिये सबसे अधिक महत्व रखती है और अपराधियों को खोजने और दंडित करने के लिए सभी संसाधनों का उपयोग किया जाएगा। दोनों नेताओं ने इस संदर्भ में भारतीय और इजराइल सुरक्षा एजेंसियों के बीच घनिष्ठ समन्वय के बारे में संतोष व्यक्त किया।

एक बात गौर करें कि साल 2012 में भी राजधानी में इजराइली दूतावास के बाहर कार में बम धमाका किया गया था, इस बार भी उसी रोड पर स्थित इजराइली दूतावास के पास आईईडी ब्ला‍स्ट हुआ। गनीमत यह रही कि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ। इस ब्लास्ट के बाद तमाम सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं, क्योंकि यह ब्लास्ट किसी बड़ी साजिश का हिस्सा भी तो हो सकता है। मत भूलें कि इजराइली दूतावास तथा यहूदियों के धार्मिक स्थल इस्लामिक कठमुल्लों के निशाने पर लंबे समय से रहे हैं। इन्हीं कठमुल्लों ने मनहूस 5 सितंबर, 1972 को जर्मन के म्युनिख ओलंपिक खेलों मे खून खराबा किया था। तब किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि ओलंपिक गेम्स विलेज गवाह बनेगा भयंकर आतंकी हमले का। फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन के आतंकियों ने इजराइल के कई खिलाड़ियों को मौत के घाट उतारा था। वह सारा हादसा दुनिया के विभिन्न देशों के खिलाड़ियों के सामने हुआ था। अब भी आंखें नम हो जाती हैं उन मारे गए खिलाड़ियों को याद करके। उसके बाद से ही इजराइल के यहूदी कठमुल्लों के निशाने पर रहे हैं ।

परम मित्र भारत का

दरअसल भारत का परम मित्र है इजराइल और संकट में हमेशा भारत के साथ खड़ा रहा है। इसलिए भारत के ऊपर इस बात की जिम्मेदारी है कि यहां पर इजराइली दूतावास,उनके राजनयिक, यहूदी नागरिक और यहूदी धार्मिक स्थल सुरक्षित रहें। इन पर निशान साधने वालों को नेस्तनाबूद कर दिया जाए। दरअसल राजधानी में इजराइली दूतावास के आसपास जो अब तक के दो विस्फोट हुए हैं, उन जगहों से बेहद करीब ही है राजधानी के यहूदियों का सिनगॉग (धार्मिक स्थान)। यह लुटियन दिल्ली के हुमायूं रोड पर है। दिल्ली में एक मोटे अनुमान के मुताबिक, एक हजार के आसपास यहूदी रहते हैं। इनमें भारतीयों के अलावा इजराइल, कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन दूतावासों में काम करने वाले यहूदी राजनयिक भी हैं। कुछ यहूदी संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों में भी काम करते हैं। कोरोना के कारण हुमायूं रोड का सिनगॉग पिछले मार्च से भक्तों के लिए बंद है। इधर के हिन्दी, मराठी, अंग्रेजी, हिब्रू भाषाएं बोलने वाले रेब्बी (मंदिर के पुजारी के समकक्ष) मलेकर कहते हैं कि कई विदेशी यहूदी यहां आते हैं। वैसे तो यहां की सुरक्षा व्यवस्था काफी ठीक है, पर इसे और चाक चौबंद किया जा सकता है। कठमुल्लों के इरादों पर कोई कुछ नहीं कह सकता। यह सिनगॉग अपने आप में खास है। इसके एक हिस्से में ही यहूदियों का कब्रिस्तान भी है। इसमें पाकिस्तान के खिलाफ 1971 में लड़ी गई जंग का एक नायक भी चिरनिद्रा में है। पाकिस्तान पर 1971 के युद्ध के महानायकों में भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल जे.एफ.आर जैकब भी थे। वे यहूदी थे। पूर्वी पाकिस्तन (अब बांग्लादेश) में अन्दर घुसकर पाकिस्तानी फौजों पर भयानक आक्रमण करवाने वाले लेफ्टिनेंट जनरल जैकब की वीरता की गाथा प्रेरक है। उनका आक्रमण युद्ध कौशल का ही परिणाम था कि नब्बे हजार से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों ने अपने हथियारों समेत भारत की सेना के समक्ष एतिहासिक आत्मसमर्पण किया था जो कि अभी तक का विश्व भर का सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण है। कहते हैं कि अगर 1971 की जंग में जेनरल जैकब की योजना और युद्ध रणनीति पर अमल न होता तो बांग्लादेश को आज़ादी आसानी से नहीं मिलती। वे देश की यहूदी बिरादरी के भी आदरणीय सदस्य थे।

धमाके में हाथ इमरान का ?

गौर करें कि जब राजधानी में किसानों का आंदोलन चल रहा है,तब इजराइली दूतावास पर विस्फोट बेहद गंभीर मामला माना चाहिए। इन किसानों को बिना मांग ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान समर्थन दे रहे हैं। उनकी सरकार के कुछ दूसरे मंत्री कह भी रहे हैं कि वे किसान आंदोलन के साथ हैं। इन पृष्ठभूमि में क्या नहीं लगता कि हालिया धमाके के पीछे पाकिस्तान का ही हाथ हो? भारत- इजराइल संबंध से पारिस्तान हमेशा ही जलता रहा है। उसे लगता है कि यह गठजोड़ उसके कफन में अंतिम कील साबित हो सकते हैं। इसलिए वह इजराइली दूतावास पर विस्फोट करवा रहा है भारत में ही रह रहे कुछ आस्तीन के सांपों से। उसकी मंशा यही रहती है कि इन विस्फोटो से दोनों देशों के संबंधों में कटुता आ जाएगी।

जैसा कि पहले बताया ही जा चुका है कि इजराइल भारत का कठिन समय का मित्र है। उसने भारत का तब साथ दिया जब भारत गहरे में संकट में था। इजराइल ने 1965 और 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाइयों के दौरान भारत को हर संभव मदद दी। इन जंगों में इजराइल ने भारत को गुप्त जानकारियां देकर भी अच्छी खासी मदद की थी। माना जाता है कि तब भारतीय ख़ुफ़िया अधिकारी साइप्रस या तुर्की के रास्ते इजराईल जाते थे। वहां उनके पासपोर्ट पर मुहर तक नहीं लगती थी। उन्हें मात्र एक काग़ज़ दिया जाता था, जो उनके इजराईल आने का सुबूत होता था। 1999 के करगिल युद्ध में तो इजराइल की मदद के बाद भारत और इजराइल खासतौर पर करीब आए। तब इजराइल ने भारत को एरियल ड्रोन, लेसर गाइडेड बम, गोला बारूद और अन्य हथियारों की मदद दी। पाकिस्तान का परमाणु बम, जिसे इस्लामी बम भी कहा जाता है, भी दोनों देशों को नज़दीक लाया। इजराइल को डर रहा है कि कहीं यह परमाणु बम ईरान या किसी इस्लामी चरमपंथी संगठन के हाथ न लग जाए।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद हैं)

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